Shakti ke Shiv - 26 in Hindi Women Focused by sheetal books and stories PDF | Shakti ke Shiv - 26

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Shakti ke Shiv - 26

शिवाय अभी भी शक्ति के पास बैठा था।

दोनों के बीच कुछ देर तक खामोशी रही।

शक्ति की आँखों के सामने बार-बार उसी लड़की का चेहरा घूम रहा था।

फिर उसने धीरे से कहा—

"मेरे पास सिर्फ़ दो दिन हैं।"

शिवाय ने उसकी तरफ देखा।

"और तुम इन दो दिनों में उसे ढूँढ़ निकालोगी?"

शक्ति की आँखों में वही दृढ़ता लौट आई।

"ढूँढ़ूँगी नहीं..."

वह कुछ पल रुकी।

"उसे ढूँढ़कर रहूँगी।"

शिवाय हल्का-सा मुस्कुराया।

"तो फिर शुरुआत कहाँ से होगी?"

शक्ति ने अपनी जेब से वही छोटा Nokia फोन निकाला।

"यहीं से।"

उसने फोन को देखते हुए कहा—

"रणविजय ने खुद मुझे call किया है। इसका मतलब उसे लगता है कि वो मुझसे एक कदम आगे है।"

शिवाय ने पूछा—

"और अगर वो जानबूझकर तुम्हें गलत direction दे रहा हो?"

शक्ति ने उसकी तरफ देखा।

"तो हम उसकी दी हुई direction पर नहीं चलेंगे।"

शिवाय ने सिर हिलाया।

"मतलब?"

"मतलब अगले दो दिन हम उसके हर पुराने connection, उसके आदमियों और उसके network को खंगालेंगे।"

शक्ति उठ खड़ी हुई।

"मुझे यकीन है कि कहीं न कहीं वो कोई गलती जरूर करेगा।"

शिवाय भी उसके साथ उठ गया।

"और अगर उसने कोई गलती नहीं की?"

शक्ति के चेहरे पर हल्की-सी रहस्यमयी मुस्कान आई।

"तो हम उसे गलती करने पर मजबूर करेंगे।"

दोनों वहाँ से आगे बढ़ने लगे।

उन्हें अभी नहीं पता था कि आने वाले दो दिन सिर्फ़ रणविजय को ढूँढ़ने के नहीं... बल्कि उसके पूरे network को समझने के दिन होने वाले थे।

और शिवरात्रि की रात तक...

या तो रणविजय शक्ति के सामने होगा, या फिर उसके पीछे छुपा कोई और बड़ा चेहरा सामने आ चुका होगा।

अगले दो दिनों तक शक्ति ने रणविजय को ढूँढ़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

वह बनारस की हर गली और मोहल्ले में जाकर उसके बारे में जानकारी जुटाती रही। उसके पुराने contacts, उसके आदमियों से जुड़े नाम और संभावित ठिकाने—शक्ति ने हर छोटी जानकारी को नोट किया।

लेकिन रणविजय का कोई सुराग नहीं मिला।

अगली शाम...

शक्ति और शिवाय एक मशहूर होटल में बैठे बनारस की गरमा-गरम कचौड़ियाँ खा रहे थे।

शिवाय ने शक्ति की तरफ देखते हुए पूछा—

"दो दिन हो गए... कुछ पता चला?"

शक्ति ने कचौड़ी का टुकड़ा तोड़ते हुए सिर हिलाया।

"नहीं। उसके बारे में जितना पता चल रहा है, उतना ही लग रहा है कि उसने अपने सारे रास्ते बंद कर रखे हैं।"

शिवाय ने कुछ सोचते हुए कहा—

"तो अब क्या?"

शक्ति ने उसकी तरफ देखा।

"अब हम उसे ढूँढ़ने की बजाय... उसे बाहर आने पर मजबूर करेंगे।"

शक्ति ने कुछ देर चुप रहने के बाद शिवाय की तरफ देखा।

"शिवाय... आप अपने भाई-बहनों को बनारस से दूर भेज दीजिए।"

शिवाय ने उसकी तरफ देखा।

"क्यों?"

