रामपुर नाम का एक छोटा सा गाँव था। उसी गाँव के आखिरी छोर पर एक टूटी-फूटी झोपड़ी में सावित्री नाम की एक बुढ़िया रहती थी। उसकी उम्र लगभग सत्तर साल थी। उसके पति का देहांत दस साल पहले ही हो गया था। उसका एक ही सहारा था, उसका इकलौता बेटा प्रकाश, जो शहर में एक बड़ी कंपनी में नौकरी करता था।
सावित्री की झोपड़ी में एक चीज सबसे खास थी, एक बहुत पुराना, जंग लगा हुआ लोहे का संदूक। वह संदूक हमेशा ताले में बंद रहता था और उसकी चाबी सावित्री अपने आँचल में बाँध कर रखती थी। गाँव भर में यह बात फैली हुई थी कि उस संदूक में सावित्री के पति की बहुत सारी जमीन के कागजात और सोने के सिक्के हैं। कई लोगों ने उसे खरीदने की कोशिश की, पर सावित्री किसी को उसके पास भी नहीं आने देती थी।
हर साल दिवाली पर प्रकाश गाँव आता था। इस बार जब वह आया तो उसने देखा कि माँ पहले से बहुत ज्यादा कमजोर हो गई है। आँखों की रोशनी कम हो गई है और हाथ काँपते हैं।
प्रकाश ने कहा, "माँ, अब बहुत हुआ। तुम मेरे साथ शहर चलो। यहाँ इस टूटी झोपड़ी में अकेली क्यों रहती हो? मैं वहाँ तुम्हारा अच्छे से ध्यान रखूँगा।"
यह सुनकर सावित्री की आँखों में आँसू आ गए। उसने संदूक की तरफ इशारा करते हुए कहा, "बेटा, मैं इस घर को और इस संदूक को छोड़ कर कैसे जा सकती हूँ? इसमें तेरी पूरी जिंदगी बसी है। मैं मर भी गई तो इसे छोड़ कर नहीं जाऊँगी।"
प्रकाश को यह बात बहुत बुरी लगी। उसे लगा कि उसकी माँ को उससे ज्यादा उस संदूक में बंद पड़े पैसों से प्यार है। वह गुस्से में बोला, "ठीक है, तुम इसी संदूक के साथ रहो।" और वह बिना खाना खाए ही वापस शहर चला गया। गुस्से में उसने छह महीने तक माँ को फोन तक नहीं किया।
जेठ की एक तपती रात थी। सावित्री को अचानक तेज बुखार आ गया। वह जमीन पर गिर पड़ी। पड़ोस की एक औरत ने हिम्मत करके प्रकाश को फोन लगाया। खबर सुनते ही प्रकाश रातों-रात बस पकड़ कर गाँव भागा।
जब वह झोपड़ी में पहुँचा तो उसने देखा माँ जमीन पर बेहोश पड़ी है, लेकिन उसका एक हाथ अब भी मजबूती से उस पुराने संदूक को पकड़े हुए है। प्रकाश तुरंत माँ को सरकारी अस्पताल ले गया, पर डॉक्टर ने कहा कि बहुत देर हो चुकी है।
मरने से पहले सावित्री ने धीरे से प्रकाश का हाथ पकड़ा और सिर्फ इतना कहा, "बेटा... संदूक... खोल लेना..."
अगले दिन अंतिम संस्कार के बाद प्रकाश वापस झोपड़ी में आया। उसका मन गुस्से और दुख से भरा था। उसने सोचा कि आखिर ऐसा क्या है इस संदूक में जिसके लिए माँ ने अपनी जान दे दी। उसने हथौड़े से उस जंग लगे ताले को तोड़ दिया।
संदूक खुला तो प्रकाश की आँखें फटी की फटी रह गईं। अंदर सोना-चांदी, पैसे या जमीन के कागजात कुछ भी नहीं थे।
अंदर सिर्फ तीन चीजें बहुत करीने से रखी हुई थीं। पहला, प्रकाश के बचपन के छोटे-छोटे घिसे हुए कपड़े। दूसरा, उसकी पहली कक्षा की रिपोर्ट कार्ड जिसमें वह प्रथम आया था और जिस पर टीचर ने लिखा था - बहुत होनहार बच्चा। और तीसरा, एक पीला पड़ा हुआ खत, जो उसके पिता ने मरने से पहले सावित्री के लिए लिखा था।
उस खत में लिखा था, "मेरी प्यारी सावित्री, मेरे बाद प्रकाश को कभी पिता की कमी महसूस मत होने देना। उसे इतना प्यार देना कि उसे मेरी गैरमौजूदगी का एहसास भी न हो।"
यह पढ़ते ही प्रकाश जमीन पर बैठ कर फूट-फूट कर रोने लगा। उसे समझ आ गया था कि वह संदूक धन का नहीं, बल्कि एक माँ की ममता और यादों का खजाना था।
*शिक्षा - माँ के आँचल से बड़ा दुनिया में कोई खजाना नहीं होता।*