Namumkin Ishq in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | नामुमकिन इश्क - एपिसोड 48

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नामुमकिन इश्क - एपिसोड 48

एपिसोड 48 — अपना ही कोई दुश्मन

वशिष्ठ हवेली के पुराने मंदिर में उस वक्त ऐसी खामोशी थी कि अर्जुन को अपनी धड़कनों की आवाज तक सुनाई दे रही थी।

उसके हाथ में वह पुरानी तस्वीर थी।

तस्वीर में एक छोटी-सी आयत थी... और उसके पीछे खड़ा एक आदमी।

वही आदमी, जिसे अर्जुन बचपन से अपने परिवार के बेहद करीब देखता आया था।

रघुवीर चाचा।

वशिष्ठ परिवार के पुराने और सबसे भरोसेमंद आदमी।

पिछले पच्चीस सालों से वह इस परिवार के साथ था। घर का हर राज़ उसके सामने खुलता था। अर्जुन के दादा उस पर इतना भरोसा करते थे कि कई बार परिवार के सदस्यों से ज्यादा उससे सलाह लिया करते थे।

लेकिन आज...

अर्जुन के हाथ में मौजूद तस्वीर ने उस भरोसे की नींव हिला दी थी।

आयत ने अर्जुन के चेहरे की तरफ देखा।

"आप इन्हें जानते हैं?"

अर्जुन ने तस्वीर से नजरें नहीं हटाईं।

"हाँ।"

"कौन हैं?"

अर्जुन ने कुछ सेकंड बाद जवाब दिया,

"रघुवीर चाचा।"

आयत हैरान हो गई।

"आपके परिवार के?"

"हाँ।"

"तो फिर वो मेरे पापा के साथ...?"

अर्जुन ने उसकी बात पूरी की।

"मुझे नहीं पता।"

आयत ने धीरे से पूछा,

"क्या आपको उन पर शक है?"

अर्जुन ने पहली बार उसकी तरफ देखा।

"शक करना आसान है, आयत। किसी को दोषी साबित करना मुश्किल।"

"लेकिन तस्वीर..."

"तस्वीर सिर्फ इतना साबित करती है कि वो पंद्रह साल पहले तुम्हारे साथ थे। इससे ज्यादा कुछ नहीं।"

आयत ने सिर हिलाया।

लेकिन उसके चेहरे पर बेचैनी साफ थी।

तभी अर्जुन ने तस्वीर पलटी।

पीछे कुछ लिखा हुआ था।

उसने मोबाइल की रोशनी तस्वीर के पीछे डाली।

वहाँ सिर्फ एक तारीख थी—

17 अगस्त।

और उसके नीचे तीन अक्षर।

A-27.

अर्जुन की भौंहें सिकुड़ गईं।

"फिर वही A-27..."

आयत ने पूछा,

"इसका मतलब क्या है?"

अर्जुन ने कहा,

"अभी नहीं पता।"

फिर उसने फोल्डर को बंद कर दिया।

"ये फाइल अभी किसी को नहीं दिखेगी।"

आयत ने पूछा,

"क्यों?"

"क्योंकि हमें नहीं पता कि हमारे बीच कौन सच में भरोसे के लायक है।"

आयत ने कुछ पल अर्जुन को देखा।

फिर धीरे से बोली,

"लेकिन मैं आप पर भरोसा करती हूँ।"

अर्जुन की आँखें उसकी आँखों से मिलीं।

"और मैं तुम्हारा भरोसा कभी नहीं तोड़ूँगा।"

दोनों के बीच कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

आयत ने नजरें झुका लीं।

लेकिन उसके चेहरे पर पहली बार डर से ज्यादा भरोसा था।

हवेली में वापसी

दोनों मंदिर से बाहर निकले।

रात काफी हो चुकी थी।

हवेली लगभग सो चुकी थी।

अर्जुन ने फोल्डर अपनी जैकेट के अंदर छिपा लिया।

लेकिन जैसे ही वह कमरे की तरफ जाने लगा, सामने से रघुवीर चाचा आते दिखाई दिए।

"अर्जुन बाबू?"

अर्जुन रुक गया।

"जी, चाचा?"

रघुवीर ने आयत की तरफ देखा।

"आप दोनों इतनी रात को यहाँ?"

