Paths - 26 in Hindi Classic Stories by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 26

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राहें - 26

कर्ज
रमन आज फिर खाली हाथ घर आकर बैठ गये-
पत्नी शीला ने पूछा- कंगन लाये?
रमन ने कहा आज भी उसने कंगन नही दिये ।
शीला बोली- क्यों क्या कहता है अशोक सेठ?
वहीं पुरानी बात कि आप रूपये छोड़ दो मैं तीन दिन बाद
आपको कंगन दे दूँगा।
मैं बिना कंगन लिये रूपये उसके पास कैसे छोड़ दूँ, मैने उनको
कहा कि आप पहले कगंन दो मैं ब्याज सहित पूरे पैसे दे देता हूँ और
वह हर बार वही कहता है- पहले पैसे दो तो दो तीन दिन में कगंन
दे दूँगा-
पत्नी शीला ने कहा- उसकी नीयत ठीक नहीं लगती है - पैसा
लेकर कहीं कगंन नही दिये तो और भी फॅस जायेंगे।
रमन ने कहा- मुझे भी कुछ गड़बड़ लग रहा है कई बार उससे
कह चुका हूँ, कगंन दे दो परन्तु वह हर बार टाल देता है, कगंन भी
नही मिलते और धीरे धीरे पैसे भी खर्च हो जायेंगे जैसे तैसे तो पैसे
का प्रबन्ध किया है, इस तरह ब्याज भी बढ़ता जा रहा है कहकर
गहरी स्वांस लेकर रमन चिंता मग्न हो गये।
पिछले वर्ष रमन को बैंक का लोन पटाने के लिये पैसों की
सख्त जरूरत थी तो उन्होंने पत्नी के पॉच तोले के कंगन अशोक के
पास गिरवी रखकर उससे डेढ़ लाख रूपये लिये थे अशोक ने उनसे
कहा था कि 1 प्रतिशत ब्याज पर वह उसे रूपये दे देगा, अशोक की
मीठी मीठी बातों में आकर उन्होने उससे 1 प्रतिशत ब्याज पर डेढ़
लाख रूपये लिये थे। रमन अब पैसा देकर अपनी पत्नी के कगंन
वापस मॉगते हैं तो अशोक उन्हें पैसे छोड़कर जाने के लिये कह देता
है कई महीने इसी तरह चक्कर लगाते लगाते हो गये और ब्याज
प्रतिमाह बढ़ता जा रहा है।
1 प्रतिशत ब्याज पर कहीं पैसा मिल नहीं रहा था अशोक ने
उन्हें 1 प्रतिशत ब्याज पर पैसा देने की बात कही, तो रमन ने सस्ती
ब्याज दर के लालच में अशोक से डेढ लाख रूपये लेकर बैंक का
लोन पटा दिया, नहीं तो बैंक उसका घर कुर्क कर लेती। छोटी पूंजी
वाला रमन फलों की दुकान चलाता है, जैसे तैसे करके उसने पैसे की
व्यवस्था की थी परन्तु अशोक उसे कंगन ना देकर पैसे छोड़कर जाने
के लिये कहता था तो रमन को उसकी नीयत में कुछ गड़बड़ लगी
उसने- सोचा कि यदि मैं पैसे छोड़ दूंगा तो वह पैसा भी विवाद में
पड़ सकता है। कगंन तो मिल नहीं रहे है और पैसा भी फंस गया
तो वे कहीं के नहीं रहेंगें।
रमन परेशान रहने लगे, आजकल सोना बहुत महंगा है उन्हें
पैसे की जरूरत थी उनके पास डेढ़ लाख रूपये के लिये कोई और
हल्का सोने का आभूषण नहीं था, इसलिये पत्नी के पॉँच तोले के
कंगन अशोक के पास रख दिये, सोचा था जैसे ही पैसा होगा मैं
कंगन छुड़ा लूंगा परन्तु अशोक की नीयत ठीक नहीं लग रही हैं वह
कंगन हड़प लेना चाहता हैं, इसलिये कंगन वापस नहीं कर रहा है
मन ही मन रमन चितित रहने लगे। सस्ती ब्याज दर के चक्कर में
वे अशोक के चक्कर में फंस गये उनकी समझ में कुछ भी नहीं आ
रहा था किे क्या किया जाये और कैसे कंगन वापस मिलें?
