वह सबसे नाराज़ थी—अपने भाइयों से भी और उस पूरे हालात से भी, जिसने उसे अंदर तक हिला दिया था।
उस रात घर में किसी ने खाना नहीं खाया।
शिवाय इसी उधेड़बुन में घर से पैदल निकल पड़ा था। उसके मन में बार-बार यही सवाल उठ रहा था कि कहीं उसने शक्ति के साथ कुछ ज़्यादा बेरुखी तो नहीं दिखा दी।
रात अब और गहरी हो चुकी थी।
अस्सी घाट लगभग खाली हो गया था। घाट की सीढ़ियों पर पसरा सन्नाटा और गंगा के पानी में तैरते छोटे-छोटे दीये पूरे माहौल को एक अलग ही शांति दे रहे थे।
शक्ति सीढ़ियों पर चुपचाप बैठी उन दीयों को बड़े ध्यान से देख रही थी।
तभी पीछे से किसी की आवाज़ आई—
"जानती हो... जो couple घाट पर साथ मिलकर दिया जलाते हैं ना, वो हमेशा साथ रहते हैं।"
शक्ति ने पलटकर नहीं देखा।
आवाज़ फिर आई—
"ज़िंदगी में कितना भी अंधेरा क्यों न आए... अगर दो लोग एक-दूसरे की उम्मीद का दीपक बने रहें, तो उनका रास्ता कभी पूरी तरह अंधेरा नहीं होता।"
शक्ति की आँखें कुछ पल के लिए पानी पर ठहर गईं।
वह आवाज़ उसके लिए अनजान नहीं थी।
धीरे से उसने पीछे मुड़कर देखा।
शिवाय शक्ति से दो सीढ़ियाँ ऊपर बैठा था। उसकी नज़रें भी गंगा के शांत पानी में तैरते दीयों पर टिकी थीं।
शक्ति ने उसे देखा, फिर बिना कुछ कहे अपनी नज़रें वापस पानी की तरफ कर लीं।
कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही।
फिर शक्ति ने सपाट आवाज़ में पूछा—
"यहाँ क्यों आए हो?"
शिवाय ने पानी से नज़रें हटाए बिना कहा—
"क्यों? घाट पर आकर बैठने में कोई tax लगता है क्या?"
शक्ति ने उसकी तरफ देखा।
"मुझे तुम्हारे यहाँ होने से परेशानी है।"
शिवाय हल्का-सा मुस्कुराया।
"तो तुम चली जाओ। घाट तो मैंने book नहीं किया।"
शक्ति ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी नज़र फिर से पानी में तैरते दीयों पर टिक गई।
कुछ पल बाद शिवाय ने भी चुपचाप उसकी तरफ देखा।
दोनों के बीच अभी भी नाराज़गी थी...
लेकिन उस रात गंगा के किनारे, शायद पहली बार उनके बीच की खामोशी किसी झगड़े से ज्यादा कुछ कह रही थी।
शक्ति कुछ पल पानी में तैरते दीयों को देखती रही।
फिर धीमे स्वर में बोली—
"कभी-कभी कुछ लोग अपने partner की ज़िंदगी का दीपक नहीं... अंधेरा बन जाते हैं। वो किसी की ज़िंदगी में रोशनी करने नहीं आते, बल्कि उसे उसके अकेलेपन से रूबरू करवाने आते हैं।"
वह कुछ पल के लिए रुकी।
"और ये जताने आते हैं कि इस दुनिया में तुम्हारे साथ चलने वाला कोई नहीं होता... एक दिन हर कोई तुम्हें अकेला छोड़ जाएगा। फिर चाहे वो तुम्हारा partner ही क्यों न हो।"
शिवाय चुपचाप उसकी बात सुनता रहा।
इस बार उसके पास कोई मज़ाक या तंज नहीं था।
क्योंकि शक्ति की आवाज़ में सिर्फ़ शब्द नहीं थे...
उनके पीछे कोई ऐसा दर्द था, जिसके बारे में शिवाय अभी कुछ नहीं जानता था।
शिवाय को शक्ति की बात कुछ ऐसी लगी, जैसे कोई उसके अपने दिल की बात कह रहा हो। वह उन शब्दों को सिर्फ़ सुन नहीं रहा था... अंदर तक महसूस कर रहा था।
कुछ पल बाद उसने धीमी आवाज़ में पूछा—
"तुम्हें किसने अकेला छोड़ा?"
