अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 97 — सात दिनों का आखिरी सच
दीवार पर टँगी घड़ी की सुइयाँ तेजी से घूम रही थीं।
बारह जून, 2027 तक पहुँचने में अब सिर्फ सात दिन बाकी थे।
अनन्या उस तारीख को लगातार देख रही थी। उसके हाथ में पकड़ा सुनहरा पेन अचानक गर्म होने लगा।
“सात दिन...” उसने धीरे से कहा। “आखिर बारह जून को ऐसा क्या होने वाला है?”
सामने खड़ी सुनहरी आँखों वाली बच्ची मुस्कराई।
“जिस दिन तुम्हारी कहानी का असली अंत लिखा जाएगा।”
“और अगर मैं अपनी कहानी का अंत लिखने से इनकार कर दूँ?”
“तो कोई और लिख देगा।”
“कौन?”
बच्ची ने कमरे के अँधेरे को देखा।
“वही, जिसने तुम्हारी पहली कहानी का आखिरी पन्ना चुराया था।”
अनन्या ने तुरंत पीछे खड़ी महिला की तरफ देखा।
“आप जानती हैं कि वह कौन है?”
महिला ने कुछ पल तक चुप रहने के बाद कहा, “हाँ।”
“तो बताइए!”
“वह तुम्हारे बहुत करीब है।”
अनन्या की आँखें सिकुड़ गईं।
“मेरे करीब?”
महिला ने सिर हिलाया।
“इतना करीब कि तुमने कभी उस पर शक भी नहीं किया।”
अनन्या के दिमाग में कई चेहरे घूमने लगे। उसकी माँ, आरव, आर्यव, अथर्व... और फिर अचानक उसे नैना का चेहरा याद आया।
लेकिन वह तुरंत इस ख्याल को झटक गई।
“आप मुझे उलझा रही हैं। अगर आपको सच पता है, तो साफ-साफ बताइए।”
महिला ने खाली पन्ने वाली किताब उसकी तरफ बढ़ाई।
“यह किताब तुम्हें खुद जवाब देगी। लेकिन तुम्हें इसके सात पन्ने पूरे करने होंगे। हर पन्ने पर तुम्हारी एक भूली हुई याद होगी।”
“और अगर मैंने सभी पन्ने पढ़ लिए?”
“तब तुम्हें पता चल जाएगा कि उस रात किसे बचाया गया था और किसे मरने के लिए छोड़ दिया गया था।”
अनन्या ने किताब खोलने की कोशिश की।
लेकिन उसके हाथ लगाते ही पहला पन्ना अपने आप पलट गया।
उस पर एक सवाल लिखा था—
“तुम्हारी माँ ने तुम्हें पहली बार किस नाम से पुकारा था?”
अनन्या ने पन्ने को देखा।
“मुझे नहीं पता।”
बच्ची ने मुस्कराकर कहा, “यही तो तुम्हें याद करना है।”
अचानक कमरे में एक तेज हवा चली।
महिला पीछे हट गई।
“जल्दी करो। हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।”
“क्यों?”
महिला ने ऊपर देखा।
छत पर काली दरारें फैल रही थीं।
“क्योंकि कहानीकार को पता चल चुका है कि तुम असली आर्या से मिल चुकी हो।”
उसी समय किसी ने कमरे के बाहर से दरवाजा खटखटाया।
तीन बार।
धीरे-धीरे।
फिर एक आवाज आई—
“अनन्या... दरवाजा खोलो।”
अनन्या का चेहरा बदल गया।
वह आवाज उसकी माँ की थी।
“माँ?”
सुनहरी आँखों वाली बच्ची ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं! दरवाजा मत खोलना!”
“लेकिन यह मेरी माँ की आवाज है!”
“तुम्हारी माँ यहाँ नहीं हैं।”
दरवाजे के बाहर से फिर आवाज आई।
“बेटा, मेरी बात सुनो। मुझे तुम्हें बहुत जरूरी बात बतानी है।”
अनन्या की आँखें भर आईं।
“माँ, आप सच में हैं?”
महिला ने घबराकर कहा, “यह तुम्हारी माँ नहीं है। यह उसकी आवाज की नकल कर रहा है।”
“कौन?”
