एक आम सी प्रेम कहानी
भाग - १४
लेखिका "अनामिका"
जैसे ही मलय ने सगाई की बात रखी, कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। मलय और निहारिका के माता-पिता चुपचाप एक-दूसरे का चेहरा ताकने लगे। यह खामोशी देख दोनों के दिल धक-धक करने लगे कि कहीं सब कुछ बिगड़ न जाए। तभी निहारिका के पिता ने चुप्पी तोड़ते हुए मुस्कुराकर कहा, "ठीक है, हमें मंजूर है।" बस फिर क्या था, छाई हुई घबराहट पल भर में गायब हो गई और पूरा कमरा ठहाकों व खुशियों से गूंज उठा।
सगाई की तारीख तय होते ही दोनों घरों में चहल-पहल बढ़ गई। एक तरफ कपड़ों के रंगों और गहनों की खरीदारी को लेकर बहस छिड़ी थी, तो दूसरी तरफ मलय और निहारिका फोन पर चोरी-छिपे एक-दूसरे की पसंद नापसंद पूछने में लगे थे।
तैयारियों के इस प्यारे से शोरगुल और हल्की-फुल्की भागदौड़ ने दोनों परिवारों को और करीब ला दिया था।
बैंक्वेट हॉल के उस कमरे में हल्की-फुल्की अफरा-तफरी मची हुई थी। सहेलियाँ निहारिका के लहंगे की प्लीट्स ठीक करने और मेकअप को अंतिम रूप देने में जुटी थीं। तभी ड्रेसिंग टेबल पर रखे फोन की स्क्रीन जगमगा उठी—मलय का कॉल था।
निहारिका ने थोड़ा साइड में होकर फोन उठाया और संकोच से कहा, "जी... कहिए?"
"कमरे से बाहर आ सकती हो... छत पर दो मिनट के लिए?" मलय की आवाज़ में एक अजीब-सी बेसब्री और झिझक थी।
निहारिका चौंक गई, "अभी? सब नीचे आ चुके हैं, सगाई का मुहूर्त होने वाला है! किसी ने देख लिया तो?"
"सिर्फ दो मिनट... प्लीज? मैं इंतज़ार कर रहा हूँ," मलय ने मिन्नत भरे अंदाज़ में कहा और कॉल काट दिया।
दिल की धड़कनों को संभालते हुए, निहारिका किसी तरह सहेलियों की नज़र बचाकर अपना भारी पर्पल लहंगा संभालती हुई सीढ़ियों से ऊपर छत की ओर बढ़ी।
जैसे ही उसने टेरेस का भारी दरवाज़ा खोला, हल्की ठंडी हवा के झोंके ने उसका स्वागत किया। सामने मलय खड़ा था—गहरे बैगनी (पर्पल) रंग की शेरवानी में, जिस पर बेहद बारीक और नफीस कढ़ाई की गई थी। उस पोशाक में मलय इतना ढालू और आकर्षक लग रहा था कि निहारिका की नज़रें झिझक के साथ वहीं ठहर गईं।
निहारिका को देखते ही मलय की आँखें भी फटी की फटी रह गईं। बैंगनी लहंगे में लिपटी, हल्की-सी घबराहट और बिखरी मुस्कान के साथ निहारिका किसी ख़्वाब जैसी लग रही थी। मलय के चेहरे पर एक रूहानी सी चमक आ गई।
"तुम... तुम बहुत ख़ूबसूरत लग रही हैं," मलय ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए थोड़ी हिचकिचाहट के साथ कहा।
निहारिका ने शर्माते हुए अपनी पलकें झुका लीं, "और आप भी बहुत अच्छे लग रहे हैं। पर... आपने मुझे यहाँ क्यों बुलाया?"
मलय ने मुस्कुराते हुए अपनी शेरवानी की जेब से मखमली डिब्बी बाहर निकाली। उसे खोलते ही उसमें से सोने की एक बेहद नज़ाकत भरी ब्रेसलेट चमक उठी।
निहारिका ने हैरानी से उसे देखा, "यह...?"