शक्ति ने उसकी तरफ देखा।
"हर बात आपको बताऊँ? इतना भरोसा तो मैं आप पर नहीं करती।"
शिवाय सीढ़ी से उठा और शक्ति के पास आकर बैठ गया।
"मत बताओ।"
उसकी आवाज़ में इस बार कोई तंज नहीं था।
कुछ पल बाद वह बोला—
"तुमने मेरी बहन को उन गुंडों से बचाया।"
शक्ति ने एक नज़र उसकी तरफ देखा।
"उसने बता दिया आपको? मैंने मना किया था... बेवजह सब परेशान होंगे।"
शिवाय हल्का-सा मुस्कुराया।
"वो ना भी बताती, तब भी मुझे पता चल जाता। बहन है वो मेरी।"
शक्ति के चेहरे पर हल्की-सी तंज भरी मुस्कान आई।
"बहन?"
वह फिर पानी की तरफ देखने लगी।
"वो बहन जिसे आप सबके सामने डाँट रहे थे?"
शक्ति ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—
"वो बहन, जिस पर आपके भाई ने इतने लोगों के बीच हाथ उठाया?"
उसकी आवाज़ में दर्द और गुस्सा दोनों थे।
"आप जानते हैं, मिस्टर... शायद आपको पता ही नहीं कि बहन का मतलब क्या होता है।"
"या शायद... किसी ने आपको कभी इस शब्द का मतलब समझाया ही नहीं।"
शक्ति की बात शिवाय के दिल में कहीं गहराई तक उतर गई।
वह कुछ कह नहीं पाया... बस गंगा में तैरते उन दीयों को देखता रहा।
गंगा के पानी में तैरते दीये अब धीरे-धीरे दूर जा रहे थे।
हाँ, यहाँ Shivay पहली बार अपने past का एक बड़ा हिस्सा Shakti के सामने खोल रहा है। इसे थोड़ा emotional और natural रखते हैं, ताकि Shakti को भी महसूस हो कि उसके सामने बैठा इंसान सिर्फ़ गुस्सैल नहीं, अपने नुकसान का दर्द लिए हुए है।
"बहन का मतलब पता है मुझे।"
शिवाय की आवाज़ अब पहले जैसी सख्त नहीं थी।
"लेकिन हर बार रोकने-टोकने का मतलब ये नहीं होता कि हमें उस पर भरोसा नहीं है। कभी-कभी कुछ रोक-टोक उसकी safety के लिए भी की जाती है।"
वह कुछ पल के लिए चुप हुआ।
"मैं उसे अपनी बेटी की तरह मानता हूँ... उसे खोना नहीं चाहता।"
शक्ति ने कुछ नासमझी से उसकी तरफ देखा।
"क्या मतलब?"
शिवाय ने गहरी साँस ली।
"मतलब ये कि हमारे दुश्मनों की कमी नहीं है। सालों पहले उन्हीं दुश्मनों की वजह से मैंने अपने किसी खास को खोया था।"
उसकी आवाज़ में अचानक ठहराव आ गया।
"और कुछ समय पहले... अपने भाई जैसे दोस्त को भी।"
ये कहते हुए शिवाय की आँखों में हल्की नमी उतर आई।
उसने शक्ति की तरफ नहीं देखा।
उसकी नज़र अब आसमान में टिमटिमाते तारों पर थी।
शक्ति कुछ पल उसे देखती रही।
फिर धीमे से पूछा—
"किसे खोया आपने?"
शिवाय के चेहरे पर एक ऐसी उदासी आई, जिसे देखकर शक्ति का सवाल भी कुछ पल के लिए हवा में ठहर गया।
फिर शिवाय ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
"अपने प्यार को..."
हाँ, यहाँ scene को emotional रखने के साथ दोनों की personality भी बनाए रखते हैं—Shivay थोड़ा खुल रहा है और Shakti अभी भी practical है।
शक्ति ने कुछ नहीं कहा।
वह बस शिवाय के चेहरे को देखती रही, जैसे उसकी आँखों में छिपे उन सवालों के जवाब ढूँढ़ रही हो, जिन्हें शिवाय शब्दों में नहीं कह पा रहा था।
कुछ पल बाद शिवाय खुद ही बोल पड़ा—
"मेरी पत्नी... जिसे मैं बहुत प्यार करता था।"
उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
"सालों पहले हमारे दुश्मनों ने उसे हमसे दूर कर दिया। तब से मुझे डर लगता है कि कहीं मेरी बहन के साथ वो सब दोबारा न हो जाए।"
शक्ति की आँखों में पहली बार उसके लिए थोड़ी नरमी आई।
"Sorry..."
