एपिसोड 44— पहला वार
पुरानी हवेली से निकलते वक्त अर्जुन को लगातार ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई उनकी निगरानी कर रहा हो।
रात काफी हो चुकी थी। सड़क लगभग सुनसान थी और दूर-दूर तक सिर्फ स्ट्रीट लाइट्स की हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।
आयत अर्जुन के साथ चल रही थी। उसके हाथ में वही लॉकेट था, जिसमें अब उसे अपनी जिंदगी से जुड़ा एक ऐसा राज मिल चुका था, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था।
कुछ कदम चलने के बाद आयत अचानक रुक गई।
"अर्जुन..."
अर्जुन ने पलटकर देखा।
"क्या हुआ?"
"आज जो कुछ भी पता चला... उसके बाद मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं किस पर भरोसा करूँ।"
अर्जुन कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर शांत आवाज में बोला,
"मुझ पर कर सकती हो।"
आयत की आँखें उसकी आँखों से मिलीं।
"आप पर?"
"हाँ।"
"लेकिन अगर कल आपको भी पता चला कि आपके परिवार ने मुझसे जुड़ा कोई बहुत बड़ा सच छिपाया है, तब?"
अर्जुन ने बिना देर किए कहा,
"तो मैं उस सच को तुम्हारे सामने खुद लेकर आऊँगा। चाहे वो मेरे परिवार के खिलाफ ही क्यों न हो।"
आयत उसे देखती रही।
उसके चेहरे पर पहली बार डर थोड़ा कम हुआ।
"आप हमेशा ऐसे ही बोलते हैं?"
अर्जुन हल्का-सा मुस्कुराया।
"कैसे?"
"जैसे हर मुश्किल का हल आपके पास हो।"
"नहीं।"
"फिर?"
"हल मेरे पास नहीं होता... लेकिन कोशिश करना कभी नहीं छोड़ता।"
आयत के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
पीछे से गौरव की आवाज आई,
"भाई, रोमांस बाद में करना। पहले यहाँ से निकलें।"
अर्जुन ने उसे घूरकर देखा।
"चुप कर।"
गौरव हँस दिया।
आयत भी अपनी हँसी रोक नहीं पाई।
लेकिन अगले ही पल...
एक तेज आवाज हुई।
धड़ाम!
अर्जुन ने तुरंत आयत को अपनी तरफ खींच लिया।
सामने सड़क पर एक बाइक आकर रुकी थी।
उस पर दो नकाबपोश आदमी बैठे थे।
अर्जुन का चेहरा तुरंत गंभीर हो गया।
"सब पीछे हटो।"
गौरव और विवेक भी सावधान हो गए।
बाइक से उतरकर एक आदमी धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ा।
उसने अर्जुन की तरफ देखते हुए कहा,
"फाइल हमें दे दो।"
अर्जुन ने पूछा,
"कौन-सी फाइल?"
वह आदमी हँसा।
"अर्जुन वशिष्ठ... हमें पता है तुम्हारे पास क्या है।"
आयत ने अर्जुन की तरफ देखा।
अर्जुन ने उसे पीछे रहने का इशारा किया।
"अगर फाइल चाहिए तो खुद आकर ले लो।"
आदमी ने अपने साथी की तरफ देखा।
अगले ही पल दोनों अर्जुन की तरफ बढ़े।
गौरव और विवेक भी आगे आ गए।
कुछ सेकंड तक चारों के बीच हाथापाई हुई।
अर्जुन ने एक हमलावर को पीछे धकेल दिया, लेकिन दूसरा आदमी मौका देखकर आयत की तरफ बढ़ा।
"आयत!"
अर्जुन तुरंत उसकी तरफ दौड़ा।
आयत पीछे हटते-हटते दीवार से जा लगी।
वह आदमी उसका हाथ पकड़ने ही वाला था कि अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"उसे छूने की कोशिश मत करना।"
उसकी आवाज में इतना गुस्सा था कि सामने वाला भी एक पल के लिए रुक गया।
अर्जुन ने उसे पीछे धकेल दिया।
वह आदमी सड़क पर गिर पड़ा।
लेकिन तभी दूर से पुलिस की गाड़ी की आवाज सुनाई दी।
दोनों नकाबपोश तुरंत बाइक पर बैठे और तेजी से वहाँ से भाग गए।
गौरव ने कहा,
"ये लोग पुलिस से डरकर भागे हैं।"
अर्जुन ने सड़क की तरफ देखते हुए कहा,
"नहीं।"
"क्या?"
"उन्हें पता था कि पुलिस यहाँ आने वाली है।"
विवेक ने चौंककर पूछा,
"मतलब?"
अर्जुन ने कहा,
"किसी ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि हम यहाँ हैं।"
उसकी नजर आयत पर गई।
फिर उसने धीमे स्वर में कहा,
"हमारी हर चाल किसी को पता चल रही है।"
अगली सुबह
वशिष्ठ हवेली में सुबह का माहौल बिल्कुल अलग था।
रात की घटना के बाद अर्जुन ने पूरी रात ठीक से नींद नहीं ली थी।
वह अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ा बाहर देख रहा था।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
"आइए।"
दरवाजा खुला।
आयत अंदर आई।
अर्जुन ने उसे देखकर पूछा,
"तुम ठीक हो?"
आयत ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
फिर कुछ पल चुप रहकर बोली,
"कल अगर आप समय पर नहीं आते तो..."
अर्जुन ने बात काट दी।
"लेकिन मैं आया।"
आयत चुप हो गई।
अर्जुन उसके करीब आया।
"जब तक मैं हूँ, तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है।"
आयत ने उसकी तरफ देखा।
"आपको खुद डर नहीं लगता?"
