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किताबों के बीच

किताबों के बीच
by PATEL RJ

बनारस,1952, गंगा के किनारे वाली पुरानी हवेली जैसी लाइब्रेरी। छत तक ऊँची अलमारियाँ, लकड़ी की खुशबू, और पंखे की धीमी चिर-चिर।

रवि वहीं लाइब्रेरी में हिसाब-किताब और किताबें संभालता था। एम.ए. कर रहा था, पर घर की हालत की वजह से नौकरी करनी पड़ती थी। सादा, सफेद कुर्ता और आँखों में किताबों जैसी गहराई।

मीरा उसी शहर के सबसे बड़े ज़मींदार की बेटी थी। अंग्रेजी स्कूल में पढ़ी पर उसे हिंदी साहित्य से प्यार था। हर मंगलवार और शुक्रवार वो पढ़ने आती। हमेशा एक ही कोना, हमेशा एक ही किताब... और बीच-बीच में रवि से एक-दो सवाल।

पहले सिर्फ "ये किताब कहाँ मिलेगी" से शुरू हुआ। फिर "प्रेमचंद आपको ज्यादा पसंद हैं या निर्मल?" तक पहुँचा। फिर चुप हो गए दोनों। क्योंकि बातों के आगे एक लक्ष्मण रेखा थी। मीरा की शादी तय थी और रवि का कोई स्थान नहीं था।

एक दिन बारिश तेज थी। मीरा भीगते हुए आई। रवि ने अपना गमछा आगे बढ़ाया। उसने लिया नहीं। बोला: "भीग जाओगी तो बुखार हो जाएगा।" मीरा हंस कर बोली: "और न भीगूं तो?" उस दिन के बाद दोनों ने 3 हफ्ते तक एक दूसरे से बात नहीं की।

तीन हफ्ते की खामोशी

उस दिन के बाद लाइब्रेरी में वक्त रुक सा गया था। मीरा आती, 4 बजे किताब लेती, सबसे पीछे वाली मेज पर बैठ जाती। रवि बही में सर झुका लेता।

तीसरे हफ्ते मीरा ने "गुनाहों का देवता" मांगी। रवि ने किताब दी। बोला: "इस किताब का अंत अच्छा नहीं है मीरा जी।" मीरा बोली: "मुझे पता है रवि बाबू। इसलिए तो मांग रही हूँ।"

शाम को किताब ठीक करते वक्त उसके बीच से एक कागज निकला। लिखा था: "अगर कहना गुनाह है, तो खामोश रहना भी तो सज़ा है।" रवि ने कागज जेब में रखा, फिर रात को गंगा में बहा दिया। क्योंकि अगले महीने मीरा की शादी थी।

शादी के कार्ड लाइब्रेरी में भी आए। "सभी शुभचिंतकों सहित"।

कार्ड और चाबी

शादी के दिन लाइब्रेरी बंद थी। रवि सीढ़ियों पर चाबी हाथ में लिए बैठा था। ढोल की आवाज गंगा पार तक आ रही थी।

10 साल बाद - 1962, मंगलवार 4 बजे घंटी बजी। रवि के बाल आधे सफेद, आँखों पर चश्मा। सामने मीरा खड़ी थी, साड़ी में, मांग में सिंदूर।

मीरा ने किताब रखी - "गुनाहों का देवता। वापस करने आई थी।" बोली, "लंदन वाले थे, अच्छे थे। दो बच्चे भी हैं। पर ये किताब हर साल पढ़ती थी।"

रवि बोला, "मैं हर मंगलवार और शुक्रवार 4 बजे तक यहीं बैठता था। आदत सी पड़ गई थी।" जाते वक्त मीरा बोली, "गुनाह नहीं किया हमने रवि बाबू, इसलिए शायद देवता कहलाए।"

बाद वाली शाम

मीरा के जाने के बाद लाइब्रेरी में खामोशी रही। रवि ने किताब वापस उसी जगह रख दी।

एक दिन एक छोटी लड़की आई, बोली: "अंकल, मम्मी ने भेजा है।" नाम पूछा तो बोली: "मीरा। और मैं आर्या हूँ।" आँखें बिल्कुल मीरा जैसी।

आर्या हर शनिवार आने लगी। 2 साल बाद गंगा में बाढ़ आई। लाइब्रेरी में पानी भर गया। उस शाम आर्या आखिरी बार आई। बोली: "अंकल, हम दिल्ली शिफ्ट हो रहे हैं।"

रवि ने 5 किताबों का डिब्बा दिया। बोला: "मम्मी से कहना, लाइब्रेरी हमेशा 4 बजे खुलती है।"

उसके बाद लाइब्रेरी में सिर्फ पंखे की आवाज बची। पर रवि अब भी हर मंगलवार और शुक्रवार 4 बजे तक बैठता है।

क्योंकि कुछ प्रेम कहानियां खत्म नहीं होती। बस किताबों के बीच रह जाती हैं।

समाप्त