शक्ति की आवाज़ गंभीर थी।

"मैं नहीं चाहती कि मेरे case में शामिल होने की वजह से आपके परिवार पर कोई attack हो। रणविजय का network कितना बड़ा है, हम अभी नहीं जानते। मैं कोई risk नहीं लेना चाहती।"

शिवाय ने शांत स्वर में कहा—

"Don't worry... आज सुबह ही मैंने उन्हें राजस्थान वापस भेज दिया है।"

शक्ति ने राहत की साँस ली।

"अच्छा किया।"

शिवाय ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

"तुम्हें मेरे परिवार की इतनी चिंता कब से होने लगी?"

शक्ति ने उसे घूरकर देखा।

"मुझे किसी की चिंता नहीं है। बस अपने case की वजह से किसी innocent को नुकसान नहीं होना चाहिए।"

शिवाय मुस्कुरा दिया।

"ठीक है, मैडम। जैसा आप कहें।"

शिवाय ने गंभीर आवाज़ में पूछा—

"कोई plan है?"

शक्ति ने कचौड़ी का एक और टुकड़ा उठाया।

"है... लेकिन पहले मुझे कुछ चीज़ें confirm करनी होंगी।"

शिवाय ने सिर हिलाया।

"ठीक है। फिर आज रात बैठकर पूरा plan बनाते हैं।"

शक्ति ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

"Done."

अगली सुबह...

शहर से काफी दूर एक बंद पड़ी factory में सन्नाटा पसरा हुआ था।

जंग लगे shutter, टूटी खिड़कियाँ और चारों तरफ फैली वीरानी के बीच कुछ हथियारबंद आदमी खड़े थे।

तभी factory के अंदर कदमों की आवाज़ गूँजी।

करीब पच्चीस-छब्बीस साल का एक युवक अंदर आया।

उसने तीन-piece suit पहन रखा था। चेहरे पर अजीब-सा आत्मविश्वास था और चाल में ऐसा रौब, जैसे वहाँ मौजूद हर आदमी उससे नीचे हो।

वह बिना किसी से कुछ पूछे आगे बढ़ा और एक कुर्सी पर जाकर बैठ गया।

तभी एक आदमी तेजी से उसके पास आया।

"Sir..."

उस युवक ने उसकी तरफ देखा।

"क्या हुआ?"

आदमी ने घबराते हुए कहा—

"हमने पंद्रह लड़कियों को कल शाम ही आपके order पर भेज दिया था... लेकिन अभी तक उनकी कोई खबर नहीं आई।"

युवक के चेहरे का आत्मविश्वास एक पल के लिए गायब हो गया।

"ऐसे कैसे हो सकता है?"

वह कुर्सी से थोड़ा आगे झुक गया।

"अब तक तो उन्हें अपने रास्ते पर काफी आगे पहुँच जाना चाहिए था।"

आदमी चुप रहा।

युवक कुछ पल सोचता रहा, फिर अचानक उसकी नज़र उस आदमी पर टिक गई।

"पैसे हमारे account में आए या नहीं?"

"नहीं, sir। अभी तक नहीं। उनका phone आया था। उन्होंने कहा है कि जब तक पूरी पंद्रह लड़कियाँ उनके पास नहीं पहुँचतीं, payment नहीं करेंगे।"

युवक के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई देने लगी।

उसने अपनी मुट्ठी भींच ली।

"तो फिर..."

वह अचानक खड़ा हो गया।

"पता करो आखिर हमारा transport गया कहाँ!"

