मोहन शहर के एक बड़े होटल में वेटर का काम करता था। उसकी तनख्वाह सिर्फ 8000 रुपये थी। इतने कम पैसों में वह अपनी पत्नी, छोटे बच्चे और बूढ़ी माँ का पेट किसी तरह पाल रहा था। मालिक अक्सर उसे डांटता रहता था, पर मोहन सब चुपचाप सह लेता था।
एक सर्दी की रात, होटल बंद होने के बाद मोहन घर लौट रहा था। रात के 11 बज चुके थे और कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। रास्ते में फुटपाथ पर उसे एक बूढ़ा आदमी कंबल के बिना ठिठुरता हुआ मिला। उसकी हालत बहुत खराब थी।
मोहन ने पूछा, "बाबा, यहाँ क्यों बैठे हो?"
बूढ़ा बोला, "बेटा, तीन दिन से कुछ नहीं खाया। मेरे पास एक रुपया भी नहीं है।"
मोहन की जेब में सिर्फ 50 रुपये थे। वो पैसे उसने घर के लिए आलू और तेल लेने के लिए रखे थे। एक पल के लिए वह सोच में पड़ गया। फिर उसने सोचा, मेरे बच्चे तो घर पर हैं, पर ये बाबा तो अकेला है।
वह पास की दुकान पर गया और उन 50 रुपयों से दो गरम-गरम रोटी और थोड़ी सब्जी ले आया। बूढ़े ने जैसे ही खाना देखा, उसकी आँखों में चमक आ गई। उसने जल्दी-जल्दी खाना खाया।
खाना खाने के बाद बूढ़े ने मोहन का हाथ पकड़ा और कहा, "बेटा, आज तूने मुझे जीवन दिया है। ये दो रोटी का कर्ज़ मैं जरूर चुकाऊंगा।"
मोहन मुस्कुराया और बोला, "बाबा, कर्ज़ कैसा? ये तो इंसानियत है।" कहकर वह अपने घर चला गया। उस रात उसके घर में सब्जी नहीं बनी, पर उसके दिल को एक अजीब सा सुकून था। धीरे-धीरे वह उस बात को भूल भी गया।
पाँच साल बीत गए। मोहन अब भी उसी होटल में वेटर था। जीवन वैसे ही चल रहा था।
एक दिन दोपहर को होटल के बाहर एक बहुत बड़ी काली मर्सिडीज कार आकर रुकी। उसमें से एक महंगे सूट-बूट वाला आदमी उतरा। उसके साथ चार-पाँच लोग और थे। वह सीधा होटल के मालिक के केबिन में गया।
उसने कहा, "मुझे आपका ये होटल खरीदना है। आप कीमत बोलिए।"
होटल मालिक हैरान रह गया। बातचीत के बाद सौदा 2 करोड़ रुपये में तय हो गया।
कागज पर साइन होने के बाद, वो सूट वाला आदमी धीरे-धीरे चलकर मोहन के पास आया। उसने मोहन के कंधे पर हाथ रखा और बोला, "पहचाना मुझे?"
मोहन ने गौर से देखा। थोड़ी देर बाद उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। अरे, ये तो वही बूढ़ा है!
वो आदमी अब बूढ़ा नहीं लग रहा था। उसने बताया, "उस रात के बाद मैं अपने बेटे के पास अमेरिका चला गया, जो वहाँ का बहुत बड़ा बिजनेसमैन है। मैंने उसे तुम्हारी दो रोटी की कहानी सुनाई। बेटा, आज मैंने ये होटल इसलिए खरीदा है ताकि मैं इसे तुम्हें दे सकूँ।"
उसने होटल के कागज मोहन की तरफ बढ़ाते हुए कहा, "आज से इस होटल के असली मालिक तुम हो। ये तुम्हारी दो रोटी का ब्याज है।"
मोहन रोने लगा। उस दिन उसने सीखा कि सच्चे दिल से किया गया छोटा सा नेक काम कभी बेकार नहीं जाता।> उस दिन से मोहन का जीवन पूरी तरह बदल गया। उसने होटल के बाहर एक बड़ा बोर्ड लगा दिया जिस पर लिखा था - "यहाँ कोई भी भूखा व्यक्ति मुफ्त में भोजन कर सकता है।" उसकी नेकी की कहानी पूरे शहर में मशहूर हो गई।