Namumkin Ishq in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | नामुमकिन इश्क - एपिसोड 43

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नामुमकिन इश्क - एपिसोड 43

एपिसोड 43 — कमरा नंबर 27
रात के करीब नौ बज चुके थे।
वशिष्ठ हवेली के बाहर गाड़ियों की आवाजाही लगभग बंद हो चुकी थी। पूरा घर शांत था, लेकिन अर्जुन के कमरे में किसी को चैन नहीं था।
मेज पर कमरे नंबर 27 वाली छोटी-सी पर्ची रखी थी।
अर्जुन उसके सामने खड़ा था और लगातार उसी को देख रहा था।
गौरव कुर्सी पर बैठा बोला,
"यार, तू पिछले दस मिनट से इसी पर्ची को देख रहा है। इसमें ऐसा क्या लिखा है?"
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
"क्योंकि मुझे लगता है कि मेरे पिता ने ये सिर्फ एक कमरे का नंबर नहीं छोड़ा था।"
विवेक भी पास आकर खड़ा हो गया।
"मतलब?"
"मतलब, कमरा नंबर 27 के अंदर शायद वो सबूत है जिसकी वजह से पंद्रह साल पहले इतना कुछ हुआ था।"
आयत थोड़ी दूर खड़ी सब सुन रही थी।
उसने धीमे से पूछा,
"और अगर वहाँ मेरे पापा से जुड़ा कोई सच हुआ तो?"
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
"तो हम उसे सामने लाएँगे।"
आयत ने हल्की आवाज में कहा,
"हम?"
अर्जुन कुछ पल उसे देखता रहा।
"हाँ... हम।"
उस एक शब्द पर आयत के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
गौरव ने दोनों को देखा और फिर विवेक की तरफ देखकर धीरे से कहा,
"भाई, मामला सिर्फ कमरे नंबर 27 का नहीं लग रहा।"
विवेक मुस्कुराया।
"मुझे भी यही लग रहा है।"
अर्जुन ने दोनों को घूरकर देखा।
"कुछ कहना है?"
"नहीं डॉक्टर साहब।"
दोनों एक साथ हँस पड़े।
आयत भी अपनी मुस्कान नहीं रोक पाई।
कुछ पलों के लिए कमरे का माहौल हल्का हो गया।
लेकिन अर्जुन के चेहरे की गंभीरता वापस आ गई।
"हमें अभी निकलना होगा।"
आयत ने पूछा,
"अभी?"
"हाँ।"
"इतनी रात में?"
अर्जुन ने सिर हिलाया।
"अगर रुद्र को पता चल गया कि हमें कमरे नंबर 27 के बारे में पता चल चुका है, तो वो हमसे पहले वहाँ पहुँच जाएगा।"
आयत ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
पुरानी वशिष्ठ हवेली
करीब चालीस मिनट बाद तीन गाड़ियाँ शहर के पुराने हिस्से में बने एक सुनसान रास्ते पर पहुँचीं।
सामने एक विशाल लेकिन बेहद पुरानी हवेली थी।
दीवारों पर समय के निशान साफ दिखाई दे रहे थे।
जगह-जगह पेंट उखड़ चुका था और लोहे का बड़ा गेट जंग से भर चुका था।
आयत ने खिड़की से बाहर देखा।
"यह जगह इतनी सुनसान क्यों है?"
अर्जुन ने कहा,
"क्योंकि पंद्रह साल से यहाँ कोई नहीं रहता।"
"और कमरा नंबर 27?"
"इसी हवेली में है।"
अर्जुन गाड़ी से उतरा।
गौरव और विवेक भी उसके साथ उतर गए।
आयत भी नीचे आई।
अर्जुन ने उसे देखते ही कहा,
"मेरे पास रहना।"
आयत ने हल्का-सा सिर हिलाया।
"ठीक है।"
चारों अंदर जाने लगे।
दरवाजा खोलते ही धूल की मोटी परत हवा में उड़ गई।
आयत ने अपने चेहरे के सामने हाथ कर लिया।
"हे भगवान..."