अर्जुन ने सामान्य आवाज में कहा,

"बस ऐसे ही मंदिर तक गए थे।"

रघुवीर मुस्कुराए।

"इतनी रात को मंदिर?"

"मन किया तो चले गए।"

रघुवीर ने कुछ नहीं कहा।

लेकिन उनकी नजर कुछ सेकंड के लिए अर्जुन की जैकेट पर गई।

फिर उन्होंने आयत की तरफ देखा।

"आप ठीक हैं, बिटिया?"

आयत ने सिर हिलाया।

"जी।"

"अच्छा। देर हो गई है। आप आराम कर लीजिए।"

रघुवीर वहाँ से चले गए।

अर्जुन उन्हें जाते हुए देखता रहा।

आयत ने धीमे से पूछा,

"क्या हुआ?"

अर्जुन ने कहा,

"कुछ नहीं।"

लेकिन उसके मन में एक सवाल उठ चुका था—

क्या रघुवीर चाचा को पता चल गया है कि हमें फाइल मिल चुकी है?

अगले दिन अस्पताल

सुबह हॉस्पिटल में फिर वही भागदौड़ शुरू हो गई।

दसों स्टूडेंट्स अपनी-अपनी ड्यूटी में लग चुके थे।

अर्जुन ने आज जानबूझकर आयत को अपने पास रखा था।

वह किसी भी कीमत पर उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहता था।

रोहन भी आज कुछ ज्यादा शांत था।

समर ने कई बार उससे बात करने की कोशिश की, लेकिन रोहन जैसे किसी और दुनिया में था।

कल रात उसे जो तस्वीर मिली थी, वह बार-बार उसके दिमाग में घूम रही थी।

अर्जुन को सब पता है।

क्या सच में?

या कोई उसे अर्जुन के खिलाफ भड़का रहा था?

रोहन खुद भी तय नहीं कर पा रहा था।

तभी करण उसके पास आया।

"क्या हुआ?"

रोहन ने उसकी तरफ देखा।

"कुछ नहीं।"

"तू आज बहुत शांत है।"

"सोचा था कभी-कभी चुप रहना भी सीख लूँ।"

करण हँस पड़ा।

"तू और चुप? ये तो बहुत बड़ी खबर है।"

रोहन ने कोई जवाब नहीं दिया।

तभी सामने से सनाया आई।

उसने करण को देखा और बोली,

"आप यहाँ भी?"

करण ने मुस्कुराकर कहा,

"क्यों? हॉस्पिटल तुम्हारे नाम है?"

"नहीं।"

"तो फिर मैं कहीं भी रह सकता हूँ।"

सनाया ने आँखें घुमाईं।

"आपसे बहस करना बेकार है।"

"फिर भी रोज करती हो।"

सनाया कुछ कहती, उससे पहले नर्स ने उसे बुला लिया।

"सनाया मैडम, डॉक्टर बुला रहे हैं।"

वह चली गई।

करण उसे जाते हुए देखता रहा।

रोहन ने यह सब देखा।

"तू उसे पसंद करता है?"

करण चौंका।

"क्या?"

"सनाया।"

करण ने हँसते हुए कहा,

"पागल है क्या?"

"तेरी आँखें कुछ और कहती हैं।"

करण ने कोई जवाब नहीं दिया।

आयत को मिली नई जानकारी

दोपहर के समय आयत रिकॉर्ड रूम में कुछ फाइलें ढूँढ रही थी।

उसे अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड देखने की जिम्मेदारी मिली थी।

वह एक शेल्फ से दूसरी शेल्फ तक फाइलें देख रही थी।

तभी एक पुरानी फाइल नीचे गिर गई।

आयत ने उसे उठाया।

फाइल पर धूल जमी थी।

उसने नाम पढ़ा—

"A-27 — Medical Records."

आयत का दिल जोर से धड़कने लगा।

"फिर से यही..."

उसने फाइल खोली।

पहले पन्ने पर कुछ मेडिकल रिपोर्ट्स थीं।

दूसरे पन्ने पर कुछ नाम।

तीसरे पन्ने पर...

