kagaz ki naav in Hindi Love Stories by PATEL RJ books and stories PDF | कागज़ की नाव

Featured Books
Categories
Share

कागज़ की नाव

कागज़ की नाव

मणिकर्णिका पर मौत कभी छुट्टी नहीं लेती।
लोग कहते हैं यहाँ चिता की आग में भी ठंडक है, क्योंकि यहाँ सबको मुक्ति मिलती है।
वहाँ हवा में राख है, पानी में प्रार्थना है, और हर कोने में एक कहानी जल रही है।

उस घाट के सबसे कोने में शिव बैठता था। उम्र 29, पर आँखें 90 साल की लगती थीं।
सामने टोकरी में सफ़ेद कागज़, हाथ में फेविकोल, और आँखों में एक अजीब सी शांति।
हर कोई अपनों को जलाने आता था, शिव उनकी अधूरी इच्छाओं को जलने से बचाने आता था।
वो कागज़ की नाव बनाता था और गंगा में छोड़ देता था।

लोग आते, अपने मरे हुए पिता, माँ, भाई के नाम का कागज़ उसको देते। उसपे एक अधूरी इच्छा लिखी होती - माँ केदार जाना चाहती थी, बाबा को एक बार समुंदर देखना था।
शिव उस कागज़ की नाव बनाता और गंगा में छोड़ देता।

एक शाम एक लड़की आई - अन्या।
हाथ में एक ही गीला कागज़, जैसे बहुत देर तक मुट्ठी में पकड़ा हो।
चेहरे पर थकान, काँपते हुए अक्षरों में लिखा था - "मैं जीना चाहती हूँ।"

शिव ने उस कागज़ को देखा। पहली बार किसी ज़िंदा इंसान की इच्छा उसके हाथ में आई थी।
उसने कहा - "ये घाट मरने वालों का है। जीने की नाव यहाँ नहीं बनती। मणिकर्णिका पर लोग मुक्ति माँगते हैं, ज़िंदगी नहीं।"
अन्या बोली - तो ज़िंदगी कहाँ मिलती है?

वो आँखें मौत से नहीं डरी हुई थीं, वो तो ज़िंदगी से नाराज़ थीं, कि उसने इतनी जल्दी जाने को क्यों कहा।

शिव बोला, अस्सी पर, कल सुबह 4 बजे आना।

अगले दिन से रोज़ अस्सी पर एक नई नाव बनती। सुबह 4 बजे, जब पूरा बनारस सो रहा होता, अस्सी पर सिर्फ दो लोग होते - एक जो मौत से भाग कर आया था, और एक जो ज़िंदगी से भाग रहा था।

अन्या अपनी छोटी इच्छाएँ लिखती थी जो सबके लिए नॉर्मल थीं, पर उसके लिए बहुत बड़ी।
एक दिन अन्या लिखती - आज बिना डर चाय पीनी है।
कभी लिखती - आज घाट पर ज़ोर से हँसना है।
कभी - आज किसी अनजान को थैंक यू बोलना है।

तुम इन मरे हुए लोगों की इच्छाओं को इतने प्यार से क्यों बनाते हो?
शिव कहता - क्योंकि ज़िंदा लोग अपनी इच्छाओं को हल्के में ले लेते हैं। मरने के बाद ही समझ आता है कि जीना कितना कीमती था।

एक दिन अन्या ने पूछा - तुमने कभी अपने लिए नाव क्यों नहीं बनाई?
शिव ने रेत पर लकीर खींच कर बोला - अपनी इच्छा लिखोगे तो उम्मीद बन जाएगी और उम्मीद चिता से भी ज़्यादा जलाती है।
अन्या हँसी - पर उम्मीद ही तो एक ऐसी चीज़ है जो जल के भी बुझती नहीं, वो तो राख से भी उग आती है।

धीरे-धीरे अन्या की लिस्ट खत्म होने लगी, पर उसकी साँसें और भारी होने लगीं। डॉक्टर ने ऑपरेशन की डेट दे दी थी।
आखिरी दिन से एक दिन पहले वो 9 कागज़ लेके आई। शिव ने 9 नावें बनाईं, पर 10वीं नाव सबसे भारी थी।
उसपे लिखा था - किसी को इतना प्यार करना कि मरने से डर लगे।

शिव का दिल बैठ गया। उसने 4 साल में हज़ार नावें बनाई थीं, पर ऐसी इच्छा पहली बार देखी थी।

अगले दिन अन्या नहीं आई। अगले दिन भी नहीं, तीसरे दिन शिव की टोकरी खाली रह गई।
चौथे दिन अस्सी के चाय वाले ने बोला - वो BHU वाली लड़की कल रात से एडमिट है। दिल वाला वार्ड।
शिव दौड़ा। ज़िंदगी में पहली बार मणिकर्णिका से भागा।
BHU के बेड नंबर 14 पर अन्या थी।

अन्या बोली - अब तक मरने से डरती थी, अब तुम्हें छोड़ के जाने से डर लग रहा है। ये डर प्यार है ना?
पहले डरती थी कि ज़िंदगी छीन जाएगी, अब डर लगता है कि तुम कहीं छोड़ ना जाओ।

