जिंदगी तो बच गई, पर खुद से हार रहा हूँ... (एक अनकही सच्चाई)
यह कहानी शुरू होती है साल 2004 से। महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में एक लड़के का जन्म हुआ। जन्म के साथ ही वह लड़का इतना कमजोर और बीमार था कि अगर कोई उसे एक घंटे के लिए भी अकेला छोड़ दे, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि वह अगली सांस ले भी पाएगा या नहीं। उसे हर पल किसी न किसी की देखभाल की जरूरत थी।
उसकी किस्मत में सबसे अच्छी चीज थी उसके माता-पिता। वे इतने नेक और प्यार करने वाले थे कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी उस बच्चे को बचाने में झोंक दी।
साल 2007 या 2010 के आसपास की बात है। गांव का एक साधारण सा स्कूल था। वह लड़का पढ़ाई में बहुत तेज तो नहीं था, बस ठीक-ठाक था। एक दिन टीचर ने उसे अपनी टेबल के पास बुलाया और सब बच्चों के सामने खड़ा करके किताब पढ़ने को कहा। उसने थोड़ा-बहुत पढ़ा ही था कि अचानक उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उसे तेज चक्कर आए और वह वहीं सबके सामने बेहोश होकर गिर पड़ा।
स्कूल में हड़कंप मच गया। तुरंत उसके माता-पिता को बुलाया गया। जब उसे पास के अस्पताल ले जाया गया, तो डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और कहा, "इस बच्चे का इम्यून सिस्टम (शरीर की ताकत) बहुत कमजोर हो चुका है, इसे तुरंत जिले के किसी बड़े अस्पताल में ले जाइए।"
वह दशहरे का दिन था। पूरा गांव त्योहार मना रहा था, और इस घर में मातम जैसा सन्नाटा था। घर पर उसकी दो बहनें थीं—एक सगी बहन और एक फूफी की बेटी, जो बचपन से उन्हीं के साथ पली-बढ़ी थी। मां घर पर रोते हुए बस फोन की घंटी बजने का इंतजार कर रही थीं कि बच्चे की कोई खबर मिले, और पिता उसे अपनी बाहों में उठाकर शहर की तरफ भाग रहे थे।
रास्ते में जब पिता एक मेडिकल स्टोर से दवाइयां ले रहे थे, तो उस मासूम बच्चे ने पिता से 'फ्रूटी' पीने की जिद की। पिता भला अपने बीमार बेटे को कैसे मना करते? उन्होंने फ्रूटी दिला दी। लेकिन फ्रूटी के कुछ घूंट पीते ही बच्चे की हालत अचानक और बिगड़ गई, उसे फिर से भयानक चक्कर आने लगे। पिता के हाथ-पांव फूल गए। उन्होंने तुरंत घर फोन किया, कुछ कंबल और ओढ़ने-पहनने के कपड़े मंगवाए और सीधे जिले के बड़े अस्पताल पहुंचे।
वहां कई दिनों तक उसके माता-पिता ने रात-दिन एक कर दिए। लेकिन सबसे बड़ा झटका तब लगा जब डॉक्टर ने साफ शब्दों में कह दिया—"जब तक यह लड़का 15 साल का नहीं हो जाता, इसकी जान पर खतरा बना रहेगा। तब तक इसकी यह बिगड़ती तबीयत पूरी तरह ठीक नहीं हो सकती।"
मां-बाप के पैरों तले जमीन खिसक गई। सीने में जमे कफ और सांस लेने की तकलीफ की वजह से साल के 12 महीनों में से कम से कम 4 से 6 महीने वह लड़का अस्पताल के बिस्तर पर ड्रिप और सुइयों के भरोसे ही गुजारता था। एक बार जब उसके दादाजी का देहांत हुआ, तो परिवार नासिक गया था। वहां पंचवटी में फूफी के बेटे ने खेल-खेल में गोदावरी नदी का ठंडा पानी उसके सिर पर डाल दिया। घर लौटते ही उसकी सांसें ऐसी उखड़ीं कि वह फिर बेहोश होकर सीधा अस्पताल पहुंच गया।
शायद आप सोच रहे होंगे कि इस कहानी में बार-बार बस बीमारी और अस्पताल का ही जिक्र क्यों है? क्योंकि यही वह नींव है जिस पर उसकी आगे की पूरी जिंदगी टिकी है। जिस इकलौते बेटे को मां-बाप ने 15 साल तक मौत के मुंह से खींचकर निकाला हो, वे बड़े होने पर उसकी किसी भी जिद को 'ना' कैसे कह सकते थे?
