Amrut Vaani in Hindi Spiritual Stories by Nitya Oswal books and stories PDF | अमृत वाणी - संत वाणी - 39

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अमृत वाणी - संत वाणी - 39

“प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥” 

गहरे अर्थ की व्याख्या (भाषाई गहराई के साथ)
यह पंक्ति भगवान श्रीराम के समक्ष स्वयं समुद्र देव ने अपनी जड़ता (अज्ञानता) को स्वीकार करते हुए कही है। ऊपरी तौर पर देखने पर ऐसा भ्रम होता है कि इसमें महिलाओं और समाज के एक वर्ग का अपमान किया गया है, परंतु सत्य इसके ठीक विपरीत है।

इस चौपाई को समझने की सबसे बड़ी कुंजी अवधी भाषा का शब्द ‘ताड़ना’ है। आधुनिक हिंदी में ‘ताड़ना’ का अर्थ किसी को घूरना या प्रताड़ित करना मान लिया गया है, जो कि बिल्कुल गलत है। अवधी और ब्रजभाषा के कोश (Dictionary) के अनुसार ‘ताड़ना’ के मूलतः तीन अर्थ होते हैं :
देखभाल करना या नजर रखना  
शिक्षा देना या सही दिशा दिखाना
समझना या भांपना। जैसे हम आम बोलचाल में भी कहते हैं–“मैंने उसकी चालाकी ताड़ ली (भांप ली)।”

यहाँ समुद्र देव भगवान राम से कह रहे हैं कि जैसे प्रकृति के अलग-अलग तत्वों को सहेजने के लिए अलग-अलग प्रकार की ‘ताड़ना’ (विशेष ध्यान या नियंत्रण) की जरूरत होती है, वैसे ही मैं भी एक जड़ (मूढ़) तत्व हूँ, जिसे सही रास्ते पर लाने के लिए आपकी इस ‘सिख’ (चेतावनी) की आवश्यकता थी।

व्यावहारिक उदाहरण (सूक्ष्म विश्लेषण के साथ)
तुलसीदास जी ने जिन 5 श्रेणियों को चुना, वे समाज और प्रकृति के 5 अलग-अलग स्तंभ हैं। उनके प्रति व्यवहार को ऐसे समझें :
ढोल (लय बिठाना) : ढोलक मिट्टी या लकड़ी की होती है जिस पर चमड़ा मढ़ा होता है। मौसम बदलने पर (जैसे ठंड या बारिश में) उसकी चमड़ी ढीली हो जाती है। यदि संगीतकार उसे बिना ताड़े (बिना कसे, बिना ट्यून किए) जोर से पीटेगा, तो ढोलक फट जाएगी। यहाँ ताड़ना का अर्थ है– उसका संतुलन और सुर ठीक रखना।

गंवार (अज्ञानी को सिखाना) : ‘गंवार’ शब्द ‘गाँव’ से बना है, जिसका मूल अर्थ था सीधा-सादा ग्रामीण व्यक्ति जिसे बाहरी दुनिया की चालाकियों का ज्ञान न हो। ऐसे भोले व्यक्ति पर विशेष ध्यान रखना पड़ता है ताकि कोई ठग उसे मूर्ख न बना दे। यहाँ ताड़ना का अर्थ है– मार्गदर्शन और सुरक्षा।

• शूद्र (मैनेजमेंट/श्रमिक) : यहाँ शूद्र का अर्थ किसी जाति विशेष से नहीं, बल्कि ‘सेवा भाव’ और ‘श्रम’ (Labour/Employee) से है। किसी भी फैक्ट्री या दफ्तर में यदि लेबर या कर्मचारियों को सही निर्देश (Instructions) न दिए जाएं, तो काम बिगड़ जाता है। यहाँ ताड़ना का अर्थ है– अनुशासन और सही सुपरविजन।

• पशु (स्नेहपूर्ण नियंत्रण) : यदि आपके घर में कोई पालतू कुत्ता या गाय है, तो आप उसे लाठियों से नहीं पीटते। लेकिन आपको उस पर नज़र रखनी होती है कि वह कहीं भाग न जाए या किसी को काट न ले। यहाँ ताड़ना का अर्थ है– रस्सी से बांधकर रखना और स्नेहपूर्ण नियंत्रण।