शिव ने जेब से एक नया कागज़ निकाला, उसपे लिखा 11वीं इच्छा - शिव के साथ अस्सी पर एक और चाय पीनी है।

ऑपरेशन 8 घंटे का था।
8 घंटे शिव ने BHU के बाहर, गंगा किनारे क्या किया, कोई नहीं जानता। उसने 108 नावें बनाईं। हर एक पे एक ही लाइन - अन्या को जीना है।
कहते हैं उस दिन अस्सी पर गंगा का पानी सफ़ेद हो गया था कागज़ से।

8 घंटे बाद डॉक्टर बाहर आया - बच गई। चमत्कार है।

10 दिन बाद अन्या को केबिन में बुलाया गया। डॉक्टर ने फाइल देखी और बोला तुम्हारा दिल एकदम ठीक है। तुम 100 साल जिओगी।
अन्या खुश होने की जगह सुन्न हो गई।

उसने सोचा - अगर मैंने शिव को बोला कि मैं ठीक हूँ, वो क्यों आएगा? वो तो मेरी बीमारी की नावें बनाता था।
उसने शिव को सच नहीं बताया। एक महीना, दो महीना, एक साल नाटक किया - आज भी चक्कर आया, दवा ले रही हूँ।

अन्या BHU में प्रोफेसर बन गई। अब वो अस्सी पर 4 बजे नहीं, 6 बजे आती। कभी-कभी कहती, क्लास थी।
शिव को लगने लगा शायद अब उसकी ज़रूरत नहीं है।

एक दिन अन्या 3 दिन नहीं आई। शिव से रहा नहीं गया। वो BHU गया।
खिड़की से देखा - अन्या माइक पर 200 बच्चों को पढ़ा रही है। सफ़ेद कुर्ती में, इतनी खूबसूरत कि शिव पहचान ही नहीं पाया।

लेक्चर के बाद अन्या ने उसे बाहर देखा और गुस्से में बोली - यहाँ क्यों आते? सब देख रहे हैं। अब मुझे नाव की ज़रूरत नहीं, मैं ठीक हूँ।

शिव ने जेब से वही पहला गीला कागज़ निकाला, जो उसने एक साल से ताबीज़ की तरह संभाल के रखा था - "मैं जीना चाहती हूँ।"
बोला - इसका क्या करूँ?
अन्या ने छीन के फाड़ दिया - फाड़ दो, अब ज़रूरत नहीं।

शिव रात भर अस्सी पर बैठा रहा। पहली बार अपने लिए नाव बनाई - "मैं अकेला नहीं रहना चाहता" और वो नाव डूब गई, क्योंकि सच भारी होता है।

जूठे नाम की नाव तो बह जाती है, पर साची अक्सर डूब जाती है, क्योंकि गंगा भी सच का बोझ नहीं उठा पाती।

अगली सुबह 4 बजे, अन्या उसकी झोपड़ी पर आई, हाथ में नई टोकरी, पर इस बार कागज़ सफ़ेद नहीं, नीले थे। उसमें एक ही कागज़ था।

मैं अन्या, झूठ बोलती थी। मुझे कोई बीमारी नहीं थी। पर मैंने बताया नहीं क्योंकि लगा तुम चले जाओगे। तुम मेरी बीमारी से प्यार करते हो, मुझसे नहीं। माफ़ कर दोगे तो आखिरी इच्छा - मैं अन्या, शिव के साथ बूढ़ी होना चाहती हूँ। ये इच्छा मरने वाले की नहीं, जीने वाले की है।

शिव ने वो कागज़ नाव नहीं बनाया। उसने उसको अलमारी में रख दिया, जहाँ उसके पिताजी का होली वाला कागज़ रखा था।
बोला - कुछ कागज़ नाव नहीं बनते, कुछ घर बनते हैं। कुछ कागज़ गंगा में नहीं बहाते, वो अलमारी में रखे जाते हैं, क्योंकि कुछ इच्छाएँ मुक्ति नहीं माँगतीं, वो तो ज़िंदगी भर साथ रहने का वादा माँगती हैं।

फिर दोनों ने मिलके मणिकर्णिका पर एक लकड़ी का बोर्ड लगाया - यहाँ अधूरी इच्छा लिखो, नाव हम बनाएंगे।
पहले दिन 10 कागज़ आए, दूसरे दिन 100, तीसरे दिन 1000।

शिव-अन्या ने पूरी रात 1000 नावें बनाईं, सुबह 4 बजे अस्सी से मणिकर्णिका तक पूरी गंगा सफ़ेद हो गई।
2 घंटे तक किसी की चिता नहीं जली, सब घाट पर खड़े होके नावें देख रहे थे। सबसे आगे दो नावें एक धागे से बंधी हुई थीं।

मैं जीना चाहती हूँ - अन्या
मैं उसके साथ जीना चाहता हूँ - शिव

कहते हैं वो दो नावें आज भी सुबह 4 बजे अस्सी पर दिखती हैं, कभी डूबती नहीं।
क्योंकि कुछ इच्छाएँ मुक्ति से बड़ी होती हैं। कुछ कागज़ की नावें गंगा में नहीं बहतीं, घर बन जाती हैं।

_ समाप्त _
PATEL RJ.