15 साल की उम्र पार करते ही, माता-पिता की दुआओं और त्याग से चमत्कार हुआ। उसकी तबीयत संभल गई और वह बार-बार बीमार पड़ना बंद हो गया। मां-बाप ने उसे अपनी हैसियत से बढ़कर हर सुख दिया—न कभी खाने की कमी होने दी, न पहनने की। उन्होंने उसे सिखाया कि किसी की परवाह कैसे की जाती है।
लेकिन जैसे ही उसने 10वीं पास की और जवानी की दहलीज पर कदम रखा, उसकी जिंदगी ने एक गलत मोड़ ले लिया। उसे लगने लगा कि दुनिया में पैसा कमाना बहुत आसान है। घर में फूफी की बेटी की शादी हो चुकी थी, सगी बहन की शादी अभी बाकी थी, और वह घर का इकलौता बेटा था। घरवालों ने बहुत समझाया कि अभी बाहर मत जा, लेकिन उसने घर में इतना झगड़ा और क्लेश किया कि आखिरकार माता-पिता को झुकना पड़ा।
वह नासिक चला गया। वहां एक कंपनी में काम शुरू किया, लेकिन सिर्फ दो-ढाई महीने में ही उसे समझ आ गया कि असल दुनिया कितनी कठोर है। उसी वक्त कोविड का दौर आ गया। उसकी पुरानी खांसी और तबीयत फिर से बिगड़ने लगी। शुक्र था कि वहां उसके रूममेट्स बहुत अच्छे इंसान थे, जिन्होंने उसका साथ दिया। उसने एक कंपनी छोड़कर दूसरी पकड़ी, पर तबीयत ने साथ नहीं दिया और वह हारकर घर लौट आया।
घर लौटने के सिर्फ एक साल बाद, उस पर पुणे जाने की धुन सवार हो गई। वह किसी की सुनने को तैयार नहीं था। मां-बाप डरते थे कि इकलौता बेटा है, कहीं नाराज होकर कुछ गलत न कर बैठे। उन्होंने फिर से मन मारकर हां कह दी और पैसों की कोई कमी नहीं रखी। अपनी 20-21 साल की उम्र तक वह अपने पिता की खून-पसीने की कमाई के कम से कम 3 से 4 लाख रुपये यूं ही अपने भटकाव में उड़ा चुका था।
पुणे में उसने कई कंपनियों में काम किया, लेकिन कहीं भी टिक नहीं पाया। आखिर में जब हालात बिगड़े, तो उसे पुणे की एक इडली शॉप पर काम करना पड़ा। सुबह के 6 बजे से रात के 11-12 बजे तक लगातार खड़े रहकर काम करना क्या होता है—वहां उसकी रूह कांप गई। शरीर इतना टूट जाता था कि सोचना भी मुश्किल हो जाता था। उस इडली की दुकान ने उसे पहली बार सिखाया कि एक-एक रुपये की कीमत क्या होती है और पिता पैसा कैसे कमाते हैं।
लेकिन अफसोस, यह सबक भी ज्यादा दिन टिक नहीं पाया। एडमिशन के बहाने वह घर आया, फिर वापस पुणे जाकर एक लैपटॉप सर्विस सेंटर में काम किया। कुछ दिन बाद अचानक नया भूत सवार हुआ कि अब अहमदाबाद जाना है, क्योंकि गुजरात में परमानेंट नौकरी के चांस ज्यादा हैं। वह घर से निकला, लेकिन अभी सूरत ही पहुंचा था कि घरवालों के सब्र का बांध टूट गया। पिता ने सीधा फोन करके कह दिया—"अगर सूरत से सीधे घर वापस नहीं आया, तो आज के बाद एक रुपया भी नहीं मिलेगा। फिर अपनी जिंदगी खुद देख लेना।"
मजबूरी में वह सूरत से नासिक लौट आया। वहां त्र्यंबकेश्वर के पास घरों में लाइट फिटिंग और वायरिंग का काम करने लगा। तीन-चार महीने पसीना बहाने के बाद वहां एक ठेकेदार ने उसके मेहनत के 2000-2500 रुपये हड़प लिए और मुंह पर बोल दिया, "जा, तुझे जो उखाड़ना है उखाड़ ले।"