अचानक दरवाजे के नीचे से काली स्याही कमरे के अंदर फैलने लगी।
और उस स्याही के बीच एक वाक्य उभर आया—
“पहला पन्ना पूरा होने से पहले ही खेल शुरू हो चुका है।”
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दूसरी दुनिया — आरव का फैसला
सफेद दरवाजा अब पूरी तरह खुल चुका था।
उसके पीछे खड़ी बच्ची लगातार आरव को देख रही थी।
“मुझे लेने आओ, रक्षक।”
आरव के हाथ में पकड़ी तलवार जमीन पर गिर चुकी थी।
उसके सामने आर्यव खड़ा था।
“अब समझे? तुम्हें क्यों बनाया गया था?”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“तुम मुझसे क्या छिपा रहे हो?”
आर्यव ने अपनी जंजीरों को खींचा।
“मैंने तुम्हें अपनी प्रतिज्ञा से बनाया था। लेकिन तुम्हें यह नहीं बताया गया कि वह प्रतिज्ञा किसके लिए थी।”
“मुझे अनन्या की रक्षा करनी है।”
“तुम्हें उस लड़की की रक्षा करनी है, जिसे तुम अनन्या समझते हो।”
आरव का चेहरा सख्त हो गया।
“वह अनन्या ही है।”
आर्यव ने सिर हिलाया।
“नाम बदलने से कहानी नहीं बदलती।”
नैना उनके बीच आ गई।
“आर्यव, पहेलियाँ बंद करो। हमें बताओ कि उस रात क्या हुआ था।”
आर्यव ने नैना की तरफ देखा।
“तुम्हें सच में लगता है कि तुम्हें कुछ नहीं पता?”
नैना चौंकी।
“क्या मतलब?”
“तुम्हें अपनी शक्ति याद है?”
“मैं खाली पन्ना हूँ। मैं जबरदस्ती लिखे गए शब्दों को मिटा सकती हूँ।”
“सिर्फ शब्दों को?”
नैना कुछ नहीं बोली।
आर्यव ने आगे कहा, “तुम्हें याद है, पहली आग की रात तुम कहाँ थीं?”
नैना ने आँखें बंद कर लीं।
“मैं वहाँ नहीं थी।”
“तुम्हें ऐसा लगता है।”
अचानक नैना के सामने एक दृश्य उभर आया।
वह एक छोटी बच्ची थी।
उसके हाथ में सफेद रंग की कॉपी थी।
वह एक कमरे के कोने में बैठी थी और सामने दो बच्चियाँ खड़ी थीं।
एक बच्ची रो रही थी।
दूसरी उसके हाथ से किताब छीनने की कोशिश कर रही थी।
फिर किसी ने पीछे से आकर कहा—
“नैना, जो कुछ तुमने देखा है, उसे याद मत रखना।”
नैना ने अचानक आँखें खोल दीं।
उसकी साँसें तेज थीं।
“मैं... मैं वहाँ थी?”
आर्यव ने धीरे से कहा, “हाँ।”
कबीर ने हैरानी से पूछा, “लेकिन तुमने कभी बताया क्यों नहीं?”
नैना ने अपना सिर पकड़ लिया।
“क्योंकि मुझे याद ही नहीं था!”
आर्यव ने कहा, “तुम्हारी यादें किसी ने नहीं छीनी थीं। तुमने खुद उन्हें मिटाया था।”
“मैंने क्यों?”
“क्योंकि उस रात तुमने एक ऐसी चीज देखी थी, जिसे देखने के बाद तुम किसी पर भरोसा नहीं कर पातीं।”
नैना की आँखों में डर उतर आया।
“मैंने क्या देखा था?”
आर्यव ने सफेद दरवाजे की तरफ देखा।
“तुमने देखा था कि दूसरी आर्या को कहानीकार ने नहीं बचाया था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
नैना ने फुसफुसाकर पूछा, “तो फिर उसे किसने बचाया?”
आर्यव ने जवाब देने से पहले आरव की तरफ देखा।
“उसकी अपनी माँ ने।”
आरव पीछे हट गया।
“नहीं... यह सच नहीं हो सकता।”
आर्यव की आवाज भारी हो गई।
“तुम्हारी प्रतिज्ञा उसी रात लिखी गई थी। तुम्हें उस बच्ची की रक्षा करनी थी, जिसे उसकी माँ ने खुद कहानी से बाहर भेज दिया था।”
“लेकिन महिला ने कहा था कि मुझे आर्या को उससे बचाना था!”
