सब पर भरोसा करो, लेकिन पहली बार कोई भरोसा तोड़ दे तो फिर दोबारा भरोसा मत करो।
आज भी मैं इसी नियम पर चलता हूँ।
मैं अपनी गलतियों से भागता नहीं हूँ। अगर गलती मेरी हो तो मैं अपनी गर्दन झुका दूँगा, अपनी गलती स्वीकार कर लूँगा और जरूरत पड़ी तो माफी भी माँग लूँगा।
लेकिन अगर गलती मेरी नहीं है, तो फिर मैं गलत को सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं करूँगा कि सामने वाला अपना है।
शायद यही मेरी एक खासियत है।
मैं रिश्तों को दिल से निभाता हूँ, लेकिन जब कोई बार-बार मेरे भरोसे को तोड़ता है, तो फिर मैं उसे अपनी जिंदगी में उसी जगह पर वापस नहीं आने देता।
वक्त ने मुझे बहुत कुछ सिखाया।
पहले मैं लोगों पर भरोसा करता था और फिर उनके हिसाब से बदल जाता था।
अब मैं खुद को जानता हूँ, इसलिए किसी के बदल जाने से खुद को नहीं बदलता।
मैं आज भी वैसा ही हूँ—बस पहले से थोड़ा ज्यादा समझदार और थोड़ा कम भरोसा करने वाला।
एक अच्छी बात शायद भगवान ने मेरे लिए पहले से ही लिख रखी थी।
जिस दिन मेरी उस रिश्ते में आखिरी बार बात हुई, उसी दिन पता नहीं क्यों मेरी एक पुरानी दोस्त का Instagram पर मैसेज आया। शायद यह सिर्फ एक संयोग था, लेकिन उस समय मुझे लगा जैसे भगवान ने मेरे लिए कोई रास्ता खुला छोड़ दिया हो।
उसके बाद हमारी थोड़ी-थोड़ी बात होने लगी। अब हमारी ज्यादातर बातें Instagram के मैसेज में ही होती हैं, क्योंकि उस समय पहली लड़की की वजह से मैंने अपनी इस दोस्त का नंबर तक डिलीट कर दिया था।
मुझे सबसे ज्यादा अच्छा वह दिन लगा था जब 1 जनवरी को अचानक उसका Instagram पर कॉल आया और उसने बस इतना कहा—
“Happy New Year.”
पता नहीं क्यों, लेकिन उसके उन दो शब्दों ने मेरे दिल को बहुत सुकून दिया था।
मैं उसे पहले से ही पसंद करता था और शायद आज भी करता हूँ। लेकिन मैंने इस पसंद को हमेशा एकतरफा ही रखना बेहतर समझा।
क्योंकि मैं डरता हूँ।
डरता हूँ कि अगर मैंने अपने दिल की बात कह दी और फिर वही सब दोबारा हो गया जो पहले हो चुका है, तो शायद मैं फिर से उसी दर्द से नहीं गुजरना चाहता।
इसलिए मैंने अपने दिल की बात अपने दिल में ही रखी।
समय बीतता गया।
मुझे घर गए हुए लगभग एक साल आठ महीने हो चुके थे। इतने लंबे समय तक गाँव नहीं गया था। फिर अचानक एक दिन घर जाने का प्लान बना और अगले ही दिन मैं घर पहुँच गया।
घर पहुँचते ही सब कुछ फिर वैसा ही हो गया, जैसे इतने लंबे समय से कुछ बदला ही न हो।
पहले दिन घर जाते ही खाना खाया और फिर सो गया।
अब मुझे यही अच्छा लगने लगा था।
माँ के हाथ से सिर की मालिश करवाना… बहनों का अपने सिर के सफेद बाल मुझसे तुड़वाना… ये छोटी-छोटी बातें मुझे अंदर तक खुशी देती थीं।
उम्र लगभग 28 साल हो गई थी, लेकिन घर पहुँचते ही पता नहीं क्यों मैं फिर वही छोटा-सा बच्चा बन जाता था।
और घर पहुँचकर अपने जानवरों को देखना तो जैसे मेरी सबसे बड़ी खुशी थी।
बिल्लियों से तो मैं आज भी बातें करता हूँ।
मजेदार बात यह है कि बिल्लियों की आवाज भी मेरी होती है और मेरी आवाज भी कई बार बिल्ली जैसी हो जाती है। 😄
रात को तो मैं अपनी बिल्ली को अपने साथ ही सुलाता था।
शायद दुनिया के लिए यह छोटी-सी बात हो, लेकिन मेरे लिए यही मेरी खुशी थी।
मुझे देर से उठने की आदत है। गाँव पहुँचते ही मैं आराम से सोता रहता और मेरी दादी मुझे उठाने के लिए पूरा घर सिर पर उठा लेती थीं।
लेकिन सच कहूँ तो दादी की उस डांट में भी बहुत प्यार था।
मेरी दादी मुझे बहुत प्यार करती हैं।
उन्होंने मेरे लिए एक साल पुराना अचार तक संभालकर रखा हुआ था, क्योंकि उन्हें पता था कि मुझे अचार बहुत पसंद है। इसके साथ अलग-अलग तरह के जूस और न जाने कितनी खाने की चीजें उन्होंने मेरे लिए रखी थीं।
तब समझ आता था कि किसी इंसान के लिए सबसे बड़ी दौलत क्या होती है।
पैसा नहीं…
कोई ऐसा होना जो आपके आने का इंतजार करे।
और दादी का प्यार तो कुछ अलग ही था।
जब मैं पहली बार देहरादून आया था, तब दादी ने मेरे लिए एक चप्पल खरीदी थी। वह चप्पल इतनी संभालकर रखती थीं कि जब तक मैं घर नहीं आता, वह बाहर ही नहीं निकलती थी।
और अगर गलती से घर में किसी दूसरे ने वह चप्पल पहन ली…
तो फिर उसकी खैर नहीं। 😂
आज सोचता हूँ तो लगता है, जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ दिया और बहुत कुछ छीना भी।
कुछ लोग आए और चले गए।
कुछ रिश्ते टूट गए।
कुछ बातें दिल में रह गईं।
लेकिन जब मैं घर लौटता हूँ तो मुझे फिर वही चीजें मिल जाती हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं मिल सकतीं—
माँ के हाथ की मालिश, बहनों का प्यार, दादी की डांट, घर का खाना, पुराना अचार, वो चप्पल…
और मेरे बेजुबान साथी।
शायद इसलिए मेरे लिए घर सिर्फ एक जगह नहीं है।
घर वो जगह है जहाँ मैं चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाऊँ…