Vo Ladki in Hindi Short Stories by Shweta Misra books and stories PDF | Vo Ladki

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Vo Ladki

  • ______वो लड़की_______
  • कल गुहु का जन्मदिन है... उसने अपने पिता कि शुभकानाओं का इंतज़ार रात के १२ के बाद से ही करना शुरूकर दिया था ......हर फोन की घंटी पर दौड़ पड़ती ....बार-बार पेजर ऑन करती और उनके मैसेज का इंतज़ार करती ...रात यूँ ही बीत गयी इंतज़ार में .....सुबह की लालिमा अब उसकी आँखों में तैरने लगा थी .....हम सभी हॉस्टल की लड़किया गुहु के लिए दोपहर में ही पार्टी रखी थी ..... गुहु होस्टल में सबसे चहेती लड़कियों में से एक थी ...शाम को उसका मंगेतर आने वाला था ......उसे आउटिंग के लिए ले जाने के लिए ....हर पल हंसने वाली गुहु आज छुप-छुप रोने के बहाने ढूंढ रही थी ....गुहु को ऐसा मैंने पहले कभी नही देखा ...हर बार गुहु क्रिसमस की छुटीयों में घर चली जाती थी .... और १५ जनवरी से पहले नही आती थी .... इस बार छुट्टिया भी कम ही थी इसलिए उसे भी जल्दी ही आना पड़ा ....उसे अपने पिता से बहुत प्यार था ....और बहुत सारी उम्मीदें भी थी शायद इतनी उम्मीद तो हर लड़की को अपने पिता से करने का अधिकार भी है .......दिन बीत गया सहेलियों में ...शाम भी गुज़र गयी मंगेतर के प्यार में .....रात फिर आ गयी ...और अब भी उसका इंतज़ार ठहरा ही रहा ...... हम दोनों रूममेट थे ....मुझसे कहा तू सो जा ......और .....जब मेरी आँख खुली तो मैंने देखा ....रद्दी की टोकरी सफ़ेद कागज़ से भर गयी थी .....जाने क्या लिखना चाह रही थी,,,
    रात भर स्टडी टेबल पर बैठी रही ...मैंने उठ कर देखा तो हर पन्ने पर एक ही
    बात ...और पेन से काटा हुआ मैंने गुहु से सवाल किया 'आखिर तू करना क्या चाहती
    है' क्या है तेरे मन में जो लिखना भी चाहती है और नही भी ...ये कैसा
    अंतर्द्वन्द है आखिर कब तक ???किस आकाश और ज़मीन के बीच तू उलझी है तेरा खुद का
    वजूद है फिर क्यूँ तू ......
    मैंने झुककर दूसरे पन्ने को भी उठा लिया .......
    गुहु ने मेरे हाथ से कागज़ ले लिया और कहने लगी आज मैं सब को जला दूंगी .....और
    अब कभी कुछ भी नही लिखूंगी ...
    मैं हतप्रद उसे देखे जा रही थी समझ नही आ रहा था कि क्या करूँ ......और कैसे????
    तभी गुहु बोली जो चीज़ मेरी थी ही नही मैं उसकी उम्मीद ही क्यूँ करती रही??
    गलती मेरी है .....बस मेरी और मेरे दुःख का कारण भी यही .....सभी के जीवन
    में खुशिया हो जरुरी तो नहीं .....
    मैं ही पागल थी घृतराष्ट्र की दुशाला बनने के ख्वाब सजोये बैठी थी ...भूल गयी थी क़ि उसके दो ही बेटे थे दुर्योधन और दुःशासन .........जिसके लिए वो जीता और मरता था ...जिसकी ख़ुशी उसके लिए सब कुछ थी .....जिसका गम उसे तोड़ता था...मैं ..... मैं क्या हूँ एक बोझ ..... जो जल्द ही उतर जाउंगी ....अस्थाई नौकरी वाला १६०० रु.कमाने वाला ...फॉरेन रिटर्न का लेबल लगा हुआ ..सस्ता सुन्दर टिकाऊ लड़का मिल ही गया है .....जल्द ही उसके गले बांध दी जाउंगी .......जिंदगी किस धारे में बहेगी ...कुछ पता नही .......
    शायद रिश्ते की घनिष्टता और बढ़ेगी मेरी और मेरे कलम की .......दादी की बाँहों में पलने बाद ...अपने होश में आने के बाद ...टूटे फूटे शब्दों से रिश्ता जुड़ने लगा था ..माँ का प्यार हो या पिता का यहीं ..बस यहीं महसूस होने लगा था ...... आज आखिरी उम्मीद थी मुझे अब तक यही भ्रम था कि मैं अपने पिता कि लाड़ली बेटी हूँ ...प्यारे भाइयों की अकेली बहन ....अच्छा हुआ भ्रम टूट गया .....उम्मीद बहुत तक़लीफ़ देती है.....जब से होश सम्भाला था खुद को बहुत तक़लीफ़ देती रही .....पर अब नही .....अब मुझे खुद से रिश्ता निभाना है .....अपने प्यार और अपने शब्दों से रिश्ता निभाना है ...अब मुझे सब भूलकर जीना होगा ...........हर बंधन को भूलकर पंछी कि तरह खुले आसमान में उड़ूंगी .....और पेड़ों पंछियों से ही साथ निभाउंगी...............खिलते धूप कि तरह मेरी रचनाएं भी खिल उठेंगी ...तारों की तरह हर शब्द जगमगा उठेंगे मैं भी अब हरश्रृंगार के फूलों की तरह डालियों से गिरने पर शोक नही मनाउंगी बल्कि अपनी खुशबु से अपने आस पास के वातावरण को महकाने कि कोशिश करुँगी ........
    आज गुहु के हँसते चेहरे के पीछे का ये छुपा दर्द मेरे सीने में उतर आया ..... मैंने ईश्वर से कहा ये तेरा कैसा न्याय है ...जिसे हॅसने की चाह होती है तू उसे ही क्यूँ इतना रुलाता है ?? जिसे बेटियां बोझ लगती हैं उसके आँगन में बेटी का बीज क्यूँ रोप देता है ?? शुक्र है ...मेरा कोई भाई या बहन नही ...........!
    मैं समझ नही पा रही थी कि ये लड़की है या हरश्रृंगार की डाली से टूटी हुई और खुशबु लुटाती हुई एक फूल !!