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*डॉक्टर और सीईओ - भाग 2: बोर्डरूम का तूफान*
अनन्या के केबिन में नया नेमप्लेट लग चुका था - "डॉ. अनन्या शर्मा - प्रमुख, एडवांस्ड कार्डियक सेंटर"। यह प्रमोशन अस्पताल में आग की तरह फैल गया। कोई कह रहा था किस्मत वाली है, तो कोई कह रहा था सीईओ को पटाने में माहिर है।
अनन्या इन बातों से बेखबर अपने नए सेंटर के लिए योजना बना रही थी। वह चाहती थी कि यहाँ सिर्फ अमीरों के लिए नहीं, बल्कि एक इमरजेंसी कोटा गरीबों के लिए भी हो।
दूसरी तरफ, आर्यन ग्रुप के हेड ऑफिस में भूचाल आया हुआ था। बोर्ड मीटिंग चल रही थी।
आर्यन के चाचा और कंपनी के उपाध्यक्ष, विजय मल्होत्रा ने फाइल पटकते हुए कहा, "आर्यन, तुमने बिना बोर्ड की अनुमति के एक जूनियर डॉक्टर को सेंटर हेड बना दिया? और वो भी एक प्रतिशत मुनाफा दान करने की शर्त पर? क्या तुमने इस कंपनी को धर्मशाला समझ रखा है?"
आर्यन शांत था। उसने कहा, "चाचाजी, लाइफकेयर को हमने मुनाफे के लिए नहीं, विश्वास के लिए खरीदा है। अगर विश्वास नहीं होगा, तो मुनाफा भी नहीं होगा। डॉ. अनन्या उस विश्वास का चेहरा हैं।"
विजय हँसे, "विश्वास से ईएमआई नहीं भरती, आर्यन। और तुम्हें क्या लगता है, ये डॉक्टर तुम्हारी बिजनेस पार्टनर बनेगी? ये लोग इमोशनल होते हैं, प्रोफेशनल नहीं।"
आर्यन ने कुछ नहीं कहा, पर उसके मन में अनन्या का वही जवाब गूँज रहा था - "यहाँ धूल नहीं, जीवन है।"
अगले दिन अनन्या को पहला झटका लगा। उसके सेंटर के लिए जो नई मशीनें ऑर्डर हुई थीं, फाइनेंस टीम ने उन्हें रोक दिया। कारण बताया गया - बजट अप्रूवल नहीं है।
अनन्या सीधे आर्यन के ऑफिस पहुँची। आर्यन उस समय वीडियो कॉन्फ्रेंस में था। अनन्या को देखते ही उसने कॉल काट दिया।
"आपने मेरी मशीनें रोकीं?" अनन्या ने गुस्से में पूछा।
आर्यन ने हैरानी से कहा, "मैंने? नहीं तो।"
तभी उसे समझ आ गया - यह उसके चाचा का काम है। आर्यन ने तुरंत फाइनेंस हेड को फोन लगाया, "डॉ. शर्मा की फाइलों पर सिर्फ मेरे सिग्नेचर चलेंगे, किसी और के नहीं। आधे घंटे में अप्रूवल दो।"
अनन्या शांत हो गई। उसने धीरे से कहा, "देखिए, मुझे नहीं पता आपके बोर्ड में क्या चल रहा है, पर अगर आपने मुझे जिम्मेदारी दी है, तो मुझे काम भी करने दीजिए। मैं यहाँ राजनीति करने नहीं आई।"
आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा, "और मैं राजनीति करने नहीं दूँगा। वादा रहा।"
उसी शाम, अस्पताल में एक गंभीर केस आया। एक बारह साल का बच्चा, सड़क हादसे में घायल, उसका दिल बुरी तरह क्षतिग्रस्त था। उसके माता-पिता गरीब थे, उनके पास पैसे नहीं थे। इमरजेंसी टीम ने अनन्या को बुलाया।
अनन्या ने तुरंत ऑपरेशन की तैयारी शुरू कर दी। पर तभी बिलिंग विभाग ने कहा, "मैडम, इस केस में एडवांस जमा नहीं हुआ है। बिना पेमेंट के हम सर्जरी नहीं कर सकते, नया नियम है।"
अनन्या का खून खौल उठा। उसने आर्यन को फोन किया। आर्यन उस समय एक इन्वेस्टर डिनर में था। फोन पर पूरी बात सुनते ही आर्यन ने कहा, "आप ऑपरेशन शुरू कीजिए, मैं आ रहा हूँ।"
बीस मिनट में आर्यन अस्पताल पहुँचा, सूट में ही। उसने बिलिंग विभाग में जाकर कहा, "इस बच्चे का सारा खर्च मेरे निजी खाते से जाएगा। और आज के बाद, इमरजेंसी में किसी भी बच्चे के लिए पैसा नहीं माँगा जाएगा। यह नियम मैं अभी बदल रहा हूँ।"
ऑपरेशन छह घंटे चला। अनन्या और उसकी टीम ने बच्चे की जान बचा ली। ऑपरेशन थिएटर से बाहर आते ही अनन्या की आँखों में आँसू थे - थकान और सुकून के।
बाहर आर्यन अभी भी खड़ा था। उसी सूट में, बिना खाए-पिए।
अनन्या ने कहा, "ऑपरेशन सफल रहा।"
आर्यन ने पहली बार राहत की साँस ली और कहा, "मैं जानता था, आप कर लेंगी।"
उस रात अस्पताल के कॉरिडोर में दोनों साथ चल रहे थे। अनन्या ने कहा, "आप आज डिनर छोड़कर क्यों आए? यह तो सिर्फ एक मरीज था।"
आर्यन ने उसकी ओर देखा और कहा, "क्योंकि आपने मुझे सिखाया है कि यहाँ धूल नहीं, जीवन है। और एक सीईओ होने से पहले, मैं भी एक इंसान हूँ, डॉक्टर।"
अनन्या मुस्कुराई। पहली बार उसे लगा कि इस ब्लैक सूट वाले आदमी के अंदर भी एक दिल धड़कता है।
पर कहानी इतनी आसान नहीं थी। दूर खड़ा विजय मल्होत्रा यह सब देख रहा था। उसने अपने फोन पर किसी को मैसेज किया, "इस डॉक्टर को इस अस्पताल से निकालना होगा, वरना आर्यन हमारे हाथ से निकल जाएगा।"
अगली सुबह अनन्या के खिलाफ एक गुमनाम शिकायत बोर्ड को भेजी गई - "डॉ. अनन्या अपने पद का दुरुपयोग कर रही हैं।"
अब क्या होगा? क्या आर्यन अनन्या को बचा पाएगा? क्या अनन्या का कार्डियक सेंटर बन पाएगा?
*[क्रमशः - भाग 3 में: अनन्या पर लगे आरोप और आर्यन का सबसे बड़ा फैसला]*