इस हिस्से को उसी उपन्यास-जैसे अंदाज़ में, भावनाओं और अतीत के दर्द को थोड़ा और गहरा करते हुए आगे बढ़ाया है:
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इस बार मामा, मामी और उनके बच्चे पहले की तरह मुझसे लड़ने-झगड़ने नहीं लगे थे।
शायद मेरे चले जाने के बाद उन्हें अपनी गलतियों का एहसास हो गया था।
और सच कहूँ तो मैंने भी अपने कजिन्स की पुरानी गलतियों को भुलाकर उन्हें दिल से माफ कर दिया था। आखिर कब तक मैं उन पुरानी बातों का बोझ अपने सीने में लिए घूमता रहता?
मामा का एक छोटा-सा काम था, जिससे वह जैसे-तैसे घर चला रहे थे। बच्चों की पढ़ाई का खर्च, घर का खर्च और ऊपर से घर की हालत भी कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थी।
इसलिए मैंने सबसे पहले मामा को उनका बिजनेस बढ़ाने के लिए काफी पैसे दिए।
उसके बाद घर की मरम्मत का काम भी शुरू करवा दिया।
घर में जैसे अचानक खुशियाँ लौट आई थीं।
सब मुझसे बार-बार पूछते कि मैं इतने साल कहाँ था? कैसे रहा? इतने दिनों तक मेरी जिंदगी कैसी बीती?
मैं उन्हें क्या बताता?
मैंने कुछ सच और कुछ झूठ मिलाकर अपनी एक कहानी उन्हें सुना दी।
एक हफ्ता इसी तरह गुजर गया।
घर की मरम्मत का काम लगातार चल रहा था और मामा भी अपने बिजनेस को बढ़ाने के लिए मुझसे नए-नए आइडिया लेते रहते थे। मैंने उन्हें जो कुछ बताया, उस पर उन्होंने काम करना भी शुरू कर दिया था।
मुझे उम्मीद थी कि अगर उन्होंने सही तरीके से मेहनत की, तो बहुत जल्द उनकी जिंदगी बदल सकती है।
नानी तो मेरे वापस आने से बेहद खुश थीं।
उनके चेहरे की खुशी देखकर मुझे भी सुकून मिलता था।
लेकिन मैं...?
मेरे दिमाग में दिन-रात सिर्फ एक ही चेहरा घूमता रहता था।
ठाकुर उदय प्रताप सिंह।
और उसके साथ जुड़ा एक और चेहरा...
मेरी माँ का।
जितना मैं उसके बारे में सोचता, उतनी ही अपनी माँ से मिलने की बेचैनी बढ़ती जाती।
फिर एक रात...
मैं अपने कमरे की छत पर चारपाई डालकर लेटा हुआ था। आसमान में चाँद आधा था और हल्की ठंडी हवा चल रही थी।
मैं आँखें बंद किए जाने क्या-क्या सोच रहा था कि अचानक...
वो मुझे याद आ गई।
meera..
उसका नाम मेरे दिमाग में आते ही ऐसा लगा जैसे ठंडी हवा का कोई झोंका मेरे दिल को छूकर निकल गया हो।
उसके गुलाबी होंठ...
साँवली-सी रंगत...
भूरी आँखें...
और वो लंबे, घुँघराले बाल...
मैंने धीरे से आँखें खोलीं।
आज इतने सालों बाद भी उसका चेहरा मेरी यादों में बिल्कुल वैसा ही था।
तभी मुझे पहली बार खुद से यह सच स्वीकार करना पड़ा—
हाँ... मुझे meera से मोहब्बत हो गई थी।
लेकिन मैंने हमेशा इस एहसास को नजरअंदाज किया था।
क्योंकि मेरी आँखों पर तो सिर्फ पैसा कमाने की एक पट्टी बंधी हुई थी।
मैं जिंदगी में जल्दी से जल्दी कुछ बड़ा हासिल करना चाहता था। पैसा कमाना चाहता था। इतना कि फिर कभी किसी के सामने मजबूर होकर खड़ा न होना पड़े।
और उसी जुनून में मैंने उस लड़की को खो दिया था, जिसने मुझ पर सबसे ज्यादा भरोसा किया था।
आज न जाने कितने सालों बाद meera का चेहरा फिर से मेरी आँखों के सामने लहराने लगा था।
मैंने दर्द से करवट बदल ली।
मैंने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि मेरे अचानक बिना किसी को बताए वहाँ से चले आने के बाद उस पर क्या गुजरी होगी।
जिस भरोसे के साथ उसने मेरा हाथ थामा था...
मैंने उसी भरोसे को कितनी बेरहमी से तोड़ दिया था।
दुनिया की नजरों में शायद एक मासूम लड़की को धोखा देने वाला इंसान मैं ही था।
और शायद...
वह मुझे आज भी उसी नजर से देखती होगी।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
मन में एक सवाल उठा—
क्या कभी meera मुझे माफ कर पाएगी?
क्या वह अब भी मुझसे नफरत करती होगी?
