पुनर्विवाह
केतन के दशगात्र का कार्यक्रम चल रहा था, केतन की पत्नी दीया बिलख बिलख कर रो रही थी |उसके सुहाग उतारने का कार्यकर्म तालाब किनारे किया गया , आस पड़ोस व दूर दराज से आये परिजन व रिश्तेदार घाट पर मौजूद थे ।दीया की चूड़ियां तोड़ी जा रही थी ,सिंदूर पोंछा जा रहा था, इस अवसर पर दीया बिलख पड़ी ।उसके सामने खड़ी उसकी सासू मां सुमन भी बिलख कर गिर कर बेहोश हो गई ।साल भर पहले सुमन के पति महेंद्र का देहांत हो चुका था । साल भर भी ठीक से नहीं गुजरा था,युवा केतन हृदय घात से खत्म हो गया, मां का दर्द और पुत्र वियोग की पीड़ा मां ही समझ सकती है ।बेटे की मृत्यु के बाद से सुमन उसकी याद में दिन में कई-कई बार बेहोश हो जाती है|वैसे भी सुमन अन्तर्मुखी स्वभाव की महिला है ,ज्यादा बोलने की आदत नहीं है ,किसी बात को लेकर वह मन ही मन घुटती रहती है,ज्यादा बोलना , जोर से बोलना उनकी आदत नहीं है|एक साल में ही पति और फिर युवा पुत्र का संसार से विदा हो जाना दुखदाई घटनाएं है । वे बार - बार बेहोश हो जाती थी ।
पति महेंद्र अस्थमा के मरीज थे ,बीमार रहते थे , केतन तो युवा और स्वस्थ था, वो एक दिन में ही चल बसा, वो भी दो छोटे - छोटे बच्चे को छोड़कर । युवा पत्नी दीया के सुहाग उतारने का दृश्य सुमन से देखा नहीं जा रहा था ,परिवार की बुजुर्ग महिलाएं व नाऊन दाई सामाजिक परम्पराये पूरी कर रही थी । नहाने के बाद दीया को सफेद साड़ी पहना दी गई । आज दीया लुट गई थी, दीया के चेहरे की रौनक उड़ गई थी।बच्चे भी बिलख रहे थे।अभी तो उन्होंने पिता के प्यार और स्नेह को ठीक से समझा भी नहीं था ,वे अनाथ हो गये। दोनों बच्चे अभी कॉलेज में पढ़ रहे थे आगे क्या होगा भविष्य अनिश्चित था ,सब अंधकारमय लग रहा था ।
छोटा बेटा मनीष अंतिम संस्कार में आये मेहमानों , मित्रों व परिचितों से मिलकर काम कर रहा था । केतन के बेटे चेतन ने पिता का दाह संस्कार किया था, वह भी अपना मुंडन करवा चुका था । घर का माहौल एकदम बदला हुआ था , मनीष घर में छोटा था ,पिता के जाने के बाद घर , दुकान , व व्यापार की जिम्मेदारी केतन ही सम्हाल रहे थे।मनीष एक प्रकार से केतन के आदेशों का पालन भर करता था । उसे दुनियादारी की ज्यादा सूझबूझ नहीं थी।पिता व केतन ही व्यापार व दुनियादारी निभाते थे |वह काम तो करता था ,परंतु उसे जिम्मेदारी का एहसाह नहीं होता था । यद्यपि वो स्वयं दो बच्चों का पिता था ,फिर भी घर में वो छोटा ही था ।
सभी रिश्तेदार , मित्र ,संबंधी मनीष से कहते - मां ,भाभी का व बच्चों का ध्यान रखना , तो वो गंभीरता से सिर हिला देता था , परंतु उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इतना बड़ा बिजनिस , चार बच्चों , मां ,भाभी और पत्नी की जिम्मेवारी वह कैसे सम्हालेगा ? वह भी बैठा - बैठा रोता रहता और जो जैसा बोलता,वो करता रहता ।
तेरहवीं का कार्यक्रम पूरा होने के बाद रिश्तेदार लोग अपनी - अपनी सलाह देकर अपने - अपने घर चले गये , अब सूना , विषाद व सिसकियों से भरा घर और सुमन , दीया,मनीष व बच्चे रह गये ।
