Adhuri Kitaab - 2 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 67

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 67

एपिसोड 67— कबीर कौन है?

 
कमरे में अचानक ऐसी खामोशी छा गई, जैसे पूरी दुनिया ने अपनी साँस रोक ली हो।
 
सफेद गलियारे के बीचों-बीच कबीर खड़ा था।
 
उसके सामने उसकी माँ थी।
 
और माँ की आँखों में डर था।
 
ऐसा डर, जिसे अनन्या ने पहले कभी नहीं देखा था।
 
कबीर ने धीरे से अपनी निगाहें उठाईं।
 
“बहुत देर हो गई, माँ।”
 
उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था।
 
बल्कि एक अजीब-सी थकान थी।
 
अनन्या ने एक कदम आगे बढ़ाया।
 
“कबीर... तुमने अभी क्या कहा?”
 
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
 
कुछ सेकंड तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
 
फिर कबीर मुस्कुराया।
 
“तुम्हें सच में कुछ याद नहीं?”
 
अनन्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।
 
“क्या याद नहीं?”
 
कबीर ने अपनी जेब से एक छोटी-सी काली चाबी निकाली।
 
वही चाबी...
 
जो अनन्या ने कई साल पहले अपने बचपन की एक तस्वीर में देखी थी।
 
उसके हाथ काँप गए।
 
“ये... तुम्हारे पास कैसे आई?”
 
कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
 
उसने चाबी अपनी हथेली पर रखी और धीरे से कहा—
 
“क्योंकि ये चाबी तुम्हारी माँ की नहीं थी।”
 
नैना तुरंत आगे आई।
 
“तो किसकी थी?”
 
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
 
“तुम्हारी।”
 
नैना के चेहरे का रंग उड़ गया।
 
“मेरी?”
 
“हाँ।”
 
अर्णव ने कबीर का हाथ पकड़ लिया।
 
“खेल बंद करो। हमें सब कुछ जानना है।”
 
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
 
“सब कुछ?”
 
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
 
“अगर तुम्हें सच में सब कुछ पता चल गया... तो शायद तुम लोग यहाँ से वापस ही न जा पाओ।”
 
अर्णव ने उसका हाथ छोड़ दिया।
 
“हमें डराने की कोशिश मत करो।”
 
“मैं डराने की कोशिश नहीं कर रहा।”
 
कबीर की आवाज़ अचानक गंभीर हो गई।
 
“मैं तुम्हें बचाने की आखिरी कोशिश कर रहा हूँ।”
 
अनन्या ने माँ की तरफ देखा।
 
“माँ... कबीर कौन है?”
 
माँ चुप रही।
 
“माँ!”
 
इस बार अनन्या की आवाज़ में गुस्सा था।
 
“आपने हमें इतने सालों तक झूठ क्यों बताया?”
 
माँ की आँखों में आँसू आ गए।
 
“क्योंकि अगर मैंने सच बता दिया होता... तो कहानीकार तुम्हें कभी नहीं छोड़ता।”
 
अनन्या का दिल जैसे रुक गया।
 
“कहानीकार... कबीर है?”
 
माँ ने सिर झुका लिया।
 
कमरे में मौजूद हर व्यक्ति कबीर की तरफ देखने लगा।
 
लेकिन कबीर ने इस बार कुछ नहीं कहा।
 
नैना ने धीरे से पूछा—
 
“क्या ये सच है?”
 
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
 
“नहीं।”
 
सबके चेहरों पर राहत की हल्की-सी झलक आई।
 
लेकिन अगला वाक्य सुनते ही वह राहत गायब हो गई।
 
“क्योंकि कहानीकार मैं नहीं हूँ।”
 
अनन्या ने तुरंत पूछा—
 
“तो कौन है?”
 
कबीर ने सफेद गलियारे की आखिरी दीवार की तरफ देखा।
 
वहाँ एक नया दरवाज़ा बन चुका था।
 
दरवाज़े पर कोई नाम नहीं लिखा था।
 
सिर्फ एक निशान था।
 
एक अधूरी स्याही की बूंद।
 
कबीर धीरे-धीरे उस दरवाज़े की तरफ बढ़ा।
 
“वह यहाँ है।”
 
अर्णव ने पूछा—
 
“कौन?”
 
कबीर रुक गया।
 
“जिससे तुम लोग इतने समय से लड़ रहे हो।”
 
अनन्या ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
 
“भक्षक?”
 
कबीर ने सिर हिलाया।
 
“नहीं।”
 
“लेखक?”
 
“नहीं।”
 
“तो फिर...?”
 
कबीर ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
 
“कहानीकार।”
 
अचानक पूरा गलियारा काँप उठा।
 
दीवारों पर बने दरवाज़े एक-एक करके खुलने लगे।
 
कहीं से बच्चों के रोने की आवाज़ आने लगी।
 
कहीं किसी बूढ़े आदमी की हँसी सुनाई दी।
 
और फिर...
 