या शायद उसने मुझे अपनी जिंदगी से पूरी तरह मिटा दिया होगा?
मैं इन सवालों का कोई जवाब नहीं जानता था।
लेकिन एक बात तय थी।
अगर जिंदगी ने मुझे एक बार फिर meera के सामने खड़ा कर दिया, तो मैं उससे अपनी गलती की माफी जरूर माँगूँगा।
चाहे वह मुझे माफ करे या नहीं...
मैं उसके सामने सिर झुकाकर अपने किए की सजा स्वीकार करूँगा।
मैंने दर्द से अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं।
और उसी पल...
दो गर्म आँसू मेरी आँखों के कोनों से निकलकर कनपटियों के पास बह गए।
उस रात मुझे पहली बार एहसास हुआ कि जिंदगी में पैसा तो बहुत कुछ खरीद सकता है...
लेकिन बीता हुआ वक्त और खोया हुआ प्यार कभी वापस नहीं खरीद सकता।
इस हिस्से को पिछले अध्याय से जोड़ते हुए भावनात्मक और सिनेमाई अंदाज़ में आगे बढ़ाया है:
Writing
अगली सुबह नाश्ते की मेज पर मैंने मामा और नानी को अपने वापस जाने की खबर दे दी।
मेरी बात सुनते ही दोनों के चेहरे उतर गए।
मामा ने कुछ पल मुझे देखा, फिर उदास आवाज़ में बोले—
“क्षितिज, क्या हुआ बेटा? क्या हमारी तरफ से कोई कमी रह गई? अब क्यों जा रहे हो तुम? यहीं रहो मेरे पास... ये तुम्हारा ही घर है।”
उनकी आवाज़ में शिकायत कम और अपनापन ज्यादा था।
नानी भी चुपचाप मुझे देख रही थीं।
मैं हल्का-सा मुस्कुरा दिया।
“नहीं मामा, ऐसी कोई बात नहीं है। बस मुझे कुछ काम पूरे करने हैं। कुछ दिनों की ही बात है... फिर मैं वापस आ जाऊँगा और आपके साथ ही रहूँगा। आप बिल्कुल फिक्र मत कीजिए।”
नानी ने तुरंत मेरा हाथ पकड़ लिया।
“सच कह रहा है ना बेटा?”
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा—
“हाँ नानी, बिल्कुल सच। शायद बस एक महीने भर की बात है। उसके बाद मैं हमेशा आपके साथ रहूँगा।”
मैं कुछ पल के लिए रुका।
फिर धीमी आवाज़ में कहा—
“ये मेरा घर है... मेरा परिवार है। और आपके सिवा मेरा है ही कौन?”
मेरी बात सुनकर नानी की आँखें भर आईं।
मामा और मामी ने भी मेरे सिर पर हाथ रख दिया।
उस पल मुझे पहली बार महसूस हुआ कि इतने साल दूर रहने के बाद भी इस घर में मेरे लिए जगह बाकी थी।
मैंने अपनी ट्रेन की टिकट पहले ही बुक करवा रखी थी।
दोपहर होते-होते मैंने अपना बैग उठाया और सबको विदा कहा।
नानी ने जाते वक्त मुझे कई बार समझाया कि अपना ख्याल रखना और जल्दी वापस आना।
मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कि इस बार मैं उन्हें छोड़कर हमेशा के लिए नहीं जा रहा।
फिर मैं घर से निकल पड़ा।
एक बार फिर उसी सफर पर...
जिसके बारे में मुझे खुद नहीं पता था कि इस बार रास्ते मुझे कहाँ ले जाने वाले थे।
लेकिन इस बार सब कुछ पहले जैसा नहीं था।
इस बार मेरा एक मकसद था।
सबसे पहले मुझे उदय प्रताप के पास जाना था।
मुझे अपनी माँ के बारे में हर हाल में जानकारी हासिल करनी थी।
और दूसरा...
मुझे माया से एक बार मिलना था।
पता नहीं अब उसकी शादी हो चुकी होगी या नहीं।
शायद वह अपनी जिंदगी में बहुत आगे बढ़ चुकी होगी।
शायद उसने मुझे कब का भुला दिया होगा।
लेकिन फिर भी...
मैं उससे एक बार मिलना चाहता था।
सिर्फ इसलिए कि उसके सामने खड़े होकर अपने किए की माफी माँग सकूँ।
ट्रेन अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी।
खिड़की से आती ठंडी हवा मेरे चेहरे को छू रही थी।
हर गुजरते स्टेशन के साथ जाने क्यों माया की याद और गहरी होती जा रही थी।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
और खुद को उसकी यादों में खो जाने दिया।
उसकी भूरी आँखें...
उसकी मुस्कान...
उसकी आवाज़...
सब कुछ जैसे कल की ही बात हो।
लेकिन मुझे क्या पता था कि जिस माया से मिलने की उम्मीद लेकर मैं जा रहा था...
शायद उसकी जिंदगी में मेरे लिए अब कोई जगह ही नहीं बची थी।
और आने वाला वक्त...
मेरे सामने मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सच खोलने वाला था।