उसकी आवाज़ पूरी factory में गूँज गई।

"मुझे हर हाल में पता चाहिए कि रास्ते में क्या हुआ है।"

वह कुछ पल चुप रहा।

फिर धीमी आवाज़ में बोला—

"अगर ये लड़कियाँ वहाँ नहीं पहुँचीं... तो इसका मतलब रास्ते में किसी ने हमारा खेल बिगाड़ा है।"

उसकी आँखों में अब डर साफ दिखाई दे रहा था।

उसे पहली बार शक हुआ था कि शायद कोई उनके network के पीछे पहुँच चुका था।

उसी समय...

उस बंद पड़ी factory के बाहर अचानक कई गाड़ियों के रुकने की आवाज़ सुनाई दी।

अंदर खड़े लोगों की बातचीत एकदम रुक गई।

एक आदमी ने घबराकर खिड़की से बाहर देखा।

"Sir... बाहर पुलिस की गाड़ियाँ हैं।"

तीन-piece suit पहने युवक का चेहरा उतर गया।

"क्या?"

वह तेजी से उठकर बाहर की तरफ देखने लगा।

Factory के बाहर पुलिस की कई गाड़ियाँ खड़ी थीं।

Constables ने पूरे इलाके को चारों तरफ से घेर लिया था।

तभी सबसे आगे वाली गाड़ी का दरवाज़ा खुला।

शक्ति बाहर उतरी।

उसने चारों तरफ एक नज़र डाली।

उसके पीछे ACP विक्रम, अलिशा और बाकी पुलिस टीम उतर गई।

शक्ति ने अपनी नज़र factory के बंद पड़े gate पर टिकाई।

"सारी exits cover हैं?"

विक्रम ने तुरंत जवाब दिया—

"Yes, ma'am. कोई भी बाहर नहीं निकल सकता।"

शक्ति ने अपनी टीम की तरफ देखा।

"अंदर जो भी है... कोई भागना नहीं चाहिए।"

"जी मैडम।"

शक्ति आगे बढ़ी।

उसके कदमों की आवाज़ factory के सुनसान परिसर में साफ सुनाई दे रही थी।

अंदर खड़े हथियारबंद लोग घबरा गए।

एक ने अपनी gun कसकर पकड़ ली।

"Sir, पुलिस को हमारे बारे में कैसे पता चला?"

वो युवक कुछ बोल पाता, उससे पहले बाहर से शक्ति की आवाज़ गूँजी—

"दरवाज़ा खोल दो..."

कुछ पल खामोशी रही।

फिर शक्ति ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—

"वरना मुझे अंदर आने का दूसरा रास्ता ढूँढ़ना पड़ेगा।"

अंदर खड़े लोगों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

युवक ने घबराकर कहा—

"कोई पीछे का रास्ता देखो!"

लेकिन तभी पीछे से एक constable की आवाज़ आई—

"मैडम, back exit भी secure है।"

शक्ति ने अपनी घड़ी पर एक नज़र डाली।

फिर सामने देखते हुए बोली—

"अब फैसला तुम्हारा है... दरवाज़ा खुद खोलोगे या पुलिस इसे खोलेगी।"

Factory के अंदर सन्नाटा छा गया।

और पहली बार...

उस confident युवक के चेहरे पर डर साफ दिखाई दिया।

जैसे ही factory का दरवाज़ा खुला, पुलिस की टीम ने अंदर कदम रखा।

अचानक—

धाँय!

एक गोली पुलिस टीम के पास की दीवार से जा टकराई।

"सब नीचे!"

विक्रम की आवाज़ गूँज उठी।

अगले ही पल factory के अंदर अफरा-तफरी मच गई।

हथियारबंद लोगों ने पुलिस पर firing शुरू कर दी।

शक्ति तुरंत एक मजबूत pillar की आड़ में हो गई और अपनी gun निकाल ली।

"Team! Cover लो!"

पुलिस वालों ने जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी।

तभी एक गोली शक्ति की दिशा में आई।

शक्ति कुछ समझ पाती, उससे पहले शिवाय ने उसका हाथ पकड़कर उसे अपनी तरफ खींच लिया।

गोली उनके पीछे की दीवार में जा लगी।

शक्ति ने हैरानी से शिवाय की तरफ देखा।

"तुम..."