गौरव ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
"लगता है यहाँ सालों से कोई आया ही नहीं।"
अर्जुन ने चारों तरफ नजर दौड़ाई।
"कमरा नंबर 27 ऊपर वाली मंजिल पर होना चाहिए।"
वे सीढ़ियों की तरफ बढ़े।
हर कदम के साथ पुरानी सीढ़ियों की आवाज पूरे घर में गूँज रही थी।
आयत थोड़ा डर गई।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
"डर लग रहा है?"
आयत ने तुरंत कहा,
"नहीं।"
अर्जुन मुस्कुराया।
"झूठ।"
"मैं सच बोल रही हूँ।"
"तो मेरा हाथ इतनी कसकर क्यों पकड़ रखा है?"
आयत ने तुरंत उसका हाथ छोड़ दिया।
"मैंने कब पकड़ा था?"
गौरव और विवेक पीछे खड़े हँसी रोकने की कोशिश कर रहे थे।
अर्जुन ने दोनों को घूरा।
"चलो आगे।"
कमरा नंबर 27
ऊपर पहुँचकर अर्जुन ने पुराना गलियारा देखा।
दीवार पर कई कमरों के नंबर लिखे थे।
23...
24...
25...
26...
और फिर...
27।
अर्जुन रुक गया।
उसने दरवाजे को देखा।
दरवाजे पर एक पुराना ताला लगा था।
गौरव ने पूछा,
"चाबी?"
अर्जुन ने जेब से वही छोटी चाबी निकाली जो नूरजहाँ ने उसे दी थी।
उसने ताले में चाबी लगाई।
क्लिक।
दरवाजा खुल गया।
कमरे के अंदर अंधेरा था।
अर्जुन ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
कमरे में एक पुरानी मेज, कुछ किताबें और लोहे की अलमारी थी।
आयत धीरे-धीरे अंदर आई।
उसकी नजर दीवार पर लगी एक तस्वीर पर पड़ी।
वह तस्वीर देखकर वह रुक गई।
"अर्जुन..."
अर्जुन उसकी तरफ आया।
तस्वीर में आयत के पिता खड़े थे।
उनके साथ अर्जुन के दादा और...
रुद्र वशिष्ठ।
आयत की आँखें भर आईं।
"मेरे पापा इन दोनों के साथ क्या कर रहे थे?"
अर्जुन ने तस्वीर उतारी।
उसके पीछे कुछ लिखा हुआ था।
उसने पढ़ा—
"जिस दिन सच सामने आएगा, तीन परिवार टूटेंगे।"
अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।
गौरव ने पूछा,
"तीन परिवार?"
अर्जुन ने कहा,
"वशिष्ठ परिवार... आयत का परिवार... और शायद..."
वह रुक गया।
"तीसरा परिवार कौन है?"
अचानक आयत ने पीछे रखी अलमारी की तरफ देखा।
"शायद ये।"
सबकी नजर अलमारी पर गई।
अर्जुन ने अलमारी खोली।
अंदर कुछ पुरानी फाइलें थीं।
उसने एक फाइल उठाई।
ऊपर लिखा था—
PROJECT 27
गौरव ने हैरानी से पूछा,
"ये क्या है?"
अर्जुन ने फाइल खोली।
अंदर मेडिकल रिपोर्ट थीं।
कुछ नाम थे।
कुछ तारीखें थीं।
और सबसे नीचे...
एक तस्वीर।
आयत ने तस्वीर देखते ही अपने मुँह पर हाथ रख लिया।
"ये..."
अर्जुन ने तस्वीर उसकी तरफ बढ़ाई।
तस्वीर में एक छोटी बच्ची थी।
उम्र शायद चार-पाँच साल।
उसके हाथ में वही लॉकेट था जो आज आयत के पास था।
लेकिन तस्वीर के नीचे लिखा था—
"SUBJECT: A-27"
आयत की साँसें अटक गईं।
"मैं...?"
