Money VS Me Part - 21 in Hindi Human Science by fiza saifi books and stories PDF | Money Vs Me - Part 21

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Money Vs Me - Part 21

आपके इस हिस्से को कहानी के प्रवाह, भावनाओं और रहस्य को बरकरार रखते हुए साहित्यिक हिंदी में ढाल दिया है:

Writing

मैं नानी की आवाज़ सुनकर चौंककर पलटा।

“नहीं नानी... कुछ नहीं। ये आदमी कौन है तस्वीर में?” मैंने धीमी आवाज़ में पूछा।

नानी ने कुछ पल तस्वीर को देखा, फिर जो जवाब दिया, उसने मेरे पैरों तले की जमीन खिसका दी।

“बेटा... ये मोहिनी का दूसरा पति और तेरा सौतेला बाप है।”

मैं जैसे अपनी जगह पर जम गया।

नानी आगे कहने लगीं—

“तेरे पिता के गुजर जाने के बाद घर के हालात बहुत खराब हो गए थे। तू बहुत छोटा था, इसलिए मुझे मोहिनी की चिंता हमेशा सताती रहती थी। ठाकुर विक्रम प्रताप के घराने से तेरे नाना जी के काफी अच्छे संबंध थे। उन्होंने अपने बेटे उदय प्रताप का रिश्ता मोहिनी के लिए माँग लिया।”

नानी की आवाज़ में पुराना दर्द उतर आया था।

“हम दोनों मना नहीं कर पाए। हमें लगा था कि इससे तुझे और मोहिनी को एक अच्छी जिंदगी मिल जाएगी... लेकिन मुझे क्या पता था कि शादी के बाद उदय प्रताप तुझे अपने साथ रखने से ही मना कर देगा।”

नानी की आँखें नम हो गईं।

“इतना ही नहीं... उसने मोहिनी को भी कभी इस घर में वापस नहीं आने दिया। वह उसे इस शहर से भी बहुत दूर ले गया। उसके बाद मैं कभी अपनी बेटी से दोबारा नहीं मिल पाई।”

नानी की बातें मेरे कानों में गूंजती रहीं।

और मैं...

मैं जैसे किसी सदमे में खड़ा था।

मैं हमेशा यही सोचता रहा था कि पिता के गुजर जाने के बाद मेरी माँ ने कभी मेरी खबर नहीं ली। हमेशा यही सवाल मेरे भीतर चुभता रहा था कि आखिर एक माँ अपने बच्चे को इस तरह कैसे छोड़ सकती है?

लेकिन आज...

आज पहली बार मुझे समझ आ रहा था कि उस वक्त असल में हुआ क्या था।

मेरे भीतर अचानक गुस्से का सैलाब उमड़ पड़ा।

माँ उस हवेली में नहीं थी... तो फिर कहाँ थी?

क्या वह अमेरिका में थी?

जैसा कि मुझे पता था, ठाकुर उदय प्रताप का पूरा परिवार अमेरिका में सेटल था और वह खुद यहाँ अकेला रहता था।

तो क्या...

मेरी माँ भी अमेरिका में थी?

इस ख्याल ने मुझे भीतर तक बेचैन कर दिया।

इतने सालों बाद अचानक मेरी माँ की याद मेरे सीने में तूफान बनकर उठने लगी। न जाने वह किस हाल में होंगी...

और अब इस दुनिया में हैं भी या नहीं?