"बाद में। अभी ध्यान दो।"

शिवाय ने उसे छोड़ दिया और तुरंत दूसरी तरफ देखने लगा।

शक्ति ने एक पल उसे देखा, फिर उसके चेहरे पर हल्की-सी सख्ती आई।

"मेरी protection की जरूरत नहीं है।"

शिवाय ने बिना उसकी तरफ देखे कहा—

"मुझे पता है। फिर भी करूँगा।"

उधर दो आदमी पीछे के रास्ते की तरफ भागने लगे।

"विक्रम! पीछे वाले रास्ते को cover करो!"

"जी मैडम!"

विक्रम और दो constables उनकी तरफ बढ़ गए।

शक्ति ने सामने खड़े एक हथियारबंद आदमी को देखा।

वह तेजी से आगे बढ़ी और उसकी gun पर निशाना साधकर उसे हथियार नीचे रखने को मजबूर कर दिया।

दूसरा आदमी उसकी तरफ बढ़ा, लेकिन शिवाय ने बीच में आकर उसे रोक दिया।

कुछ ही पलों में पुलिस ने कई लोगों को काबू में कर लिया।

लेकिन factory के अंदर मौजूद वह तीन-piece suit वाला युवक मौका देखकर पीछे हट रहा था।

शक्ति की नज़र अचानक उस पर पड़ी।

"तुम!"

युवक पलटा और भागने लगा।

शक्ति उसके पीछे दौड़ पड़ी।

शिवाय ने भी बिना एक पल गंवाए उसका पीछा किया।

वह युवक factory के पीछे बने संकरे रास्ते में तेजी से भाग रहा था।

पीछे से शक्ति की आवाज़ गूँजी—

"रणविजय!"

युवक के कदम एक पल के लिए रुक गए।

उसने पीछे मुड़कर देखा।

शक्ति अपनी gun लिए कुछ दूरी पर खड़ी थी।

उसकी नज़र सीधे उसी पर थी।

"भागना बंद करो, रणविजय।"

युवक के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई।

"तो आखिरकार तुमने मुझे ढूँढ़ ही लिया।"

शक्ति धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

"दो दिन से तुम्हें ढूँढ़ रही थी।"

रणविजय पीछे हटते हुए बोला—

"और मैंने सोचा था कि तुम मुझे इतनी जल्दी नहीं ढूँढ़ पाओगी।"

"तुमने मुझे underestimate किया।"

रणविजय हँसा।

"नहीं शक्ति... मैंने तुम्हें समझा है। तभी तो तुम्हें यहाँ तक आने दिया।"

शक्ति की आँखें सिकुड़ गईं।

"क्या मतलब?"

रणविजय ने कुछ नहीं कहा।

वह अचानक दूसरी तरफ मुड़ा और फिर भागने लगा।

शक्ति ने तुरंत उसका पीछा किया।

"रणविजय! रुक!"

लेकिन रणविजय एक मोड़ काटकर अंधेरे में गायब हो गया।

शक्ति वहाँ पहुँचकर रुक गई।

उसने चारों तरफ देखा।

कोई नहीं था।

बस जमीन पर एक चीज़ पड़ी थी।

शक्ति ने नीचे झुककर उसे उठाया।

वह रणविजय की पहचान से जुड़ा एक छोटा-सा कार्ड था।

शक्ति ने उसे देखा और धीमे स्वर में कहा—

"तुम भाग सकते हो, रणविजय... लेकिन अब तुम्हारा नाम मेरे हाथ में है।"

रणविजय आज हाथ से निकल गया था... लेकिन अब शक्ति के पास उसका नाम था। सवाल सिर्फ़ इतना था—अगली बार आमना-सामना किसका होगा, शक्ति का या रणविजय का?

जानने के लिए पढ़ते रहिए— shakti ke shiv....