अर्जुन ने तुरंत फाइल के बाकी पन्ने पलटने शुरू किए।
अचानक उसकी नजर एक लाइन पर जाकर रुक गई।
"A-27 की पहचान सुरक्षित रखनी होगी। यदि रुद्र को पता चला कि बच्ची जीवित है, तो परिणाम गंभीर होंगे।"
आयत की आँखों से आँसू गिरने लगे।
"मेरे साथ ये सब क्या हुआ था?"
नूरजहाँ की बातें उसके कानों में गूँजने लगीं।
अर्जुन ने फाइल बंद कर दी।
"हमें माँ के पास वापस जाना होगा।"
लेकिन तभी...
कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।
सब चुप हो गए।
गौरव ने फुसफुसाकर पूछा,
"कोई आया है?"
अर्जुन ने हाथ से सबको शांत रहने का इशारा किया।
कदमों की आवाज दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गई।
फिर...
दरवाजा धीरे-धीरे खुला।
अर्जुन ने आगे बढ़कर सामने वाले का हाथ पकड़ लिया।
"कौन हो तुम?"
सामने खड़ा आदमी घबरा गया।
वह हवेली का पुराना चौकीदार था।
"साहब... मैं हूँ।"
अर्जुन ने उसे छोड़ दिया।
"तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
चौकीदार ने डरते हुए कहा,
"मैं तो बस देखने आया था कि यहाँ कोई आया तो नहीं।"
अर्जुन की नजर उस पर टिक गई।
"किसने कहा था तुम्हें देखने के लिए?"
चौकीदार चुप रहा।
अर्जुन ने सख्त आवाज में पूछा,
"बोलो!"
चौकीदार ने काँपते हुए कहा,
"एक आदमी ने..."
"कौन आदमी?"
"मुझे नहीं पता। उसने अपना चेहरा नहीं दिखाया।"
अर्जुन समझ गया।
कोई पहले से इस जगह पर नजर रख रहा था।
उधर रोहन...
शहर के दूसरे हिस्से में रोहन अपने कमरे में बैठा था।
उसके सामने वही फाइल खुली थी जो वशिष्ठ हवेली से चुराई गई थी।
उसने आखिरकार फाइल खोल दी।
पहले पन्ने पर एक नाम लिखा था—
"राघव मेहरा।"
रोहन के हाथ काँप गए।
"पापा..."
नीचे लिखा था—
"राघव मेहरा — रुद्र वशिष्ठ के साथ व्यावसायिक साझेदारी।"
रोहन को विश्वास नहीं हुआ।
"नहीं... पापा ऐसा नहीं कर सकते।"
उसने अगला पन्ना पलटा।
उसमें पंद्रह साल पुरानी एक तस्वीर थी।
तस्वीर में राघव मेहरा और रुद्र वशिष्ठ साथ खड़े थे।
पीछे एक तीसरा आदमी भी था।
रोहन ने तस्वीर को करीब लाकर देखा।
उसका चेहरा देखकर उसकी साँस रुक गई।
वह आदमी...
आयत का पिता था।
रोहन कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
"तो मेरे पापा... आयत के पापा को जानते थे?"
तभी कमरे का दरवाजा खुला।
राघव मेहरा अंदर आए।
उन्होंने बेटे के हाथ में फाइल देख ली।
उनका चेहरा अचानक बदल गया।
"ये फाइल तुम्हें कहाँ से मिली?"
रोहन ने पहली बार अपने पिता की आँखों में डर देखा।
"आप मुझे बताएंगे कि इसमें क्या है।"
राघव ने फाइल छीनने की कोशिश की।
रोहन पीछे हट गया।
"नहीं!"
"रोहन, ये फाइल तुम्हारे लिए नहीं है।"
"क्यों?"
"क्योंकि जितना कम जानोगे, उतना बेहतर रहेगा।"
रोहन ने गुस्से में कहा,
"पंद्रह साल से आप मुझे झूठ बोलते रहे?"
