Her Silent Secret - 15 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Her Silent Secret - 15

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Her Silent Secret - 15

शहर में उस रहस्यमय साइको किलर का नाम पिछले चार सालों से लोगों के बीच डर बन चुका था। चार सालों में कई अपराधी मारे गए थे। लेकिन पुलिस आज तक ये पता नहीं लगा पाई थी कि वह किलर आदमी है या औरत। हर घटना के बाद एक ही चीज़ सामने आती थी। मरा हुआ अपराधी…और उसके पास या दीवार पर लिखा हुआ कोई मुहावरा। पुलिस के लिए वो मुहावरे किसी पहेली से कम नहीं थे।

लेकिन इस पूरे रहस्य की सच्चाई सिर्फ एक इंसान जानता था।
संयोगिता सिंह। चार साल से वो अपराधियों का पीछा कर रही थी। उसे अपराधियों से सिर्फ नफरत नहीं थी…उसे उनके किए हुए अपराधों से घृणा थी। खासकर उन लोगों से, जो बच्चों और मासूम लोगों को अपना शिकार बनाते थे।

वो मानती थी—
जिसने किसी मासूम की जिंदगी बर्बाद की है, उसे कानून की कमजोरी का फायदा नहीं मिलना चाहिए।

इसी सोच ने उसके अंदर के उस अंधेरे रूप को जन्म दिया था।
कुछ घंटे पहले ही उसने एक बड़े child trafficker को खत्म किया था।
उसका नाम था—
जग्गा।

पुलिस के रिकॉर्ड में जग्गा के खिलाफ कई गंभीर शिकायतें थीं, लेकिन हर बार वो किसी न किसी तरह बच निकलता था।
संयोगिता के लिए इतना काफी था। उसने उसे उसके ही अड्डे तक ढूँढ निकाला था। उसके बाद क्या हुआ…उसका कोई गवाह नहीं था। सिर्फ दीवार पर एक नया मुहावरा था।

अब संयोगिता अपनी कार में बैठी थी। उसका चेहरा शांत था।
जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन उसके दिमाग में जग्गा के शब्द घूम रहे थे। फिर उसकी नजर अचानक अपने हाथों पर गई।
कुछ पल के लिए वो बिल्कुल शांत हो गई। उसे विवान याद आ गया। उसका छोटा सा चेहरा…

और वो मासूम आवाज़—
मम्मा, आप मुझे छोड़कर तो नहीं जाओगी ना?

संयोगिता ने आँखें बंद कर लीं।

एक तरफ थी—
संयोगिता सिंह,
एक सफल कंपनी की मालिक, शांत और बेहद सुलझी हुई लड़की।

दूसरी तरफ—
वही संयोगिता,
जिसे शहर का पुलिस विभाग चार साल से ढूँढ रहा था।

एक ऐसी महिला जिसकी पहचान तक पुलिस के पास नहीं थी।
और अब सबसे बड़ी समस्या ये थी कि वो महिला पहली बार किसी परिवार से जुड़ चुकी थी। चौहान परिवार से। विवान से।
और शायद…विराट से भी।

अगली सुबह पुलिस स्टेशन में जग्गा की मौत की खबर पहुँची।
इंस्पेक्टर ने घटनास्थल की तस्वीरें देखीं। दीवार पर वही परिचित अंदाज में लिखा हुआ मुहावरा था। इंस्पेक्टर ने गहरी साँस ली।

इंस्पेक्टर बोला - 
चार साल हो गए…

उसने फाइल बंद की।

इंस्पेक्टर बोला - 
लेकिन हम अब भी नहीं जानते कि ये साइको किलर आखिर है कौन।

उसे नहीं पता था उसी शहर में, उसी सुबह…एक शांत लड़की अपनी कंपनी की मीटिंग के लिए तैयार हो रही थी।
और उसका नाम था—
संयोगिता सिंह।

संयोगिता हमेशा से ऐसी नहीं थी। कभी वो भी एक बेहद शांत और मासूम बच्ची थी। उसे झूठ से नफरत नहीं थी…क्योंकि तब तक उसने दुनिया का असली चेहरा देखा ही नहीं था। लेकिन बचपन में उसके परिवार पर चोरी का झूठा आरोप लगा।
परिवार बेगुनाह था। फिर भी लोगों ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया। छोटी सी संयोगिता सब देखती रही।

उस दिन पहली बार उसके मन में सवाल उठा—
अगर सच बोलने वालों की कोई नहीं सुनता… तो सच का क्या फायदा?

उसके माता-पिता ने उसे समझाया—
बेटा, परेशान मत हो… वक्त सब ठीक कर देगा।”

लेकिन संयोगिता के अंदर कुछ टूट चुका था। उस दिन के बाद उसे झूठ से नफरत हो गई। स्कूल में भी संयोगिता को अक्सर दूसरे बच्चे परेशान करते थे। उसके शांत स्वभाव का मजाक उड़ाया जाता। कभी उसके कपड़ों को लेकर…कभी उसके परिवार को लेकर…वो हर बार घर आकर चुप हो जाती।

माता-पिता पूछते—
क्या हुआ?