उस दिन उसे गहरा झटका लगा। उसने आईटीआई (ITI) भी किया था, लेकिन मार्केट में जाकर देखा कि बिना बड़ी डिग्री और स्किल के उसकी कोई कद्र नहीं है। गनीमत यह थी कि उसने 2024 में बीसीए (BCA) में एडमिशन ले लिया था।
और अब आते हैं आज के सच पर—साल 2026।
इस वक्त वह बीसीए के आखिरी साल (Final Year) में है। कुछ महीने पहले उसने फिर से घरवालों के सामने जिद पकड़ी कि उसे पढ़ाई पर फोकस करने के लिए अलग से रूम किराए पर लेना है। घरवालों ने बहुत कहा कि अपना इतना बड़ा घर है, यहीं आराम से पढ़ ले। पर अपनी जिद के आगे उसने किसी की नहीं सुनी। आज हर महीने उसके पीछे 6000 से 7000 रुपये पानी की तरह बह रहे हैं।
उसने सोचा था कि रूम लेकर वह अपनी जिंदगी बदल देगा। उसने हाथ-पैर भी मारे—AI चैटबॉट्स सीखे, AI ऑटोमेशन ट्राई किया, वीडियो एडिटिंग शुरू की, यहां तक कि अपना यूट्यूब चैनल भी शुरू किया। लेकिन उसकी सबसे बड़ी बीमारी अब कफ नहीं, 'कंसिस्टेंसी (निरंतरता) की कमी' बन चुकी है। वह कोई भी काम शुरू तो करता है, पर उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा पाता।
पिछले 5-6 महीनों से वह उस बंद कमरे में एक ऐसे दलदल में फंस चुका है जहां से निकलना उसके लिए नामुमकिन सा हो गया है। उसे 'ड्रामा' देखने का ऐसा भयानक एडिक्शन हो गया है कि दिन के 10 से 12 घंटे वह सिर्फ स्क्रीन के सामने गुजार देता है। पढ़ाई बिल्कुल जीरो है। इसके साथ ही एडल्ट कंटेंट और कुछ ऐसी आदतें भी उसे जकड़ चुकी हैं जिनका जिक्र मैं यहां खुलकर नहीं कर सकता।
गांव में बैठे उसके भोले माता-पिता को लगता है कि उनका बेटा शहर के कमरे में बैठकर दिन-रात पढ़ाई कर रहा है, अपना भविष्य बना रहा है। और यहां वह लड़का अपने मां-बाप की मेहनत के पैसे और भरोसे को हर रोज स्क्रीन की रोशनी में जला रहा है।
ऐसा नहीं है कि वह बेशर्म हो चुका है। मैं उसके सबसे करीब हूं—इतना करीब कि उसकी हर सांस का सच जानता हूं। उसने मुझसे खुद कहा है कि उसे अपने किए पर बहुत पछतावा होता है। अंदर ही अंदर वह खुद से घुटता है, रोता है, बदलना चाहता है... लेकिन जब सुबह आंख खुलती है, तो वह फिर उसी चक्रव्यूह में फंस जाता है। माता-पिता ने उसे बेइंतहा प्यार दिया, छूट दी, पैसा दिया—फिर भी वह खुद को संभाल नहीं पा रहा है।
मेरे रीडर्स के नाम एक जरूरी बात:
मुझे पता है कि मैंने काफी दिनों से कोई नई बुक या कहानी पब्लिश नहीं की है। बाकी की जो कहानियां अधूरी हैं, उन्हें भी मैं बहुत जल्द आगे बढ़ाऊंगा।
लेकिन अगर आप यह कहानी पढ़ते हुए यहां तक पहुंचे हैं, तो आज मुझे आपकी जरूरत है। यह लड़का मेरा सबसे करीबी है—मेरे लिए सबसे जरूरी। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं इसे इस दलदल से बाहर निकालने के लिए क्या सलाह दूं।
आप लोग कमेंट में मुझे बस इतना बताइए कि इस लड़के को अब क्या करना चाहिए? यह अपनी इस लत और भटकाव को तोड़कर वापस ट्रैक पर कैसे आए, ताकि अपने माता-पिता के इतने बड़े त्याग का थोड़ा सा कर्ज तो उतार सके? आपके एक सही सुझाव से शायद इसकी जिंदगी संभल जाए।
धन्यवाद।