मैं यह सोचकर ही काँप उठा।

मेरे भीतर दबा हुआ बरसों का दर्द अचानक मेरी माँ की मोहब्बत बनकर पूरे शरीर में दौड़ने लगा। आँखों से आँसू बह निकले।

नानी ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया।

मैं काफी देर तक उनके सीने से लगा रोता रहा।

फिर किसी तरह खुद को संभाला।

मैंने मन ही मन एक फैसला कर लिया था।

ऐसा फैसला, जिसे अब मुझे हर हाल में पूरा करना था।

मैंने नानी की तरफ देखते हुए कहा—

“नानी, मैं फ्रेश होकर आता हूँ। तब तक अच्छा-सा खाना बनवा लो। फिर हम दोनों साथ बैठकर खाना खाएँगे।”

मैंने एक पल रुककर कहा—

“मैं अभी कुछ दिन यहीं रहूँगा। छुट्टी लेकर आया हूँ। आराम से बैठकर आपको सब कुछ बताऊँगा।”

नानी मेरी तरफ देखने लगीं।

मैं हमेशा के लिए घर लौटा था...

लेकिन अब दोबारा लौटने की वजह मेरी माँ थी।

नानी ने अपनी आँखों से आँसू पोंछे और रसोई में मामी के पास चली गईं, ताकि खाना परोसने की तैयारी कर सकें।

और मैं वहीं खड़ा अपनी माँ के बारे में सोचता रहा...

मैं वहीं खड़ा गहरी सोच में डूब गया।

अब मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही सवाल घूम रहा था—

मैं उदय प्रताप के सामने कैसे जाऊँगा?

जिस आदमी से बचकर मैं भागा था, आज उसी के सामने मुझे दोबारा खड़ा होना था। लेकिन इस बार बात सिर्फ मेरी नहीं थी...

बात मेरी माँ की थी।

मुझे किसी भी हालत में उसके बारे में पता लगाना था। वह कहाँ थी? कैसी थी? और इतने सालों से मुझसे दूर क्यों रही?

मैं जानता था कि सीधे जाकर उदय प्रताप से अपनी माँ के बारे में पूछना आसान नहीं होगा। अगर उसे जरा भी अंदाजा हो गया कि मैं उसके अतीत के बारे में जानने की कोशिश कर रहा हूँ, तो शायद वह सच मुझसे हमेशा के लिए छिपा देता।

इसलिए मुझे बहुत सोच-समझकर कदम उठाना था।

पहले मुझे उसके करीब जाना होगा...

उसका भरोसा जीतना होगा...

और फिर धीरे-धीरे उसके अतीत की उन परतों को खोलना होगा, जिनके पीछे मेरी माँ की जिंदगी दफन थी।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही था—

मैं उदय प्रताप तक पहुँचूँगा कैसे?

और उससे भी बड़ा सवाल...

क्या मैं अपनी माँ तक पहुँच भी पाऊँगा?

इन सवालों के जवाब मेरे पास नहीं थे।

लेकिन एक बात अब बिल्कुल साफ थी।

मैंने अपनी माँ को इतने साल खोया था...

अब चाहे मुझे कितनी भी मुश्किलों का सामना क्यों न करना पड़े, मैं उन्हें दोबारा खोने वाला नहीं था।

तभी बाहर से नानी की आवाज आई—

“क्षितिज बेटा, खाना लग गया है।”

मैंने तुरंत तस्वीर वापस लिफाफे में रख दी।

लेकिन अब मेरे भीतर कुछ बदल चुका था।

मुझे यकीन हो गया था कि मेरी माँ ने मुझे छोड़ा नहीं था...

बल्कि शायद उसे मुझसे दूर किया गया था।

मैं तस्वीर को सीने से लगाकर कुछ पल आँखें बंद किए खड़ा रहा।

फिर मैंने खुद से एक वादा किया—

“माँ... मैं आपको ढूँढकर रहूँगा।”

चाहे मुझे उदय प्रताप के सामने क्यों न खड़ा होना पड़े।

चाहे मुझे उस पुराने अतीत में वापस क्यों न जाना पड़े।

अब मैं पीछे नहीं हटूँगा।

मैं लिफाफा अपनी जेब में रखकर कमरे से बाहर निकल आया।

लेकिन मुझे नहीं पता था...

जिस सच की तलाश में मैं निकलने वाला था, वह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा तूफान बनने वाला था।