अर्जुन मुस्कुराया।
"लगता है।"
आयत हैरान हुई।
"आपको?"
"हाँ।"
"किस चीज़ से?"
अर्जुन ने कुछ पल उसे देखा।
फिर बोला,
"तुम्हें खोने से।"
आयत जैसे कुछ बोल ही नहीं पाई।
दोनों की आँखें एक-दूसरे पर टिक गईं।
कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।
तभी बाहर से गौरव की आवाज आई—
"अर्जुन! जल्दी नीचे आ!"
अर्जुन और आयत दोनों चौंक गए।
अर्जुन ने कहा,
"चलो।"
रोहन का फैसला
उधर रोहन अपने पिता की स्टडी के बाहर खड़ा था।
रातभर उसे नींद नहीं आई थी।
उसके दिमाग में वही फाइल घूम रही थी।
उसने तय कर लिया था कि अब वह किसी से पूछकर सच नहीं जानेगा।
वह खुद पता लगाएगा।
उसने धीरे से अपने पिता की तिजोरी के सामने जाकर पासवर्ड डालना शुरू किया।
पहला नंबर...
गलत।
दूसरा...
गलत।
तीसरा...
तिजोरी नहीं खुली।
रोहन ने कुछ देर सोचा।
फिर अपनी माँ की जन्मतिथि डाल दी।
क्लिक।
तिजोरी खुल गई।
रोहन की साँस रुक गई।
अंदर कई दस्तावेज थे।
सबसे नीचे एक पुराना लिफाफा रखा था।
उस पर सिर्फ एक नाम लिखा था—
"नूरजहाँ।"
रोहन ने काँपते हाथों से लिफाफा खोला।
अंदर एक पत्र था।
उसने पढ़ना शुरू किया।
कुछ लाइनें पढ़ते ही उसका चेहरा बदल गया।
पत्र में लिखा था कि पंद्रह साल पहले नूरजहाँ और उसके पति को लखनऊ छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था।
और उस फैसले में...
राघव मेहरा का भी हाथ था।
रोहन के हाथ काँपने लगे।
"पापा..."
तभी पीछे से आवाज आई।
"तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
रोहन पलटा।
दरवाजे पर उसके पिता खड़े थे।
राघव मेहरा का चेहरा गुस्से से लाल था।
"मैंने तुम्हें इस कमरे में आने से मना किया था।"
रोहन ने पत्र उनकी तरफ उठाया।
"क्यों?"
राघव चुप रहे।
"क्यों पापा?"
"ये मामला तुम्हारे समझने का नहीं है।"
"तो समझाइए।"
"रोहन..."
"क्या आप आयत के पिता को जानते थे?"
राघव की आँखें झुक गईं।
रोहन ने अगला सवाल किया—
"क्या उनकी मौत में आपका हाथ था?"
राघव ने तुरंत कहा,
"नहीं!"
रोहन थोड़ा शांत हुआ।
लेकिन अगले ही पल उसके पिता ने कहा,
"मैंने उन्हें नहीं मारा था।"
रोहन फिर जम गया।
"मतलब आप जानते थे कि उन्हें कौन मारने वाला है?"
राघव के पास कोई जवाब नहीं था।
रोहन की आँखों में गुस्सा भर गया।
"आपने मुझे इतने सालों तक झूठ बताया।"
राघव ने कहा,
"मैं तुम्हें बचा रहा था।"
"किससे?"
राघव ने धीरे से कहा—
"रुद्र से।"
अस्पताल में नया दिन
कुछ घंटों बाद अर्जुन, आयत, रीवा, करण, सनाया, रोहन और बाकी छात्र फिर सिटी हॉस्पिटल पहुँचे।
ट्रेनिंग का नया दिन शुरू हो चुका था।
लेकिन आज अर्जुन का ध्यान बार-बार आयत की तरफ जा रहा था।
आयत मरीजों की फाइल देख रही थी।
अर्जुन उसके पास आया।
"सब समझ आ रहा है?"
आयत ने मुस्कुराकर कहा,
"जी, डॉक्टर साहब।"
"बहुत जल्दी सीख रही हो।"
"आपसे जो सीखने को मिलता है।"
अर्जुन मुस्कुराया।
दूर खड़ी सनाया ने दोनों को देखा।
उसके चेहरे पर हल्की उदासी आई।
करण ने उसे देख लिया।
वह उसके पास आया।
"क्या हुआ?"
"कुछ नहीं।"
"झूठ बोल रही हो।"
सनाया ने उसे घूरा।
"आपको हर बात में बोलना जरूरी है?"
करण मुस्कुराया।
"जब तुम परेशान होती हो, तब हाँ।"
सनाया कुछ नहीं बोली।
पहली बार उसे करण की बात बुरी नहीं लगी।
लेकिन तभी हॉस्पिटल के मुख्य दरवाजे पर एक आदमी आया।
उसने रिसेप्शन पर कुछ पूछा।
फिर उसकी नजर सीधे अर्जुन पर जाकर टिक गई।
कुछ सेकंड बाद उसने अपने फोन पर किसी को मैसेज किया—
"अर्जुन यहाँ है। आयत भी उसके साथ है।"
दूसरी तरफ से तुरंत जवाब आया—
"ठीक है। अब प्लान का दूसरा हिस्सा शुरू करो।"
वह आदमी मुस्कुराया।
और बिना किसी को बताए हॉस्पिटल के अंदर गायब हो गया।
अर्जुन को अभी पता भी नहीं था कि जिस अस्पताल को वह सिर्फ ट्रेनिंग की जगह समझ रहा था...
वही जगह अब उसके सबसे बड़े दुश्मन का अगला जाल बनने वाली थी।
और इस बार निशाना सिर्फ आयत नहीं थी।
निशाना अर्जुन खुद था।
क्रमशः...