चेतन पूना से बी. ई . कर रहा था।सुमन ने उसे अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए पूना भेज दिया ।
वो बोली — "बेटा अब तेरा पापा नहीं है ,तेरी जिम्मेवारी बढ़ गई है ,मन लगाकर पढ़ना और अपनी पढ़ाई पूरी करले , मै तुझे कोई तकलीफ होने नहीं दूंगी "।
चेतन बोला — " दादी घर के ऐसे हालात में आप सब दुखी है ,वहां मेरा मन पढ़ाई में कैसे लगेगा ? मैं अब नहीं पढ़ूंगा , यही आप सब के पास रहूंगा , चाचू भी अकेले हो गई है ,मैं उनका साथ दूंगा" ।
सुमन ने कहा — " तुम यहां की चिंता छोड़ो , मन लगाकर पढ़ाई पूरी करो ,फिर जो समझ में आए करना" ।
समझा बुझाकर सुमन ने चेतन को पढ़ने के लिए पूना भेज दिया।बेटी रिया बी. काम कर रही थी , उसने उसकी पढ़ाई भी चालू रखी । मनीष का बेटा अंकित 12 वी कक्षा में और बेटी दिशा 10 वी कक्षा में पढ़ रहे थे । सुमन ने सभी को पढ़ाई पूरी करने पर जोर दिया।चेतन का बी. ई. का आखिरी वर्ष था , इसलिए सबका कहना था - साल भर की बात है, चेतन की पढ़ाई पूरी हो जायगी, पढ़ाई के बाद वो मनीष के साथ साथ बिजनिस में हाथ बटाने लगेगा तो मनीष को सहारा हो जायेगा ।
चेतन का मन पढ़ाई में नहीं लगता था ,वह केतन को बहुत याद करता, व रोता रहता था । केतन उससे बहुत प्रेम करते थे , वह उन्हीं बातों को याद करता रहता ।
दीया दुख से भर गई थी, उसके दुख की सीमा नहीं थी ,दो बच्चों व अपने खुद के भविष्य के बारे में सोच सोचकर दुखी होती रहती थी । वह दिन भर घर काम में लगी रहती । मनीष की पत्नी वर्षा भी घर की नाजुक स्थिति को समझ रही थी । वह भी घर में सभी बच्चों का ध्यान रखती थी । इस बीच उसे भी बुखार रहने लगा । उसके बीमार रहने पर दीया घर की जिम्मेदारी सम्हाल लेती थी , साधारण सा लगने वाला बुखार बढ़ता गया तो सुमन ने मनीष से कहा — " बेटा वर्षा को यहां तो तुम डॉक्टरों को दिखा रहे हो ,पर उसकी तबियत सुधरने के बजाय बिगड़ते जा रही है, तुम उसे रायपुर ले जाकर किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा दो” ।
मनीष बोला — " ठीक है मां , मैं आज ही ले जाता हूँ उसे 105 डिग्री बुखार है ,वह बुखार में तप रही है” ।
मनीष फौरन अपनी गाड़ी से वर्षा को लेकर रायपुर चला गया , और रायपुर में उसने वर्षा को अस्पताल में भर्ती करवा दिया ,वह अपने साथ भतीजी रिया को भी ले गया ताकि रिया के रहने से सहारा हो जायेगी । वर्षा की हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती गई, वहां उसे वेंटिलेटर पर रख दिया गया , वह कोमा में चली गई और चौथे दिन वह भी डॉक्टर के प्रयासों बावजूद नहीं बच पाई ।
वर्षा के शव को लेकर मनीष और रिया वापस घर आ गए , वर्षा के माता-पिता और रिश्तेदार भी आ गये फिर घर में एक मौत और हो गई । घर में विषाद , दर्द , पीड़ा भर गई , अब लोगों के मन में कई शंकाये ,वहम चालू हो गये, कोई कहता — " किसी ने कुछ किया है ,तभी इतनी जल्दी मौते हो रही है । एक के बाद दूसरी व तीसरी मौत थी" ।