राघव चुप रहे।
रोहन की आवाज भर्रा गई।
"क्या आयत के पिता की मौत में आपका भी हाथ था?"
राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।
रोहन समझ गया।
उसकी आँखों में अविश्वास उतर आया।
"आप चुप क्यों हैं?"
राघव ने धीरे से कहा,
"तुम्हें इस मामले से दूर रहना होगा।"
रोहन ने फाइल सीने से लगा ली।
"अब मैं दूर नहीं रहूँगा।"
वह कमरे से बाहर चला गया।
राघव ने उसके जाते ही अपना फोन निकाला।
एक नंबर मिलाया।
"रुद्र... रोहन को सब पता चल गया है।"
दूसरी तरफ कुछ देर खामोशी रही।
फिर आवाज आई—
"तो अब रोहन को भी रोकना पड़ेगा।"
वापस कमरा नंबर 27
अर्जुन ने फाइल अपने बैग में रखी।
"हमें यहाँ से निकलना होगा।"
आयत ने आखिरी बार कमरे को देखा।
उसे महसूस हो रहा था कि उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच इसी कमरे में दफन था।
वह अर्जुन के साथ बाहर निकलने लगी।
लेकिन जैसे ही वह दरवाजे से बाहर आई...
उसकी नजर सामने की दीवार पर पड़ी।
वहाँ एक छोटी-सी धातु की प्लेट लगी थी।
उस पर लिखा था—
A-27
आयत अचानक रुक गई।
उसके सिर में तेज दर्द उठा।
उसने अपना सिर पकड़ लिया।
"आयत!"
अर्जुन ने उसे संभाल लिया।
"क्या हुआ?"
आयत ने आँखें बंद कर लीं।
उसके दिमाग में कुछ धुंधली तस्वीरें चमकने लगीं।
एक कमरा...
एक छोटी बच्ची...
एक आदमी...
और किसी की आवाज—
"आयत को बचाना है तो इसे कभी मत बताना कि उसके पिता कौन थे..."
आयत ने अचानक आँखें खोल दीं।
वह अर्जुन को देखने लगी।
"अर्जुन..."
"हाँ?"
"मुझे कुछ याद आया है।"
अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।
"क्या?"
आयत की आँखों में डर था।
"मैंने बचपन में... आपके दादा को देखा था।"
अर्जुन स्तब्ध रह गया।
"क्या?"
आयत ने धीमे से कहा—
"और उन्होंने मुझे देखकर एक बात कही थी..."
"क्या?"
आयत की आवाज काँप गई।
"उन्होंने कहा था—'इसे अर्जुन से कभी मत मिलाना।'"
अर्जुन के चेहरे से सारी मुस्कान गायब हो गई।
उसे समझ नहीं आया कि उसके दादा ने आयत को उससे दूर रखने की बात क्यों कही थी।
और सबसे बड़ा सवाल...
अगर अर्जुन और आयत को कभी मिलना ही नहीं था, तो किस्मत ने उन्हें बार-बार एक-दूसरे के सामने क्यों ला खड़ा किया था?
अर्जुन ने आयत का हाथ थाम लिया।
"अब चाहे जो हो जाए..."
वह उसकी आँखों में देखकर बोला—
"मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा।"
आयत की आँखों में आँसू आ गए।
और पहली बार...
उसने अर्जुन का हाथ खुद कसकर पकड़ लिया।
लेकिन दोनों को नहीं पता था कि हवेली के बाहर खड़ी एक काली कार में कोई उनकी हर हरकत देख रहा था।
कार की पिछली सीट पर बैठा आदमी फोन पर सिर्फ इतना बोला—
"रुद्र साहब... अर्जुन को फाइल मिल गई है।"
दूसरी तरफ से जवाब आया—
"तो अब अगला कदम उठाओ।"
आदमी ने पूछा,
"आयत का क्या?"
कुछ पल खामोशी रही।
फिर रुद्र की ठंडी आवाज आई—
"आयत को जिंदा चाहिए। अर्जुन को नहीं।"