एक आम सी प्रेम कहानी
भाग - १३
लेखिका "अनामिका"
कमरे में छाई खामोशी हर पल गहरी होती जा रही थी। निहारिका को डर था कि पापा अब अपनी कड़क शर्तें रखेंगे और माहौल बिगड़ न जाए।
मलय के पापा ने सहजता से कहा, "जी कहिए, क्या बात है?"
निहारिका के पापा ने गले को साफ करते हुए कहा, "देखिए, मैं इस रिश्ते के खिलाफ बिल्कुल नहीं हूं। जब बच्चे एक-दूसरे को इतना पसंद करते हैं, तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है। लेकिन मेरी शादी को लेकर कुछ शर्तें हैं।"
हॉल में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। मलय और उसके घरवाले सोच में पड़ गए कि आखिर ऐसी क्या शर्त होगी? मलय के पापा ने नम्रता से कहा, "जी बिल्कुल कहिए, आपकी क्या शर्तें हैं? हम पूरी कोशिश करेंगे कि आपकी हर बात मान सकें।"
निहारिका के पापा ने सीधे मलय की आंखों में देखते हुए कहा, "मेरी बेटी अभी कॉलेज में है, उसकी पूरी जिंदगी आगे पड़ी है। मेरी शर्त बस इतनी है कि शादी से पहले वह अपनी पढ़ाई पूरी करे और अपने पैरों पर खड़ी हो। वह जॉब करना चाहती है, अपने सपने पूरे करना चाहती है। जब वह आत्म-निर्भर बन जाएगी, तभी यह शादी होगी।"
शर्त सुनते ही हॉल में कुछ सेकंड की खामोशी छा गई। निहारिका सांस रोके अपनी जगह बैठी रही। तभी मलय के माता-पिता ने एक-दूसरे की तरफ देखा और अचानक उनके चेहरों पर एक राहत भरी और हल्की-सी मुस्कान आ गई। दोनों थोड़ा सा हंस पड़े। यह देखकर निहारिका के माता-पिता हैरान रह गए और एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे कि इस गंभीर शर्त पर ये लोग हंस क्यों रहे हैं?
तभी मलय के पापा ने माहौल को हल्का करते हुए कहा, "अरे समधी जी! इतनी सी बात के लिए आपने तो हमें डरा ही दिया था! हमें लगा पता नहीं आप क्या मांग लेंगे। अगर बच्चे एक-दूसरे से प्यार करते हैं, तो क्या एक-दूसरे के सपनों का सम्मान नहीं करेंगे? निहारिका अगर आगे पढ़ना चाहती है, जॉब करना चाहती है, तो मलय और हम सब मिलकर उसका पूरा साथ देंगे। आखिर बहू नहीं, हम तो घर की बेटी ला रहे हैं!"
मलय ने भी मुस्कुराते हुए निहारिका के पापा की तरफ देखा और कहा, "अंकल, मुझे निहारिका की यही बात सबसे ज्यादा पसंद है कि वह लाइफ में कुछ बनना चाहती है। आप बिल्कुल बेफिक्र रहिए, जब तक यह कम्फर्टेबल न हो, हम शादी की कोई जल्दी नहीं करेंगे।"
मलय के घर वालों का यह खुलकर हंसना, मज़ाक करना और इतना सकारात्मक रवैया देखना माहौल को एकदम हल्का और खुशनुमा बना गया। मलय की मां ने माहौल में मिठास घोलते हुए कहा, "वैसे भी समधी जी, आजकल पढ़ी-लिखी और कामकाजी बहू मिलना तो खुशकिस्मती की बात है! अब इस खुशी में चाय-नाश्ता ठंडा मत होने दीजिए, जलेबी खिलाइए!"