“क्योंकि उस महिला ने तुम्हें कभी पूरी कहानी बताई ही नहीं।”
आरव ने अपनी कलाई देखी।
उस पर बना शब्द फिर बदल रहा था।
पहले लिखा था—रक्षक।
अब उसके नीचे एक दूसरा शब्द उभर रहा था।
गवाह।
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पहली कहानी — पहला पन्ना
अनन्या ने दरवाजे की तरफ देखा।
बाहर से अब कोई आवाज नहीं आ रही थी।
लेकिन काली स्याही धीरे-धीरे उसके पैरों की तरफ बढ़ रही थी।
“हमें यहाँ से निकलना होगा,” सुनहरी आँखों वाली बच्ची ने कहा।
महिला ने सिर हिलाया।
“नहीं। अगर तुम इस कमरे से बाहर गईं, तो पहला पन्ना हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।”
“लेकिन यहाँ तो स्याही फैल रही है!”
“यह स्याही तुम्हारी यादों को मिटाने नहीं आई। यह तुम्हें वह याद दिखाने आई है, जिसे तुमने छिपाया था।”
अनन्या ने किताब को देखा।
पहले पन्ने पर लिखा सवाल अब बदल चुका था।
“तुम्हारी माँ ने तुम्हें पहली बार किस नाम से पुकारा था?”
उसने आँखें बंद कर लीं।
एक छोटा-सा घर।
खिड़की से आती सुबह की रोशनी।
एक महिला किसी बच्ची को गोद में लेकर झुला रही थी।
बच्ची लगातार रो रही थी।
महिला ने उसके माथे को चूमा।
“चुप हो जाओ, मेरी...”
आवाज अचानक रुक गई।
अनन्या ने उस दृश्य को ध्यान से देखने की कोशिश की।
“माँ, मेरा नाम क्या है?”
महिला ने मुस्कराकर कहा, “तुम्हारा नाम अभी नहीं रखा है।”
“तो आप मुझे क्या बुलाएँगी?”
महिला ने बच्ची की नाक छूते हुए कहा—
“मेरी नन्ही धुन।”
अनन्या की आँखें खुल गईं।
उसके सामने किताब के पहले पन्ने पर एक नया शब्द उभर आया।
धुन।
उसने काँपते हाथों से उस शब्द को छुआ।
“धुन...”
सुनहरी आँखों वाली बच्ची ने धीरे से कहा, “अब तुम्हें याद आया?”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“क्या मेरा पहला नाम धुन था?”
“हाँ। माँ तुम्हें इसी नाम से बुलाती थीं।”
“लेकिन फिर उन्होंने मुझे अनन्या क्यों कहा?”
बच्ची ने जवाब देने से पहले महिला की तरफ देखा।
महिला ने अपनी आँखें झुका लीं।
“क्योंकि उस रात धुन नाम की बच्ची को बचाना संभव नहीं था।”
अनन्या के चेहरे पर उलझन फैल गई।
“तो फिर मैं कौन थी? धुन या आर्या?”
महिला ने कहा, “तुम दोनों में से कोई भी पूरी तरह नहीं।”
अनन्या ने गुस्से से किताब बंद कर दी।
“बस! मैं अब और पहेलियाँ नहीं सुनूँगी। मुझे यह जानना है कि मेरी माँ ने मेरे साथ क्या किया था।”
महिला उसके करीब आई।
“तुम्हारी माँ ने तुम्हें बचाने के लिए एक ऐसा फैसला लिया, जिसका दर्द वह पूरी जिंदगी अपने साथ लेकर चलीं।”
“किसे बचाया था उन्होंने?”
महिला ने जवाब नहीं दिया।
तभी सुनहरी आँखों वाली बच्ची ने धीरे से कहा—
“उन्होंने मुझे बचाया था।”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“लेकिन तुम तो कह रही थीं कि तुम मर गई थीं!”
बच्ची की आँखें नम हो गईं।
“मेरी कहानी की मृत्यु हुई थी। मेरा शरीर नहीं।”
“इसका क्या मतलब है?”
“माँ ने मुझे उस दुनिया से निकालकर एक ऐसी जगह छिपा दिया था, जहाँ कहानीकार भी मुझे नहीं ढूँढ़ सकता था।”
“कहाँ?”