महेंद्र की मौत को तो लोग स्वाभाविक मौत मान रहे थे परंतु केतन और वर्षा की मौत को कोई स्वाभाविक मौत नहीं मान पा रहे थे । दोनों मौत युवा लोगों की थी , केतन पचास वर्ष की उमर में गया और वर्षा चालीस के आस - पास थी , लोगों को लगता था , कुछ न कुछ ऊपर की हवा व जादू टोने का प्रभाव है पंडितों व पुरोहित के साथ - साथ बैगा व गुनी लोगो व झाड़ फूंक का काम करने वालो से बात चीत भी की गई । और उनके बताये अनुसार पूजा पाठ भी किये गये । दुखी इंसान क्या नहीं करता ? जो भी जो सलाह देता वही घर में किया जाने लगा ।
किसी ने कहा— भागवत कराओ ,तो बनारस से पंडित बुलाकर घर में भागवत भी की गई ,किसी ने कहा जवान मौतें हुयी है - इनकी गया जी करनी चाहिए तो - मनीष और चेतन गया जी जाकर पिंडदान व तर्पण भी कर के आ गये । जो जैसा बोलता - मनीष और सुमन वैसा ही पूजा पाठ करते ,पंडितों को दक्षिणा देते और दान पुन्य करते । एक अज्ञात भय और आशंका पूरे घर व परिजनों में बस गई थी |सभी सदस्य घबराए रहते थे । ऐसे में घर खर्च बढ़ता जा रहा था ,काम धंधे के प्रति लापरवाही बढ़ती जा रही थी |घर में हर दम अवसाद घिरा रहता था ।दिवार पर टंगे कलेंडर की तारीख तो बदल रही थी, पर घर की नियति वहीँ जमी थी ,जो मौतो के समय थी |सुमन के साथ – साथ मनीष व दीया के चेहरे विषाद से भरे रहते |घर में ऐसा सन्नाटा पसरा रहता, जो कलेजा को चीरता हुआ पार निकल जाता था | किस्मत भी ऐसी लात मारती है ,जो बंदा उठने लायक नहीं रहता | सुमन के चेहरे की झुर्रियां रोज बढ़ती जाती थी |
सुमन भी रात - रात भर सो नहीं पाती थी , सोचती - एक बेटा है तो बहू नहीं है ----- एक बहू है तो बेटा नहीं ---- दो बच्चों की मां नहीं ----- और दो बच्चों का बाप नहीं ----- । मेरा ही घर कैसा उजड़ गया ---- सभी बच्चे दुखी है ,घर अब घर नहीं लगता ---- बच्चों को भी क्या कहकर समझाऊँ ? ----- कुछ समझ नहीं आता ----- मन ही मन सुमन विषाद से भर जाती । बच्चे ---- भी छोटे नहीं थे ,जिन्हें समझाया या बहलाया जा सके ----- वे भी अपने मां अपने पिता को भूल नहीं पाते थे । भगवान ने पूरे परिवार की कड़ी परीक्षा ली थी , घर की मार्मिक स्थिति को देखकर घर की बेजान चीजें भी रो रही थी | घर ,कमरे ,बिस्तर ,रसोई ,आफिस सभी अपने मालिको का याद कर विसूर रहे थे | विधना के लेख भी अजीब होते है |
कभी - कभी सुमन मनीष के पास बैठकर बहुत रोती |कभी दीया को समझाती ,घर का हाल विचित्र था । कभी सोचती ----- इन बच्चों का भविष्य क्या होगा ? दीया और मनीष दोनों जवान है ,दोनों का जीवन पड़ा है ,इन्हें ही घर की जिम्मेवारी सम्हालनी है ,और आगे भी घर सम्हालेंगे ,परंतु कैसे ? कई प्रश्न उठ जाते थे । इसी बीच सुमन के बेटी दामाद - पारुल और दिनेश बार - बार सुमन से मिलने व ढाढ़स बंधाने आते रहते थे ,एक दिन दिनेश ने सुमन से कहा — "मां ,आप मनीष व दीया की शादी कर दो , तो ठीक रहेगा" ।
सुमन बोली — आपका सुझाव ठीक है ,परंतु दोनों के बच्चे बड़े-बड़े हैं ,वे इतने छोटे नहीं है ,जो उन्हें बहलाया जा सके और इतने बड़े भी नहीं है ,जो स्थिति की गंभीरता को समझे । फिर रिश्तेदार व जान पहचान वाले भी क्या कहेंगे ?