एक आवाज़ पूरे गलियारे में गूँज उठी।
 
“कबीर...”
 
कबीर की आँखें बंद हो गईं।
 
उसने धीरे से कहा—
 
“मैंने कहा था ना... बहुत देर हो गई।”
 
आवाज़ फिर आई।
 
“तुमने मुझे बहुत इंतजार करवाया।”
 
अनन्या ने चारों तरफ देखा।
 
“ये आवाज़ कहाँ से आ रही है?”
 
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
 
“हर जगह से।”
 
“क्या मतलब?”
 
“कहानीकार किसी एक जगह नहीं रहता।”
 
कबीर ने अपनी हथेली में पकड़ी चाबी को कसकर पकड़ लिया।
 
“वह हर कहानी के उस हिस्से में रहता है जिसे कोई पढ़ना नहीं चाहता।”
 
अचानक पीछे से एक दरवाज़ा जोर से बंद हुआ।
 
नैना चीख पड़ी।
 
“अर्णव!”
 
अर्णव ने उसे अपनी तरफ खींच लिया।
 
उसी पल सफेद दीवार पर काले अक्षर उभरने लगे।
 
“तीन बच्चे पैदा हुए थे।”
 
अनन्या की साँस अटक गई।
 
फिर दूसरा वाक्य लिखा गया—
 
“एक को कहानी से मिटा दिया गया।”
 
अर्णव की आँखें फैल गईं।
 
तीसरा वाक्य—
 
“दूसरी को नाम दे दिया गया।”
 
नैना पीछे हट गई।
 
और फिर आखिरी वाक्य लिखा गया—
 
“तीसरे को कहानीकार बना दिया गया।”
 
कमरे में सन्नाटा छा गया।
 
अनन्या ने काँपती आवाज़ में पूछा—
 
“तीसरा... कौन था?”
 
माँ ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
 
अर्णव ने धीरे से कहा—
 
“हम तीन थे।”
 
नैना ने उसकी तरफ देखा।
 
“लेकिन कबीर...?”
 
अर्णव भी चुप हो गया।
 
अनन्या ने कबीर की तरफ देखा।
 
“क्या तुम... हमारे भाई हो?”
 
कबीर की आँखों में पहली बार दर्द दिखाई दिया।
 
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
 
माँ अचानक आगे आई।
 
“नहीं!”
 
सब चौंक गए।
 
माँ कबीर के सामने खड़ी हो गई।
 
“कबीर तुम्हारा भाई नहीं है।”
 
अनन्या ने पूछा—
 
“तो फिर कौन है?”
 
माँ ने कबीर की तरफ देखा।
 
“कबीर... वह नाम है जो मैंने उसे दिया था।”
 
“और उसका असली नाम?”
 
माँ की आँखों से आँसू गिरने लगे।
 
“उसका कोई नाम नहीं था।”
 
नैना ने हैरानी से पूछा—
 
“जिसका नाम नहीं था... वो कौन होता है?”
 
माँ ने धीरे से कहा—
 
“एक पात्र।”
 
कबीर ने आँखें बंद कर लीं।
 
“बस, माँ।”
 
माँ ने उसकी तरफ देखा।
 
“अब और नहीं।”
 
कबीर ने सिर हिलाया।
 
“नहीं। अब सबको जानना होगा।”
 
वह अनन्या के पास आया।
 
“मैं तुम्हारा भाई नहीं हूँ।”
 
फिर उसने नैना की तरफ देखा।
 
“मैं तुम्हारा भाई नहीं हूँ।”
 
अर्णव की तरफ देखकर बोला—
 
“और मैं तुम्हारी कहानी का हिस्सा भी नहीं हूँ।”
 
अर्णव ने गुस्से से पूछा—
 
“तो फिर तुम हो कौन?”
 
कबीर ने पहली बार अपनी चाबी जमीन पर रख दी।
 
और कहा—
 
“मैं वह हूँ जिसे कहानीकार ने खुद अपनी कहानी में लिखा था।”
 
अनन्या ने पूछा—
 
“क्यों?”
 
कबीर की आँखों में अजीब-सी चमक आई।
 
“तुम लोगों को ढूँढने के लिए।”
 
अचानक दीवार पर एक और वाक्य उभरा—
 
“कबीर को भेजा गया था अनन्या को वापस लाने के लिए।”
 
अनन्या पीछे हट गई।
 
“मुझे... वापस?”
 
कबीर ने धीरे से कहा—
 
“हाँ।”
 
“कहाँ?”
 
कबीर ने उसकी आँखों में देखा।
 
“जहाँ तुम वास्तव में पैदा हुई थीं।”
 
अनन्या की धड़कन तेज हो गई।
 
“मैं तो यहीं पैदा हुई थी।”
 
कबीर ने सिर हिलाया।
 
“नहीं।”
 
उसने अपनी उँगली से हवा में एक गोला बनाया।
 
उस गोले के अंदर अचानक एक दृश्य दिखाई देने लगा।
 
एक कमरा।
 
पुरानी लकड़ी की मेज।
 
कागज़ों का ढेर।
 
और एक महिला...
 