शिवाय ने तुरंत उसकी बात काट दी।
"Sorry मुझे बोलना चाहिए। आज तुमने मेरी बहन की जान बचाई।"
वह कुछ पल रुका, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला—
"और कहते हैं ना... जो किसी की जान बचाता है, वो उसकी अमानत बन जाता है।"
शक्ति ने उसकी तरफ देखा।
"कौन पागल कहता है ऐसा?"
शिवाय बिना कुछ बोले उसकी तरफ देखने लगा।
शक्ति ने पानी में तैरते दीयों की ओर देखते हुए कहा—
"मैं इन सब बातों में विश्वास नहीं करती।"
शिवाय के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
"अच्छा?"
शक्ति ने सीढ़ियों पर पैर नीचे तक पसारते हुए और हाथों को पीछे टिकाते हुए कहा— "हाँ।"
शक्ति ने बिना उसकी तरफ देखे कहा—
"किसी की जान बचाने का मतलब सिर्फ़ इतना है कि उस वक्त उसे मदद की जरूरत थी... इससे कोई किसी की अमानत नहीं बन जाता।"
शिवाय कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर धीमे से बोला—
"शायद... लेकिन कुछ रिश्ते बिना इजाज़त के भी बन जाते हैं।"
शक्ति ने उसकी तरफ देखा।
इस बार शिवाय मुस्कुरा रहा था।
और शक्ति पहली बार समझ नहीं पाई कि उसकी आख़िरी बात सिर्फ़ एक मज़ाक थी...
या उसके पीछे कोई और मतलब छिपा था।
शिवाय ने कुछ पल शक्ति को देखा, फिर पूछा—
"तुम बनारस की तो नहीं हो?"
शक्ति ने सिर हिलाया।
"नहीं, मैं दिल्ली से हूँ। बस किसी काम से बनारस आई हूँ।"
शिवाय ने धीरे से सिर हिला दिया।
कुछ पल दोनों फिर गंगा की तरफ देखते रहे।
फिर शिवाय ने पूछा—
"चाय पियोगी?"
शक्ति ने आसमान की तरफ देखा। और मुह बनाते हुए कहा—
"इस वक्त तक तो सारी दुकानें बंद हो गई होंगी।"
शिवाय हल्का-सा मुस्कुराया।
"नहीं... बनारस में कुछ ऐसी भी दुकानें हैं, जो इस वक्त भी खुली मिल जाएँगी।"
शक्ति ने उसकी तरफ देखा।
"चलो फिर।"
शिवाय उठने लगा, लेकिन फिर रुककर बोला—
"पहले तुम मुझे माफ़ करो।"
शक्ति ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
"अरे... नहीं। मैं आपसे नाराज़ नहीं हूँ।"
वह कुछ पल चुप रही, फिर गंभीर होकर बोली—
"मैं समझ सकती हूँ कि तुम्हें अपनी बहन की फिक्र होगी। लेकिन तुम्हारे भाई को शिवानी के साथ ऐसे behave नहीं करना चाहिए था।"
“जानता हूँ, इसलिए उसे धमकाकर आया हूँ कि अभी जाकर शिवानी से माफ़ी माँगे।”
"देखो, ज़्यादा पाबंदियाँ कहीं ऐसा न कर दें कि तुम अपनी ही बहन से दूर हो जाओ।"
शक्ति की आवाज़ धीमी हो गई।
"ये मैं अपने personal experience से बोल रही हूँ।"
शिवाय ने उसकी तरफ देखा, लेकिन इस बार उसने कोई सवाल नहीं किया।
बस इतना कहा—
"मैं ध्यान रखूँगा।"
शक्ति के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
"तो चलो... मुझे भी चाय पीनी है।"
कहते हुए उसने अपने दाँत दिखाते हुए मुस्कुरा दिया।
दोनों घाट की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए आगे बढ़ने लगे।
कुछ कदम चलने के बाद...
शिवाय की छोटी उँगली अनजाने में शक्ति की छोटी उँगली से छू गई।
दोनों एक पल के लिए रुके।
लेकिन इस बार किसी ने हाथ पीछे नहीं खींचा।
छोटी-सी उस छुअन में कोई वादा नहीं था...
बस शायद दो अनजान लोगों के बीच दोस्ती की पहली दस्तक थी।
क्या शिवाय और शक्ति की ये अनकही दोस्ती कोई नया मोड़ लेगी, या फिर दोनों के बीच खड़ी होगी गलतफ़हमी की दीवार?
जानने के लिए पढ़ते रहिए Shakti Ke Shiv...