दिनेश — “अब जिसको जो कहना है ,वह तो कहेंगे ही ,आप स्वयं निर्णय लो , हां बच्चों को समझाना जरूरी है” ।
सुमन बोली — मनीष और दीया से भी बात करनी पड़ेगी ।
दिनेश बोले — मैं बात करता हूं।
सुमन बोली — मैं भी समझती हूं , बिना शादी के ये लोग एक घर में रहेंगे, तो लोग लांछन लगाये बिना मानेंगे नहीं । थोड़ा भी कहीं आएंगे जायेंगे ,तो लोग हंसेंगे, इनका पूरा जीवन पड़ा है बच्चों के काम भी करने है, दवाई आदि के लिए जाना आना भी होगा ही, तो भी दुनिया वाले बाते कर कर के जगत हंसाई जरूर करेंगे | समझ में नहीं आता क्या किया जाय ?
दिनेश बोले — सलाह मशवरा कर लो ,रिश्तेदारों से भी पूछ लो ।
सुमन बोली — नगर व समाज के लोगों से व बच्चों से सलाह किए बिना उतावली में कुछ भी नहीं करना है , सोच समझ कर निर्णय लिया जाय।
इसी बीच मनीष के चचेरे भाई की पत्नी रजनी - अपनी तलाक शुदा एक बच्चे की मां ,बहन ललिता - से मनीष की शादी का प्रस्ताव लेकर आ गई |
रजनी का कहना था — ललिता का अपने पति से तलाक हो चुका है , ललिता अच्छी लड़की है ,उसकी भी एक ही लड़की है, उससे मनीष का पुनर्विवाह कर दिया जाय ।
सुमन ने उससे कहा — "घर में सलाह करके बताऊंगी" सुमन ने उससे कह तो दिया कि बाद में बताऊंगी परंतु सुमन समझ रही थी कि ललिता के इस घर में आने पर ललिता और मनीष व ललिता की लड़की तीन लोग ही सुखी रहेंगे ,बाकी चारों बच्चों व दीया का जीवन दूभर हो जायेगा । खाता-पीता उच्च मध्यम वर्गीय परिवार है ,कोई भी महिला यहां आकर सुख पायेगी , दूसरों का हित कौन देखता है ?
सुमन सोचने लगी ----- पैंतालिस साल की उमर में मनीष को कोई तलाक सुदा या विधवा ही महिला मिलेगी ----- बाहर की महिला और उसके बच्चे का बोझ उठाने से तो अच्छा है ,अपने ही घर की विधवा बहू से पुनर्विवाह कर दिया जाय ---- चारों बच्चे साथ रहते हैं ,बड़ी मां बन कर दिया ,चारों बच्चों का खाना बनाती है और सबको खिलाती है फिर बाहर से और महिला लाने की बजाय घर की बहू का पुनर्विवाह कर दिया जाय, परंतु बच्चों की राय भी जरूरी है । सुमन ने बच्चों की राय जानने के लिए दिनेश व पारुल से कहा ----
पारुल ने अंकित और दिशा से इस विषय में बात की तो अंकित व दिशा बोली ---- "बड़ी मम्मी के साथ हम रह लेंगे , परंतु बाहरी और किसी महिला को हम माँ नहीं मान सकते । बड़ी मम्मी शुरू से हमें लाड़ प्यार देती रही है, अभी भी वही खाना देती है, बड़ी मां के साथ पापा की बात मंजूर है, किसी और के साथ हम नहीं रहेंगे ।"
चेतन इस शादी के पक्ष में नहीं था ,वह अपने पापा की जगह किसी को भी स्वीकार नहीं कर पा रहा था ,जबकि दिया को कोई आपत्ति नहीं थी ,वह इस विषय पर - " आप लोग जानो" , कहकर चुप हो गई थी ।
पारुल व दिनेश ने बड़े प्यार से चेतन को समझा बुझा कर तैयार किया । बच्चों की सहमति के बाद दीया के मायके वालों से बात करना था । दीया की बहन और बहनोई इस शादी के लिए अति उत्साहित थे, परंतु दीया का भाई बहाने लगाने लगा । अधिकतर रिश्तेदारों ने अपनी सहमति दे दी ,फिर भी नगर के प्रतिष्ठित व गणमान्य व्यक्ति व समाज प्रमुख से भी सुमन ने अपनी ओर से बातचीत की - सबकी सहमति मिलने पर और प्रोत्साहित करने पर निर्णय लिया गया कि अक्षय तृतीया सर्वमान्य शुभ मुहूर्त पर यह कार्य संपन्न कर दिया जाय।
साधारण सा कार्यक्रम कर सुमन ने अक्षय तृतीया के दिन पंडित को बुलवाकर वह नगर के चार गणमान्य नागरिकों व समाज प्रमुख की उपस्थिति में पुनर्विवाह की औपचारिकता पूरी कर दी गई । बाहर से किसी रिश्तेदार को नहीं बुलाया गया था ,उन्हें फोन से सूचना दे दी गई ।इस कार्यक्रम के दौरान सुमन कांपते हाथो और धड़कते दिल से औपचारिकता करती जा रही थी | उसके चेहरे पर अनिश्चित भविष्य की कई शंकित लकीरे उमरती रहती थी ,युवा होती पौत्र पौत्रियों ,सभी का भविष्य उसे चिंतित किये जा रहा था ,वह यंत्रवत सब करते जा रही थी |उसे ना कोई खुशी ना कोई उत्साह | पूरा परिवार अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़ रहा था |पुनर्विवाह संवेदनाओ का संग्रह नहीं होता ,यह तो विवशताओं का समझौता होता है, जिसमें दोनों पक्ष अपनी मजबूरियों और विवशताओं को समझते और निभाते है । यह उमंग उत्साह का पर्व नहीं होता , जीवन गुजारने की लाचारी होती है ।
रजनी को जैसे ही सूचना मिली उसने अपनी सास यानी मनीष की चाची को भड़काना शुरू कर दिया - देवर के साथ भाभी की शादी शोभा नहीं देती - भाभी मां के बराबर होती है, उसने मनीष और सुमन के बारे में गलत प्रचार चालू कर दिया । चाची पुष्पा बाई नाराज हो गई और उन्होंने सुमन से कहा — " शादी की क्या जरूरत थी ? बिना शादी के भी तो रह सकते थे ,ये लोग ।समाज में लोग क्या कहेंगे ? हमारे बच्चो की शादी के समय अडचने आएगी |
सुमन ने कहा — आप ठीक कहती है , बिना शादी के भी यह लोग रह सकते थे परंतु इतना लंबा जीवन है, कभी साथ-साथ बाहर जाते हो ,भले बीमारी में डॉक्टर को दिखाने जाय और दोनों को साथ जाना ही पड़ेगा ,तो लोग तरह तरह की बातें करते , आप किसी को कुछ नहीं बोल सकते , लोग लांछन लगाने में देर नहीं करते , इसलिए मैने यह पुनर्विवाह कर दिया है - अब दीया व मनीष कह सकेंगे कि हमारी मां ने ही यह पुनर्विवाह किया है - इनको भी कही आने जाने में संकोच नहीं होगा । एक उम्र के बाद इंसान को लगता है कि हमारे पास भी कोई अपना होता ।
लोग भी अजीब है, दुख में मौखिक संवेदना सब प्रकट कर देंगे , परंतु दूसरे की थोड़ी सी सुविधा भी बरदास्त नहीं कर पाते । यहाँ भी लोगों का निजी स्वार्थ आ जाता है ।दूसरो की मजबूरी का लाभ लेने के जुगाड़ में रहते हैं.
छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर
Email-shiromanimathur@gmail.com
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