बच्ची ने अपनी उँगली से अनन्या की छाती की तरफ इशारा किया।
“तुम्हारे अंदर।”
अनन्या कुछ समझ पाती, उससे पहले बच्ची के शरीर पर सुनहरी दरारें उभरने लगीं।
वह दर्द से पीछे हट गई।
महिला चीख पड़ी।
“नहीं! अभी नहीं!”
अनन्या ने बच्ची को संभालने के लिए हाथ बढ़ाया।
“तुम्हें क्या हो रहा है?”
बच्ची ने मुश्किल से कहा, “वह मुझे वापस बुला रहा है।”
“कौन?”
कमरे की छत से एक भारी आवाज गूँजी—
“वह बच्ची मेरी है।”
सारी किताबें एक साथ जमीन पर गिर पड़ीं।
महिला ने अनन्या को पीछे खींच लिया।
अँधेरे में एक विशाल आकृति उभरने लगी।
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसके माथे पर वही छह निशान थे, जो अनन्या ने दरवाजे पर देखे थे।
“तुमने बहुत देर कर दी, आर्या,” उस आकृति ने कहा।
अनन्या ने सुनहरी आँखों वाली बच्ची को अपने पीछे कर लिया।
“तुम कौन हो?”
आकृति हँसी।
“तुम्हारी कहानी का पहला पाठक।”
“मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता!”
“फर्क पड़ेगा, बच्ची। क्योंकि तुम्हारी माँ ने जिस पन्ने को छिपाया था, वह मेरे पास है।”
उसने अपना हाथ उठाया।
हवा में एक जला हुआ पन्ना दिखाई दिया।
उस पर लाल स्याही से लिखा था—
“जिस बच्ची को माँ ने बचाया, वह असली आर्या नहीं थी।”
अनन्या का चेहरा सफेद पड़ गया।
“यह झूठ है!”
आकृति ने धीरे से कहा, “तो अपनी माँ से पूछना कि उन्होंने आग से बाहर किसे उठाया था।”
अचानक जला हुआ पन्ना हवा में घूमता हुआ अनन्या के सामने आकर रुक गया।
उसके नीचे एक और पंक्ति उभर आई—
“और किस बच्ची को उन्होंने अपनी आँखों के सामने जलते हुए छोड़ दिया था।”
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दूसरी दुनिया — नैना की भूली हुई गवाही
नैना अब भी उस पुराने दृश्य को याद करने की कोशिश कर रही थी।
उसके सामने पहली आग की रात बार-बार उभर रही थी।
“मुझे कुछ याद आ रहा है,” उसने कहा।
कबीर उसके पास आया।
“क्या?”
“उस रात मैं अकेली नहीं थी। मेरे साथ कोई और भी था।”
“कौन?”
नैना ने आँखें बंद कर लीं।
एक छोटा बच्चा।
काले कपड़े।
चेहरे पर सफेद मुखौटा।
उसके हाथ में एक खाली पन्ना था।
बच्चा नैना के सामने झुककर बोला—
“अगर तुमने सच देखा, तो तुम्हें हमेशा के लिए मिटा दिया जाएगा।”
नैना ने डरते हुए पूछा, “तुम कौन हो?”
बच्चे ने जवाब दिया—
“मैं वह हूँ, जिसे तुम सब कहानीकार कहते हो।”
नैना ने अचानक आँखें खोल दीं।
“मैंने कहानीकार को देखा था!”
अर्णव ने हैरानी से पूछा, “तुमने उसे देखा था?”
“हाँ। लेकिन वह कोई बड़ा राक्षस नहीं था। वह एक बच्चा था।”
आर्यव की आँखों में बेचैनी उभर आई।
“उसका चेहरा कैसा था?”
नैना ने धीरे से कहा, “मैंने उसका चेहरा नहीं देखा था। लेकिन उसके हाथ पर एक निशान था।”
“कौन-सा निशान?”
नैना ने हवा में वही छह रेखाओं वाला निशान बना दिया।
आरव का चेहरा बदल गया।
“यह तो वही निशान है...”
कबीर ने पूछा, “तुम इसे पहचानते हो?”
आरव ने सिर हिलाया।
“यह निशान अनन्या के हाथ पर भी था। पहली बार जब उसने मुझे वह सुनहरा पेन दिखाया था, तब एक पल के लिए यही निशान उभरा था।”
अर्णव ने किताब उठाई।
“इसका मतलब कहानीकार का संबंध अनन्या से है?”