और संयोगिता हमेशा एक ही जवाब देती—
कुछ नहीं।

क्योंकि उसे बचपन से एक बात सिखाई गई थी—
सह लो… सब ठीक हो जाएगा।

और वो सहती रही। समय बीता। संयोगिता बड़ी हुई। लेकिन जिंदगी ने उसे फिर एक ऐसा घाव दिया, जिसने उसके अंदर की आखिरी मासूमियत भी छीन ली। कुछ लड़कों ने उसके साथ गलत किया। संयोगिता ने आवाज उठाई। लेकिन उन लड़कों को भी वह सजा नहीं मिली जिसकी वो हकदार थे।

संयोगिता ने पहली बार महसूस किया—
सिर्फ सच बोलना काफी नहीं है।

वो घर लौटी। उसके माता-पिता ने उसे गले लगाया।

लेकिन फिर वही शब्द बोले—
बेटा… सह लो। जिंदगी आगे बढ़ानी है।

संयोगिता चुप रही। उसने उस दिन किसी से बहस नहीं की।
लेकिन उसके अंदर एक फैसला जन्म ले चुका था।कुछ समय बाद संयोगिता ने नौकरी शुरू की।

उसकी जिंदगी में एक छोटी सी बिल्ली थी—
मुन्नी।
मुन्नी उसके लिए सिर्फ एक पालतू जानवर नहीं थी। वो उसकी साथी थी। जब संयोगिता अकेली होती, मुन्नी उसके पास बैठती। जब संयोगिता रोती, मुन्नी उसके पास आकर बैठ जाती। संयोगिता उसे अपनी छोटी बहन की तरह मानती थी।
लेकिन एक दिन…मुन्नी को बेरहमी से मार दिया गया। संयोगिता टूट गई।बउसने न्याय पाने की कोशिश की।

लेकिन फिर वही कहानी दोहराई गई कोई सख्त सजा नहीं। क्योंकि मुन्नी एक बिल्ली थी ना । कोई ऐसा जवाब नहीं मिला जो उसके दिल को संतुष्ट कर सके। उस रात संयोगिता घंटों मुन्नी के पास बैठी रही।

और पहली बार उसके अंदर एक बेहद खतरनाक विचार आया—
अगर कानून उन्हें नहीं रोक सकता… तो कौन रोकेगा?

उसके बाद संयोगिता बदलने लगी। पहले वो सिर्फ चुप रहती थी। अब वो लोगों को पढ़ने लगी। कौन झूठ बोल रहा है…कौन किसी को धोखा दे रहा है…कौन कानून की कमजोरियों का फायदा उठा रहा है…वो सब समझने लगी। उसका गुस्सा धीरे-धीरे जुनून में बदल गया। और फिर…वो अपराधियों को खुद सजा देने लगी।

यहीं से जन्म हुआ—
साइको किलर” का। शहर में लोग उससे डरने लगे। पुलिस उसे ढूँढती रही। लेकिन कोई उसके चेहरे तक नहीं पहुँच पाया।
लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे अजीब हिस्सा ये था—संयोगिता के माता-पिता को कुछ भी पता नहीं था। उनकी नजर में उनकी बेटी आज भी वही भोली-भाली, शांत और संस्कारी लड़की थी।

वे आज भी उसे फोन करके पूछते—
बेटा, खाना खाया?

और संयोगिता हर बार मुस्कुराकर जवाब देती—
हाँ माँ।

उन्हें क्या पता…जिस बेटी को उन्होंने हमेशा सहन करना सिखाया था…वही बेटी अब दूसरों के अपराध सहने के बजाय उन्हें खुद सजा देने लगी थी। उस रात संयोगिता अपने कमरे में अकेली बैठी थी। उसके हाथ में उसके माता-पिता की पुरानी तस्वीर थी। उसकी आँखों में पहली बार कठोरता नहीं थी।बस दर्द था।

वो तस्वीर को देखते हुए धीरे से बोली—
माँ… पापा… आप दोनों ने मुझे हमेशा अच्छी लड़की समझा।

उसकी आँख से एक आँसू गिरा।

वो बोली - 
काश… मैं सच में वैसी ही रहती।

कुछ पल बाद उसने तस्वीर अपने सीने से लगा ली। लेकिन तभी उसके फोन पर एक संदेश आया। संयोगिता की आँखें तस्वीर से हटकर फोन पर टिक गईं। एक नया अपराधी…एक नया नाम…और उसके चेहरे पर फिर वही ठंडापन लौट आया।

संयोगिता बोली - 
शायद मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।