जीवन नश्वर है,हमारी चेतना प्राणमय प्रकृति है , जो सब में एक ही है। और वह ही हमारे जीवन की कुंजी है, और केंद्र है।
पर हम बहारी विषयों में जीवन की प्राथमिकता को महत्व दे कर अपने मस्तिष्क को धारणाओं और प्रतिक्रियाओं के आधार पर अहम का निर्माण करते है।
जो समाज या सामाजिक अलगाव को केंद्र बनाता है। हम बहारी स्वरूपों में सत्य को ढूंढते है , और लोगो के बहारी व्यहवार को ही उनका मूल समझते है। इसी लिए समाज की दुश्वारियों को हम अपना लेते है।
इस एक केंद्र की मृत्यु ही नव जीवन का आरंभ है। और यह पूरी तरह से हमारे जीवन को नया आयाम दे सकता है, जब तक हम एक आंतरिक चेतना को नहीं चुनेंगे या किसी भी तरह से कोई कहानी,प्रश्न ,गुरु ,या रूपक के इशारे से उस पर बोधात्मक चिंतन नहीं करेंगे और उसे अपना चरित्र नहीं बनाएंगे तब तक हम उलझे रहेंगे।
वह सारे व्यक्ति जिन्हें हम महात्मा कहते है वह और कुछ नहीं करते , पहले अपने आंतरिक अलगाव पर प्रश्न कर चोट करते है बाद में दूसरों के लिए भी वही करते है।
वह भी वही लोग है जो खुद की लाइन बड़ी कर के दूसरों की लाइन बड़ी करते है, इसी लिए उन सभी में एक ही चैतन्य दिखाई पड़ता है।
समाज उनको तकलीफें देता है परन्तु उन के अंदर वह अलगाव का केंद्र ही नहीं है जो उन तकलीफों पर प्रतिक्रिया करे। चाहे बुद्ध को मिली गाली हो, महावीर को मिले काटे हो,महम्मद को मिला कचरा हो।
जीजस इसी एक अलगाव के केंद्र को पाप कहते है और वह कहते है कि जो खुद उलझा हुआ है उसको दूसरे व्यक्ति का न्याय करने का हक नहीं। गुरजिएफ इसे पारस्परिता का सिद्धांत कहते है।
वह लोग स्वयं ही अपने जीवन से प्रेरणा ,नैतिकता, जागृति और नेतृत्व के गुणों को स्वयं जी जाते है। वह मुश्किल परिस्थितियों को भी अपने सहज बोध के अनुसार जी कर एक उद्धरण बनते है। वह इसी लिए महात्मा है।
लोगो के लिए वह उद्धरण है, पर उनके लिए वह बिल्कुल सहज कार्य है।
कुदरती तौर पर उनके और सामान्य मनुष्य के बीच में कोई अंतर नहीं है।
इस उलझन को बलवान करती है इस अलगाव के केंद्र की परिधि में बनी हुई अवचेतन मान्यताएं और शिक्षाएं साथ ही साथ एक निश्चित लक्ष्य का अभाव। क्योंकि, जिन के पास कला है, विज्ञान है, या कुछ भी ऐसा करने को है जिससे जन सामान्य की सहायता हो सकती है या उनकी अपनी लाइन बड़ी हो सकती है, तो वह लोग न किसी दूसरे को पूछने जाते है, न किसी के प्रतिभावों की चिंता करते है, वह अपने में निखार लाते है और दूसरों को उस निखार का फल सहज रूप से मिल जाता है।क्योंकि उनको पता है कि समय और अवकाश पर सहज और सामाजिक दोनों केंद्रों का प्रभाव अलग अलग होता है, जितना वह सहज केंद्र में जाएंगे उतना वह प्रसन्न रह कर, परिणाम स्वरूप दुनिया को रोशन करेंगे। और दुनिया अगर उन्हें बुरे अनुभव भी देंगी तो इसको भी वह आराम से जी पाएंगे, जो भी दुनिया के लिए प्रेरणा बनेगी । वह अपने जीवन की दुखद और नीरस घटनाओं को भी किसी तरह का बोझ समझे बिना स्वीकार करते है । और अपने सहज केंद्र में स्थित रहते है। इनके कर्म, और कथन दोनों में अस्तित्व की सहज एकता होती है। ऐसे लोग अपनी विफलता की तकलीफों को स्वयं पी कर सफलता के रस को सहज बाट देते है।
इस सहज केंद्र तक पहुंचने का कोई निश्चित मार्ग नहीं है। या कोई निश्चित आयु एवं कोई विधि भी नहीं है। जिस दिन और क्षण वह सहज केंद्र उपलब्ध हो गया वहीं मोक्ष या मुक्ति का क्षण है।
किसी ने प्रश्न के द्वारा ,किसी ने कहानी के द्वारा, किसी ने गुरु कृपा के द्वारा, किसी ने किसी का भी अनुकरण किए बिना अलग मार्ग बनाकर, कोई निरंतर अभ्यास, प्रयोग ,अंत:प्रेरणा और आत्म विश्लेषण के द्वारा यह केंद्र पर जा सकता है, कोई सेवा द्वारा, कोई राजनीति द्वारा, कोई अपनी मानसिक धारणा को तोड़ कर, कोई मंत्र या ध्यान के द्वारा, कोई यातना और पीड़ा से गुजर कर इसमें स्थित हो सकता है। कोई आदतो को छोड़ कर, कोई साहित्य,कला और भाषा के द्वारा भी इस सहजता को जान सकता है।
मार्ग अलग अलग है पर सभी की चोट केवल अलगाव के केंद्र पर है। और एक ही कार्य है, प्रसन्नता पूर्वक खुद की लाइन को बड़ा करने में और खुद की सेवा करने में लगे रहे ,जिससे दूसरे भी उसी मार्ग पर चले।