यह सब सुनकर निहारिका के पापा का सारा तनाव पल भर में छूमंतर हो गया। उनका चेहरा खिल उठा। उन्हें अंदर ही अंदर अपनी बेटी की पसंद और मलय के परिवार के विचारों पर बेहद गर्व महसूस हुआ। एक पल में सारा डर दूर हो गया और दोनों परिवारों के बीच आत्मीयता और भरोसे की एक खूबसूरत शुरुआत हो गई।
हॉल में बातचीत का दौर चल ही रहा था कि मलय की मां ने मुस्कुराते हुए निहारिका और मलय को देखा और बोलीं, "अरे बच्चों, तुम दोनों यहां हम बड़ों की बातों में क्यों बोर हो रहे हो? अगर अकेले में थोड़ी बात करना चाहते हो, तो जा सकते हो।"
यह सुनते ही निहारिका ने झिझकते हुए अपनी मां और पापा की तरफ देखा। उसके पापा ने मुस्कुराते हुए सहमति में सर हिला दिया और मां बोलीं, "हां-हां बेटा जाओ, मलय को अपना छोटा-सा गार्डन दिखा लाओ।"
दोनों उठकर बाहर गार्डन की तरफ चले गए। बाहर मौसम बहुत सुहावना था, ठंडी हवा चल रही थी और चारों तरफ हरियाली थी। माहौल बेहद खूबसूरत था, लेकिन निहारिका ने ध्यान दिया कि मलय के चेहरे पर खुशी तो थी, पर साथ ही वह किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था।
गार्डन की एक बेंच के पास रुककर निहारिका ने हिम्मत जुटाकर पूछा, "क्या हुआ? आप थोड़े परेशान लग रहे हैं... पापा की शर्तों या शादी में देरी को लेकर उदास हैं क्या?"
मलय ने निहारिका की तरफ देखा और उसके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई। उसने कहा, "नहीं निहारिका, बिल्कुल नहीं! मुझे तुम्हारी पढ़ाई या जॉब से कोई ऐतराज नहीं है। सच कहूं तो मुझे तुम पर गर्व है। मैं सिर्फ कहने के लिए नहीं, बल्कि दिल से तुम्हारे हर सपने में तुम्हारे साथ खड़ा रहूंगा। तुम्हारे पंखों को उड़ान देना मेरी जिम्मेदारी भी है और खुशी भी।"
मलय की बातें सुनकर निहारिका को सुकून तो मिला, लेकिन उसकी उत्सुकता कम नहीं हुई। उसने मुस्कुराते हुए पूछा, "फिर आपके चेहरे पर इतनी सोच क्यों थी? क्या बात है?"
मलय ने एक हल्की-सी सांस ली और निहारिका की आंखों में देखते हुए थोड़ा शर्माकर कहा, "बात यह है कि... ठीक है, हम शादी तब करेंगे जब तुम अपने पैरों पर खड़ी हो जाओगी। लेकिन... क्या हम तब तक के लिए एक छोटी-सी सगाई भी नहीं कर सकते? कम से कम मुझे यह तसल्ली तो रहेगी कि तुम अब आधिकारिक तौर पर मेरी हो!"
यह सुनते ही निहारिका की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने राहत की सांस ली और मलय के कंधे पर धीरे से मारते हुए हंस पड़ी, "ओहो! इतनी सी बात के लिए आपने मुझे इतना डरा दिया? मुझे लगा पता नहीं क्या बात हो गई!"
मलय भी हंस पड़ा और बोला, "डराया नहीं, बस थोड़ा नर्वस था कि तुम क्या कहोगी।"
निहारिका ने थोड़ी झेंपते हुए और शर्माते हुए कहा, "अगर आप यही चाहते हैं... तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है। सगाई तो की ही जा सकती है।"
इसके बाद दोनों के बीच दूरियों की झिझक मिट गई। वे गार्डन में टहलते हुए एक-दूसरे की पसंद, करियर के प्लान्स और पुरानी मुलाकातों की मीठी यादें शेयर करने लगे।
गार्डन से लौटकर दोनों घर के अंदर आए। हॉल में बैठे दोनों के माता-पिता बातें कर रहे थे।
मलय ने निहारिका का हाथ थामा और कहा, "पापा, अंकल... हम दोनों जल्द ही सगाई करना चाहते हैं।"
यह सुनते ही कमरे में एक गहरा सन्नाटा छा गया। निहारिका के पिता की अचरज भरी नज़रें सीधे मलय पर जाकर टिक गईं—उनमें रज़ामंदी थी या कोई अनकहा डर... समझ पाना मुश्किल था।
तेरहवाँ भाग समाप्त,कहानी जारी है ....