मलय ने निहारिका की कलाई के पास ब्रेसलेट लाते हुए कहा, "नीचे सगाई में अंगूठी तो सब पहनाएंगे, दुनिया के लिए। पर यह मेरी तरफ से एक छोटा-सा वादा है। बस कुछ ही देर में, पूरी दुनिया के सामने तुम मेरी हो जाओगी... और मैं इस पल का सालों से इंतज़ार कर रहा था।"
मलय के शब्दों में इतनी मिठास और सचाई थी कि निहारिका की आँखें नम हो गईं। उसने धीरे से अपनी कलाई आगे बढ़ा दी और मलय ने नज़ाकत से ब्रेसलेट पहना दिया।
तभी नीचे हॉल से किसी की ज़ोरदार आवाज़ गूँजी—"अरे भाई! दूल्हे और दुल्हन को बुलाओ, सगाई का मुहूर्त निकल रहा है!"
दोनों के चेहरे पर एक शर्मीली सी मुस्कान आ गई। मलय ने थोड़ा हटते हुए कहा, "चलिए, अब नीचे चलते हैं।"
बैंक्वेट हॉल रोशनी और संगीत से नहाया हुआ था। मलय पहले से ही स्टेज पर खड़ा, दिल की बढ़ी हुई धड़कनों के साथ सीढ़ियों की तरफ देख रहा था।
तभी बैकग्राउंड में धीमा शहनाई संगीत गूँज उठा और निहारिका ने अपनी सहेलियों के साथ हॉल में कदम रखा। पर्पल लहंगे में उसके सजधज कर आते ही मलय की नज़रें उस पर टिक गईं। शर्माती हुई निहारिका जब स्टेज पर पहुँची, तो दोनों ने एक-दूसरे को देख एक हल्की-सी मुस्कान दी।
पंडित जी के इशारे पर सबसे पहले मलय ने निहारिका की उंगली में सगाई की अंगूठी पहनाई। फिर निहारिका ने झिझकते हुए मलय की उंगली में अंगूठी पहना दी।
जैसे ही दोनों की सगाई पूरी हुई, पूरे बैंक्वेट हॉल में ज़ोरदार तालियों की गूँज गूँज उठी। फूलों की पंखुड़ियों की बारिश के बीच दोनों परिवारों के चेहरे खुशी से खिल उठे।
सबकी खुशियों की गूँज और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच, मलय ने निहारिका की उंगलियों में अपनी उंगलियाँ फंसाकर उसका हाथ थोड़ा और कसकर थाम लिया। उस एक अहसास में शब्दों से परे सुकून था। इतने दुखों, गलतफहमियों और अंतहीन दूरियों की आंधियों को सहने के बाद, आज यह पल किसी मखमली धूप की तरह एक बेहद खूबसूरत शुरुआत बनकर आया था।
वे दोनों इस कड़वी सच्चाई से अच्छी तरह वाकिफ थे कि निहारिका की पढ़ाई और आने वाले कुछ साल उनके बीच फिर से मीलों के फासले ला देंगे। पर इस बार दूरियों का डर उनके चेहरों पर नहीं था। अतीत के ज़ख्म अब भर चुके थे, उनका दिल एक-दूसरे के विश्वास से जुड़ चुका था और आँखों में एक-दूसरे के लिए बेइंतहा मोहब्बत थी। मलय की आँखों में देखा तो निहारिका को लगा जैसे जिंदगी भर की सारी थकावट एक पल में मिट गई हो। दोनों अच्छी तरह जानते थे कि राहें कितनी भी लंबी क्यों न हों, जब दिल जुड़े हों तो दूरियाँ सिर्फ एक पैमाना बनकर रह जाती हैं। वे एक मुस्कुराती हुई उम्मीद के साथ इस नए सफर में एक-दूसरे का हाथ थामकर कदम रखने के लिए पूरी तरह तैयार थे...
चौदहवां भाग समाप्त, कहानी जारी है ....