A place of memories - Ranjan Kumar Desai in Hindi Fiction Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                        : प्रकरण 25 :

कहते हैं हर किसी क़े दिमाग़ में कुछ ना कुछ हर पल, हर घड़ी चहल पहल होती रहती हैं. दिमाग़ बिना सोचे एक पल भी रह नहीं सकता.

मेरा भी कुछ ऐसा हाल था.

मेरा दिमाग़ भी हर पल कुछ ना कुछ यादों की सहेलगाह में व्यस्त रहता था.

मेरी जिंदगी में कई लोग आये थे, जिस की याद बार बार आती रहती थी.

मेरी याद दास्त भी बड़ी तेज थी. कुछ भी चीज मानो फेविकोल की तरह मेरे दिमाग़ में घुसकर पूरी तरह चिपक जाती थी, जिसे मैं चाहकर भी मैं मिटा नहीं पाता था. बार बार वह वाक्या, वह घटना और उन सब के बारे मुझे याद आती रहती थी.

बचपन में हम लोगो को टांगे में बैठने से जो अनुभव हुआ था. उस का रिकैप ना जाने मैंने कितनी बार देखा था.

उन्ही दिनों मैंने सुना था. एक छोटा लड़का हादसे की वजह से मर गया था. उस वक़्त तो मुझे मौत किस बला का नाम हैं? वह भी पता नहीं था.

नानी मा ने मुझे जानकारी दी थी.

" वह भगवान क़े पास चला गया हैं. वह कभी वापस नहीं आयेगा. उस को जला दिया जायेगा . "

उस वक़्त मैंने उन्हें सवाल किया था.

" नानी मा उस वक़्त बच्चा रोयेगा नहीं? "

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हमारे पड़ोस में एक शख्स रहते थे उन की पान, तम्बाकू और सिगरेट की दुकान थी. उस की बीवी का देहांत हो गया था.. उस की एक लड़की थी. जिस को मेरी नानी मा ने पाल पोषकर बड़ा किया था.. वह यह अहसान कभी भूला नहीं पाई थी.

उस ने मेरे साथ भी भाई बहन का रिश्ता क़ायम किया था. उस का नाम ममता था. जो नाम क़े अनुरूप सचमुच ममता की मुरत थी.

लेकिन उस का बड़ा भाई उस से बिल्कुल विपरित था. और उस की बीवी का तो क्या कहना? उस की अड़ोस पड़ोस में, गांव में किसी से नहीं बनती थी. वह हर किसी के साथ लड़ती झगड़ती रहती थी. क़ोई उसे बुलाता नहीं था. उस का लड़का भी हूबहू अपनी मा पर गया था. वह हर घड़ी मुझ से बिना वजह लडता झगड़ता रहता था.

उस को पढ़ाई लिखाई में क़ोई दिलचस्पी नहीं थी.

मैं उस से दूर रहना ही पसंद करता था. उस की मा भी अपने बेटे को सब कुछ गलत सिखा रही थी.

हमारी पड़ोस में दूसरी एक बुजुर्ग महिला रहती थी. जो विधवा थी. उस का खुद का बंगले टाइप घर था. जिस में उस ने मंदिर की स्थापना की थी.

उस क़े अलावा उस क़े पास गाय भेंसे थी. जिस का दूध दोहकर, उसे बेचकर पैसे कमाती थी.

बाहर थोड़ी दूर एक मंदिर था. उस में एक तबैला था. जहाँ गाय भेंसे को रखा जाता था. शाम को वह बाई दूध दोहने मंदिर आती थी. दोहने की प्रतिक्रिया हमें देखना बड़ा अच्छा लगता था.

. हम दोनों भाई रोज शाम को अचूक उसे निहारने मंदिर पहुंच जाते थे.

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मा की मौत को काफ़ी समय बीत गया था.

फिर भी एक बात मेरे जहम में घर कर गई थी.

नानी मा क़े निर्दय मार से मेरे बडे भाई सुखेश की मौत हो गई थी.

मैं यह बात भी कभी नहीं भूला पाता था.

मेरी मा का क़ोई बीमारी की वजह से शादी क़े बाद चार साल में देहांत हो गया था जो कुदरती नहीं था.. मुझे उस क़े बारे में कुछ मालूम नहीं था. लेकिन खुद नानी मा ने बार बार जिक्र किया था.

" तुम्हारी मा को किसी ने कुछ जहरीली चीज खिला दी थी, जिस की वजह से उन की मौत हो गई थी. "

मुझे तो अपनी मा का चेहरा भी ठीक से याद नहीं था.