एक दिन रमन अपने परिचित सेठ जिससे वे अपना लेन देन
करते थे, सोने चॉदी के व्यवसायी गिरीश सोनी की दुकान पर गये,
उनसे उन्होने सब बातें कहीं तो सोनी जी ने कहा- कि अशोक ने
तो धमतरी के व्यवसायी के यहाँ कंगन गिरवी रखकर दो लाख रूपये
उठाये हैं, वह धमतरी वाला व्यवसायी मेरा रिश्तेदार है। वह मुझसे
कह रहा था कि अशोक ना तो कंगन उठाता है और ना ब्याज देता
है। कहीं वे कंगन तुम्हारे तो नहीं?
रमन बोले- भैया, बिना देखे मैं कैसे बता सकता हूँ, यदि धमतरी
वाले व्यवसायी अमरचंद जी आपके रिश्तेदार हैं , तो एक बार मुझे वे
कंगन दिखला दे तो मैं देखकर कुछ समझ सकूँ।
गिरीश ने कहा- एक दो दिन में वे यहाँ आने वाले हैं, मैं उनसे
कहुँगा कि वे कंगन यहाँ लेते आये।
गिरीश सोनी बोले- आप सीधे आदमी है अशोक बहुत चालू
आदमी हैं । आपको सस्ते ब्याज दर में फंसाकर उसने गड़बड़ किया
होगा कहीं पर भी 1 प्रतिशत ब्याज दर नही चलती है। मैं फोन पर
धमतरी बात कर लेता हूँ।
दो तीन दिन बाद धमतरी वाले व्यवसायी अमरचंद गिरीश सोनी
के घर आये और गिरीश ने रमन को बुलाकर कंगन दिखाये तो
रमन अपने कंगन पहचान गये, कगंन रमन के ही थे। व्यवसायी ने
कहा कि कगंनो पर मैने दो लाख रूपये 2 प्रतिशत ब्याज पर दिये
हैं मेरे खाते में लिखा हुआ है आप देख सकते हैं, उन्होनें अपना खाता
भी दिखाया और पैसा प्राप्ति के लिये अशोक के हस्ताक्षर भी
दिखाये।
गिरीश सोनी ने अशोक को बुलाया परन्तु अशोक नहीं आया,
धमतरी के व्यवसायी अमरचंद जी ने उसे बुलाया है फिर भी अशोक
नहीं आया।
अशोक के ना आने के कारण बात अटकने लगी, अशोक ने
कगन को अमरचंद के पास रखकर 2 लाख रूपये 2 प्रतिशत ब्याज
पर उठाये थे रमन को डेढ़ लाख रूपये 1 प्रतिशत ब्याज पर दिये
थे। अमरचंद जी कहने लगे मैने तो दो लाख लिये हैं तो दो लाख
लूंगा और 2 प्रतिशत ब्याज भी लूंगा। रमन कुछ समझ नहीं पा रहे
थे कहाँ से इतने पैसे लायें, अपने ही कगंनों के लिये वे चक्कर काट
रहे थे। गिरीश सोनी ने उन्हें बहुत समझाया कि कंगन किसी भी
तरह से उठा लो, नहीं तो ज्यादा देर करोगे तो ब्याज बहुत बढ़
जायेगा, सोने का रेट भी बहुत बड़ता जा रहा है। इसलिये कंगन के
उठा लेने पर भी तुम घाटे में नहीं रहोगे।
रमन का कहना था- भाई, मुझसे अशोक से 1 प्रतिशत व्याज
की बात हुयी थी यह तो 2 प्रतिशत बोल रहे हैं।
गिरीश ने अमरचंद से बात की - कि रमन भले आदमी हैं।
अशोक के चक्कर में फंसकर रह गये हैं , आप ही इनकी कुछ मदद
करो ।
अमरचंद का कहना हुआ भैया मैं तो आपको जानता हूँ या
अशोक को, रमन को तो मैं जानता ही नहीं, आपके कहने पर विश्वास
करके मैं इन्हें कंगन कैसे दे दूँ? अशोक आ भी नहीं रहा है मैं आपकी
बात का सम्मान करते हुये कंगन रमन को देने के लिये तैयार हूँ,
परन्तु वह मेरा पूरा पैसा दे दे।
गिरीश ने कहा - भैया रमन साधारण आदमी हैं, इनका ब्याज
कुछ कम कर दें ताकि इन्हें भी ज्यादा असुविधा ना हो।
बहुत बातचीत व समझाने पर अमरचंद जी ने डेढ़ प्रतिशत
व्याज पर सहमति दी।
डेढ़ प्रतिशत ब्याज और दो लाख रूपये अमरचंद को दें कर
रमन ने अपने कंगन उठाये ।
धोखा देने के कारण अशोक की बाज़ार में शाख कम होती गई वो कई और लोगों को धोखा दे चुका था।
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                          छत्तीसगढ़ रत्न डॉ. शिरोमणि माथुर 
                          दल्ली राजहरा
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