Love Life - 6 in Hindi Love Stories by shimbha Verma books and stories PDF | Love Life - 6

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Love Life - 6


सुबह के करीब 6 बजे थे।

खिड़की से आती हल्की धूप म्याओ के चेहरे पर पड़ रही थी। रात की थकान के बावजूद उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी।

वो गहरी नींद में थी।

अचानक उसने नींद में ही करवट बदली और धीमे से बोली—

"जैन..."

फिर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

उसने जैसे सपने में जैन का हाथ पकड़ रखा हो।

"मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ..."

तभी अचानक उसकी आँख खुल गई।

म्याओ कुछ सेकंड तक छत को देखती रही। फिर उठकर बैठ गई।

उसने आसपास देखा।

वो अपने कमरे में थी।

ना ऑफिस था।

ना बारिश।

ना वो कार।

और सबसे बड़ी बात...

जैन उसके सामने नहीं थी।

म्याओ ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छुपा लिया।

"ओह... तो ये सब सपना था?"

उसे कल रात का सपना एक-एक करके याद आने लगा।

ऑफिस में जैन के साथ बैठना।

उसका हाथ पकड़ना।

उसे अपने प्यार का इजहार करना।

और फिर कार में जैन का उसे "हाँ" कहना।

म्याओ के चेहरे पर फिर मुस्कान आ गई।

लेकिन अगले ही पल वो गंभीर हो गई।

"मैंने सपने में भी जैन को ही देखा..."

उसने तकिए के पास रखा अपना फोन उठाया।

स्क्रीन पर जैन का नाम दिखाई दे रहा था।

म्याओ कुछ सेकंड तक उसे देखती रही, फिर कॉल करने लगी।

फोन की घंटी गई।

एक बार...

दो बार...

तीन बार...

फिर कॉल उठ गई।

"हेलो?"

जैन की नींद भरी आवाज सुनते ही म्याओ के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

"तुम सो रही थी?"

जैन ने जम्हाई लेते हुए कहा—

"हाँ... अभी तो सुबह हुई है। इतनी सुबह फोन क्यों किया?"

म्याओ कुछ बोल नहीं पाई।

उसके दिमाग में अभी भी वही सपना घूम रहा था।

"कुछ नहीं... बस तुम्हारी आवाज सुनने का मन था।"

दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

फिर जैन हँस पड़ी।

"आज सुबह-सुबह क्या हो गया तुम्हें?"

म्याओ ने तुरंत बात बदल दी।

"कुछ नहीं। ऑफिस में मिलते हैं।"

"ठीक है।"

कॉल कट गई।

म्याओ ने फोन नीचे रखा और मुस्कुराते हुए खुद से कहा—

"सपना था... लेकिन कितना अच्छा सपना था।"

उसे क्या पता था कि आने वाले दिनों में उसकी जिंदगी किसी सपने से कहीं ज्यादा उलझने वाली थी।

दोपहर के करीब ऑफिस में लगभग सभी लोग आ चुके थे।

जैन अपनी सीट पर बैठकर फाइल देख रही थी।

तभी ऑफिस के मुख्य दरवाजे से एक लड़का अंदर आया।

करीब 25-26 साल का।

सफेद शर्ट, ब्लैक जींस और कंधे पर बैग।

उसके चेहरे पर हमेशा रहने वाली शरारती मुस्कान थी।

वो सीधे रिसेप्शन पर गया और बोला—

"Excuse me, जैन शर्मा किस तरफ बैठती हैं?"

रिसेप्शनिस्ट ने सामने की तरफ इशारा किया।

"वहाँ।"

लड़के की नजर जैसे ही जैन पर पड़ी, उसके चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई।

वो सीधे जैन के पास पहुंचा।

जैन ने जैसे ही उसे देखा, वो अपनी कुर्सी से खड़ी हो गई।

"अरे! आरव?"

आरव ने मुस्कुराकर कहा—

"मैडम, पहचान लिया मुझे?"

जैन खुशी से उसकी तरफ बढ़ी और बोली—

"तुम यहाँ अचानक?"

आरव हँसते हुए बोला—

"Surprise! मुझे तुम्हारी कंपनी में काम मिल गया है।"

जैन की खुशी का ठिकाना नहीं था।

"सच में?"