अनन्या की माँ।
 
वह मेज पर बैठी कुछ लिख रही थी।
 
उसकी गोद में एक बच्ची थी।
 
बच्ची रो रही थी।
 
माँ ने उसे उठाकर कहा—
 
“आर्या... मेरी बच्ची।”
 
अनन्या की आँखों में आँसू आ गए।
 
“ये तो मेरा बचपन है।”
 
कबीर ने कहा—
 
“नहीं।”
 
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
 
“तो फिर?”
 
दृश्य बदल गया।
 
उसी कमरे में एक दूसरी बच्ची दिखाई दी।
 
फिर तीसरी।
 
तीनों बच्चियाँ एक जैसी थीं।
 
माँ तीनों को देखकर रो रही थी।
 
“तीन?”
 
अर्णव की आवाज़ काँप गई।
 
माँ ने धीरे से कहा—
 
“हाँ।”
 
नैना ने सिर पकड़ लिया।
 
“हम... तीन बहनें थीं?”
 
माँ ने सिर हिलाया।
 
“नहीं।”
 
वह रोते हुए बोली—
 
“तुम तीनों एक ही कहानी के तीन अलग-अलग रूप थे।”
 
अनन्या समझ नहीं पाई।
 
“इसका मतलब?”
 
कबीर ने जवाब दिया—
 
“तुम तीन शरीर नहीं थीं।”
 
उसने अनन्या की तरफ देखा।
 
“तुम एक ही आत्मा के तीन हिस्से थीं।”
 
कमरे की हवा जैसे जम गई।
 
नैना ने फुसफुसाकर पूछा—
 
“तो हम... कौन हैं?”
 
कबीर ने कहा—
 
“अनन्या—याद।”
 
“नैना—चुनाव।”
 
फिर उसने अर्णव की तरफ देखा।
 
“और अर्णव—अंत।”
 
अर्णव का चेहरा सफेद पड़ गया।
 
“अंत?”
 
कबीर ने सिर हिलाया।
 
“तुम्हें इसलिए कहानी से हटाया गया था।”
 
अनन्या ने धीरे से पूछा—
 
“और मैं?”
 
कबीर उसके बिल्कुल सामने आकर खड़ा हो गया।
 
“तुम्हें इसलिए बचाया गया था क्योंकि कहानीकार तुम्हारे अंदर अपनी सबसे बड़ी गलती छिपाकर बैठा था।”
 
“कौन-सी गलती?”
 
कबीर ने जवाब देने के लिए मुँह खोला।
 
लेकिन उससे पहले...
 
पूरा कमरा काली स्याही से भर गया।
 
माँ अचानक चीख उठी।
 
“नहीं!”
 
काली स्याही के बीच एक आकृति बनने लगी।
 
लंबा शरीर।
 
सफेद चेहरा।
 
और आँखों की जगह खाली काले गड्ढे।
 
भक्षक?
 
नहीं।
 
यह उससे भी ज्यादा भयानक था।
 
उसने मुस्कुराकर कहा—
 
“बहुत अच्छी कहानी है।”
 
कबीर ने तुरंत अनन्या के सामने आकर उसे पीछे कर दिया।
 
“तुम यहाँ नहीं आ सकते।”
 
वह आकृति हँसी।
 
“कबीर... तुम अभी भी यही सोचते हो कि तुम मुझे रोक सकते हो?”
 
कबीर की मुट्ठियाँ भींच गईं।
 
“मैं अकेला नहीं हूँ।”
 
उसने पीछे देखा।
 
अनन्या।
 
नैना।
 
अर्णव।
 
तीनों उसके पीछे खड़े थे।
 
अचानक अनन्या के हाथ में “अधूरी किताब” आ गई।
 
उसका पन्ना अपने आप खुला।
 
एक नया वाक्य लिखा जा रहा था—
 
“कहानीकार ने अपना नाम लिख दिया।”
 
अनन्या ने घबराकर पन्ना देखा।
 
नीचे सिर्फ एक शब्द धीरे-धीरे उभर रहा था—
 
कबीर।
 
अनन्या ने कबीर की तरफ देखा।
 
कबीर का चेहरा बदल चुका था।
 
उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
 
“मैंने तुमसे कहा था...”
 
उसकी आँखों से एक आँसू गिरा।
 
“मैं कहानीकार नहीं हूँ।”
 
वह आँसू जमीन पर गिरते ही काली स्याही में बदल गया।
 
और किताब के अगले पन्ने पर एक नया नाम उभर आया—
 
“कहानीकार: अनन्या।”
 
अनन्या के हाथ से किताब छूट गई।
 
और उसी पल...
 
कबीर गायब हो गया।
 
क्रमशः...