• नारी (सर्वोच्च सुरक्षा और आदर) : तुलसीदास जी के समय (मुगल काल) में विदेशी आक्रमणकारियों के कारण समाज में स्त्रियाँ बिल्कुल सुरक्षित नहीं थीं। उस दौर में बेटियों और बहनों को विशेष सुरक्षा चक्र की आवश्यकता थी। यहाँ नारी के लिए ताड़ना का अर्थ है– अत्यंत संवेदनशीलता से सुरक्षा करना और आदर देना।

विरोधाभास का सबसे अचूक समाधान (रामचरितमानस के प्रमाण)
यदि कोई यह तर्क दे कि तुलसीदास जी महिलाओं या पिछड़ों के विरोधी थे, तो रामचरितमानस की ही अन्य चौपाइयाँ इस विरोधाभास को पूरी तरह खारिज कर देती हैं :
• महिलाओं के प्रति तुलसीदास जी के वास्तविक विचार : इसी रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लिखा है कि जो व्यक्ति अपनी पत्नी को अपनी आत्मा के समान नहीं मानता, वह पापी है :

“अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥”
(छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्र की पत्नी और बेटी– ये चारों समान हैं। जो इन्हें बुरी नजर से देखता है, उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए।)

यदि तुलसीदास जी महिलाओं को पीटने के पक्ष में होते, तो वे स्त्रियों को समाज में इतना ऊंचा और पूजनीय स्थान कभी न देते।

• वंचितों के प्रति दृष्टिकोण : भगवान राम जब अरण्यकांड में माता शबरी के आश्रम जाते हैं, तो वे समाज की बनाई ऊंच-नीच की दीवारों को एक पल में ढहा देते हैं। वे कहते हैं:

“कहु भामिनि भामिनी कहूँ तोही। कहहु भगति कइ कवनि बिवोही॥”
“मानऊँ एक भगति कर नाता। जाति पाति कुल धरम बड़ाई॥”
(मैं केवल भक्ति का नाता मानता हूँ। जाति, पाति, कुल या धर्म की बड़ाई से मेरा कोई लेना-देना नहीं है।)

निष्कर्ष : यह चौपाई किसी राजा, संत या भगवान राम का आदेश नहीं है। यह केवल एक डरे हुए ‘समुद्र’ का आत्मसमर्पण है। इसे सनातन धर्म का नियम मानना वैसा ही है जैसे किसी फिल्म के विलेन के संवाद को पूरी फिल्म का मुख्य संदेश मान लेना।

जीवन के लिए मुख्य सीख
★ अधजल गगरी छलकत जाए : किसी भी धार्मिक ग्रंथ की एक पंक्ति को पूरी किताब से अलग करके देखने पर हमेशा भ्रम (विरोधाभास) पैदा होगा। हमें हमेशा पूरी बात और उसके पीछे के संदर्भ (Context) को समझना चाहिए।

★ अधिकार के साथ जिम्मेदारी : आपके घर या कार्यस्थल पर जो भी आपसे पद में छोटा है, कमजोर है, या जिस पर सुरक्षा की जिम्मेदारी है, उसका शोषण नहीं करना है, बल्कि उसे सही दिशा देनी है।

★ कुसंगत और भ्रामक बातों से बचें : आज इंटरनेट पर बहुत से लोग धर्म को बदनाम करने के लिए इन चौपाइयों का गलत प्रचार करते हैं। एक सच्चे खोजी को हमेशा सत्य की गहराई तक जाना चाहिए।

आज की पावन प्रार्थना 
“हे सच्चिदानंद प्रभु श्रीराम, मेरे मन से अज्ञानता के सारे जालों को काट दीजिए। मुझे ऐसा निर्मल विवेक दीजिए कि मैं किसी भी महापुरुष की वाणी के मर्म को सही रूप में समझ सकूँ। हे राघव, मुझे ऐसी शक्ति दें कि मैं अपने कर्मों से समाज के हर वर्ग, हर जीव और विशेषकर मातृशक्ति (नारी) को सर्वोच्च सम्मान, सुरक्षा और आदर दे सकूँ। मेरे भीतर का अहंकार मिटे और प्रेम का प्रकाश फैले। 🙏”