उस को लेकर मुझे अक्सर एक गीत याद आता था:

राम तेरे घर कौन कमी थीछिन ली तूने हंसी क्यों किसी कीक्यों मासूमों को अनाथ करेमा ना मरे बचपन में किसी की (2)

हर बार यह गीत की पंक्तिया मेरी आँखों में आंसू की लड़ी बहाती थी.

ज़ब भी क़ोई फ़िल्म देखता था और उस में मा क़े मौत की बात आती थी तो मैं अपने आंसू नहीं रोक सकता था.

मरने क़े बाद हर क़ोई खुदा क़े घर चला जाता हैं.

लेकिन वह कहाँ जाता हैं? किसी को उस की जानकारी नहीं होती हैं.

कुछ साल पहले ' जमीन क़े तारे ' नाम से एक फ़िल्म बनी थी. जिस में दो छोटे बच्चों की मा भगवान क़े पास चली जाती हैं. ऐसा दिखाया था..

और भगवान का घर कहाँ था?

बच्चों को तो क्या किसी को भी उस क़े बारे में कुछ पता नहीं था.

वह दोनों अपनी मा क़ो ढूंढ़ने को निकल पड़ते हैं.

उन्हें एक ट्रक ड्राइवर मिल जाता हैं. जो बच्चों को सवाल करता हैं.

" बच्चों कहाँ जाना हैं? "

वह लोग सरलता से निर्दोष अंदाज में जवाब देते हैं.

" हमें हमारी मा क़े पास जाना हैं. "

" कहाँ हैं तुम्हारी मा?

" भगवान क़े पास!! "

सुनकर ट्रक ड्राईवर की आँखे भर आती है.

और वह उन्हें जूठी तसल्ली देता हैं.!!

" ओ मेरे प्यारो जमीन के तारों मैं ले जाऊंगा तुम को वहाँ! "

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मेरे भीतर एक लेखक छिपा था. मुझे उस बात का एहसास हो गया था. मेरे भीतर हरदम कुछ ना कुछ लिखने के विचार पनपते रहते थे.

उस वक़्त तो मैं कुछ लिख नहीं पाया था.

लिखने क़े बारे में मैंने दो अहम बातें सुनी थी.

जिस की बीवी अच्छी ना हो वही सफल लेखक बन सकता हैं!!

और दूसरा..

मुझे एक वाक्या याद आया था. किसी ने इच्छुक लेखक को सवाल किया था.

" तुम उच्चतम लेखक बनना चाहते हो? कहाँ हैं तुम्हारे जख्म? जितने बडे जख्म उतने ही बडे लेखक बन सकते हो. "

सुजाता तो उस समय उस बिरादरी में नहीं थी. तो 50 प्रतिशत लेखक बनने की संभावना खत्म हो गई थी. लेकिन जख्मो की बात की जाये तो भगवान मेरे पर बहुत मेहरबान था. उस ने मुझे कदम कदम पर जख्मो की लहानी देने में क़ोई कंजूसी छोड़ी थी.

स्कुल क़े दिनों में मैंने एक दूसरे कवि से प्रभावित होकर दो लाइने लिखी थी::

' जिगर में दर्द लेकर जा रहा हूं,कहना मत अकेला जा रहा हूं.'

कहां जाता हैं क़ोई भी अपने साथ कुछ नहीं ले जाता.

शायद इसी बात ने मुझे ऐसा लिखने की प्रेरणा मिली थी.

अनन्या क़े मुआमले में मैंने पहली बार चोट खाने का एहसास किया था.

जिस ने मुझे ऐसा लिखने पर विवश किया था.

आंसू रो रो पीता हूंमुस्कुरा कर जीता हूंदोस्त नहीं यार कोईजख़्मी दिल को सिता हूं

उस वक़्त मेरे स्कूली यार श्याम ने मेरी इस टेलन्ट की सराहना की थी.

मैंने उसे आगे बढ़ाया था.

जब मैं चला पाने मंज़िल मिलीमुझे तबाही, मिलते ही मंज़िलखुद हम सफर ने ली बिदाईमैंने तो इश्क की आग मैंअरमानो की होली जलाई क़ोई फिर भी नहीं पूछतामैं कहाँ कैसे जीता हूं.

गरिमा ना मिलने पर मैंने अपना विषाद इस तरह व्यक्त किया था.

                  000000000 ( क्रमशः