आर्यव ने गंभीर स्वर में कहा, “सिर्फ संबंध नहीं। हो सकता है, कहानीकार उसी कहानी का हिस्सा हो, जिससे अनन्या पैदा हुई थी।”
आरव ने सफेद दरवाजे की तरफ देखा।
“मुझे उसके पास जाना होगा।”
नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम अभी वहाँ नहीं जा सकते। तुम्हारी प्रतिज्ञा बदल रही है।”
“अगर मैं नहीं गया, तो अनन्या अकेली पड़ जाएगी।”
नैना ने धीरे से कहा, “वह अकेली नहीं है। उसके साथ उसकी असली आर्या भी है।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें कैसे पता?”
नैना ने अपनी हथेली खोली।
उस पर एक नया वाक्य लिखा था—
“दोनों आर्याएँ एक ही कहानी में जीवित हैं।”
लेकिन उसके नीचे एक और पंक्ति उभर रही थी।
“और उनमें से एक ही इस दुनिया में रह पाएगी।”
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पहली कहानी में अनन्या ने जले हुए पन्ने को अपने हाथ में उठा लिया।
उसके भीतर अब डर से ज्यादा गुस्सा था।
“तुम्हें मेरी माँ से क्या चाहिए था?”
अँधेरी आकृति ने जवाब दिया, “मुझे सिर्फ वह कहानी चाहिए थी, जिसे तुम्हारी माँ ने मुझसे छिपाया।”
“और अगर मैं तुम्हें वह कहानी नहीं दूँ?”
“तो सातवें दिन तुम्हें खुद उसे पूरा करना होगा।”
अनन्या ने पन्ना कसकर पकड़ लिया।
“मैं तुम्हारी कोई बात नहीं मानूँगी।”
आकृति धीरे-धीरे अँधेरे में गायब होने लगी।
जाने से पहले उसने कहा—
“याद रखना, धुन... तुम्हारी माँ ने तुम्हें अनन्या नाम दिया था। लेकिन तुम्हारी बहन ने तुम्हें आर्या नाम दिया था।”
अनन्या ने चौंककर उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
लेकिन तब तक वह आकृति गायब हो चुकी थी।
कमरे में सिर्फ तीन लोग रह गए थे—अनन्या, वह रहस्यमयी महिला और सुनहरी आँखों वाली बच्ची।
अनन्या ने धीरे से बच्ची का हाथ पकड़ लिया।
“तुमने मुझे आर्या नाम दिया था?”
बच्ची की आँखों में आँसू आ गए।
“हाँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि माँ तुम्हें धुन बुलाती थीं, लेकिन मुझे लगता था कि तुम्हारा नाम आर्या होना चाहिए। तुम मेरी छोटी बहन थीं। मैं चाहती थी कि तुम्हारा नाम भी मेरी तरह हो।”
अनन्या की आँखें भर आईं।
“तो फिर तुम मुझे दीदी क्यों कह रही हो?”
बच्ची ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—
“क्योंकि उस रात के बाद तुम मुझसे बड़ी हो गई थीं।”
अनन्या उसे गले लगाने के लिए आगे बढ़ी।
लेकिन जैसे ही दोनों के हाथ मिले, कमरे की दीवार पर एक नया पन्ना उभर आया।
उस पर लिखा था—
“पहला पन्ना पूरा हुआ। अब दूसरी याद का समय है।”
और नीचे एक जगह पर किसी का नाम लिखा था।
वह नाम देखकर अनन्या का चेहरा जम गया।
आरव।
उसी क्षण उसके हाथ में पकड़ा सुनहरा पेन अपने आप चलने लगा।
पन्ने पर एक नया वाक्य लिखा गया—
“जिस दिन आरव ने अनन्या से प्रेम किया, उसी दिन उसने उसे पहचानने से इनकार कर दिया था।”
अनन्या ने काँपते हुए पन्ना देखा।
“आरव ने मुझसे क्या छिपाया है?”
सुनहरी आँखों वाली बच्ची ने धीमे से कहा—
“तुम्हें अगली याद में पता चल जाएगा।”
और फिर दूर कहीं से आरव की आवाज सुनाई दी—
“अनन्या! मेरी बात सुनो! उस पन्ने को मत पढ़ना!”
क्रमशः...