"हाँ। आज से मैं इसी प्रोजेक्ट टीम का हिस्सा हूँ।"

जैन ने खुशी से उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

"Welcome to the team, Mr. Best Friend."

आरव ने उसका हाथ पकड़कर कहा—

"Best friend नहीं... बचपन से तुम्हारा permanent headache हूँ।"

दोनों हँस पड़े।

दूर से म्याओ ये सब देख रही थी।

उसके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन उसकी नजर बार-बार आरव और जैन पर जा रही थी।

कुछ देर बाद म्याओ जैन के पास आई।

"कौन है?"

जैन ने तुरंत कहा—

"ओह, म्याओ! मिलो, ये आरव है। मेरा सबसे अच्छा दोस्त। हम दोनों स्कूल टाइम से एक-दूसरे को जानते हैं।"

आरव ने म्याओ की तरफ हाथ बढ़ाया।

"Hi, I'm Aarav."

म्याओ ने हाथ मिलाया।

"Hi."

लेकिन उसकी आवाज में पहले वाली गर्मजोशी नहीं थी।

आरव ने मुस्कुराकर जैन से कहा—

"वैसे तुम बिल्कुल नहीं बदली। आज भी वैसे ही परेशान रहती हो जैसे स्कूल में रहती थी।"

जैन हँसने लगी।

म्याओ चुपचाप दोनों को देखती रही।

कुछ देर बाद जैन ने आरव को अपनी टीम और प्रोजेक्ट के बारे में समझाना शुरू कर दिया।

आरव बीच-बीच में मजाक करता और जैन हँसती रहती।

म्याओ अपनी सीट पर वापस आ गई।

उसने लैपटॉप खोल लिया, लेकिन उसका ध्यान स्क्रीन पर नहीं था।

उसके दिमाग में सिर्फ एक सवाल था—

"ये आरव जैन के लिए इतना खास क्यों है?"

तभी उसके अंदर से एक और आवाज आई—

"तुम्हें इससे क्या फर्क पड़ता है? जैन तो सिर्फ तुम्हारी दोस्त है।"

म्याओ कुछ सेकंड चुप रही।

फिर उसने खुद से कहा—

"हाँ... सिर्फ दोस्त।"

लेकिन दिल इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं था।

शाम को ऑफिस खत्म होने वाला था।

आरव ने जैन से कहा—

"चल, आज बाहर कुछ खाते हैं। इतने साल बाद मिला हूँ, कम से कम कॉफी तो बनती है।"

जैन ने कहा—

"हाँ, क्यों नहीं।"

म्याओ ने ये बात सुन ली।

वो अपनी सीट से उठी और दोनों के पास आ गई।

"जैन, तुम मेरे साथ चल रही थी ना?"

जैन ने थोड़ी उलझन में पूछा—

"मैंने ऐसा कब कहा?"

म्याओ एक पल के लिए चुप हो गई।

फिर बोली—

"मेरा मतलब... मुझे तुमसे प्रोजेक्ट के बारे में कुछ बात करनी थी।"

आरव ने मुस्कुराते हुए कहा—

"कोई बात नहीं। तुम दोनों पहले काम कर लो। मैं बाहर इंतजार कर लूँगा।"

म्याओ ने आरव की तरफ देखा।

उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसके अंदर हल्की सी जलन हो रही थी।

वो खुद से सवाल करने लगी—

"क्या मुझे जैन से प्यार हो गया है?"

उसी समय जैन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"चलो, पहले प्रोजेक्ट देखते हैं।"

म्याओ ने उसकी तरफ देखा।

एक पल के लिए उसे सुबह वाला सपना याद आया।

कार...

बारिश...

जैन का हाथ...

और वो "हाँ"।

लेकिन इस बार म्याओ ने सपना नहीं देखा था।

इस बार उसके सामने हकीकत थी।

और हकीकत में जैन के साथ कोई और था।

आरव।

म्याओ ने मन ही मन कहा—

"अगर ये सिर्फ दोस्त है... तो फिर मुझे इतना बुरा क्यों लग रहा है?"

दूसरी तरफ आरव दूर खड़ा दोनों को देख रहा था।

उसके चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

उसने बहुत धीमे से कहा—

"जैन... शायद तुम्हें अभी तक पता ही नहीं कि मैं तुम्हारे लिए क्या महसूस करता हूँ।"

और यहीं से कहानी में एक नया मोड़ शुरू हो गया।

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