उसके पिता का नाम।

नासिर खान।

आयत की उंगलियाँ काँपने लगीं।

उसने अगला पन्ना पलटा।

वहाँ लिखा था—

"Patient transferred from Lucknow Private Facility."

आयत की आँखों में आँसू आ गए।

"पापा यहाँ आए थे..."

तभी पीछे से आवाज आई।

"आप यहाँ क्या कर रही हैं?"

आयत पलटी।

रोहन सामने खड़ा था।

आयत ने तुरंत फाइल बंद कर दी।

"कुछ नहीं।"

रोहन ने पूछा,

"वो फाइल किसकी थी?"

"बस पुराने रिकॉर्ड हैं।"

रोहन कुछ सेकंड उसे देखता रहा।

फिर बोला,

"आयत, अगर तुम्हें अपने पिता के बारे में कुछ जानना है तो शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।"

आयत हैरान हुई।

"आप?"

"हाँ।"

"क्यों?"

रोहन के पास इस सवाल का कोई सीधा जवाब नहीं था।

आखिर उसने कहा,

"क्योंकि मेरे पिता भी इस कहानी का हिस्सा हैं।"

आयत की आँखें फैल गईं।

"क्या मतलब?"

रोहन कुछ बोलता, उससे पहले अर्जुन वहाँ आ गया।

"आयत।"

आयत ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

"अर्जुन..."

अर्जुन ने रोहन की तरफ देखा।

"तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"

रोहन ने कहा,

"बस बात कर रहा था।"

"किस बारे में?"

रोहन कुछ सेकंड चुप रहा।

फिर बोला,

"तुम्हें सच जानना है ना, अर्जुन?"

अर्जुन की नजरें उस पर टिक गईं।

"हाँ।"

रोहन ने कहा,

"तो कभी अकेले में बात करना।"

वह वहाँ से चला गया।

अर्जुन ने आयत की तरफ देखा।

"उसने क्या कहा?"

आयत ने फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।

"मुझे ये मिली।"

अर्जुन ने फाइल देखी।

उसका चेहरा गंभीर हो गया।

"इसे अभी किसी को मत दिखाना।"

आयत ने कहा,

"रोहन ने कहा कि उसके पिता भी इस कहानी का हिस्सा हैं।"

अर्जुन कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला,

"शायद अब हमें रोहन से बात करनी चाहिए।"

रोहन का सच

शाम को हॉस्पिटल की छत पर अर्जुन और रोहन आमने-सामने खड़े थे।

कुछ देर दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई।

फिर रोहन ने अपनी जेब से वही फोटो निकाली।

"ये देख।"

अर्जुन ने फोटो ली।

वही तस्वीर।

उसके दादा, आयत के पिता और राघव मेहरा।

अर्जुन की नजरें तस्वीर पर टिक गईं।

"तुम्हें ये कहाँ मिली?"

"मेरे पिता की स्टडी से।"

अर्जुन ने रोहन की तरफ देखा।

"और?"

रोहन ने कहा,

"मुझे लगता है हमारे परिवारों के बीच जो हुआ, उसका सच हम दोनों से छिपाया गया है।"

अर्जुन चुप रहा।

रोहन ने आगे कहा,

"लेकिन मुझे एक और बात पता चली है।"

"क्या?"

रोहन ने सीधे उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

"आयत के पिता की मौत से पहले वो तुम्हारे परिवार के किसी आदमी से मिले थे।"

अर्जुन की आँखें सिकुड़ गईं।

"किससे?"

रोहन ने जवाब दिया—

"रघुवीर से।"

अर्जुन कुछ पल बिल्कुल शांत खड़ा रहा।

उसका शक अब एक नाम पर जाकर टिक चुका था।

उसी वक्त नीचे हॉस्पिटल के गेट के पास एक कार आकर रुकी।

उस कार से रघुवीर चाचा बाहर निकले।

उन्होंने ऊपर छत की तरफ देखा।

और उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

जैसे उन्हें पहले से पता हो...

कि अर्जुन अब किस सच के पीछे जाने वाला है।

उन्होंने जेब से फोन निकाला और एक नंबर मिलाया।

"अर्जुन को सब पता चलने लगा है।"

दूसरी तरफ से आवाज आई—

"तो अब क्या करना है?"

रघुवीर ने कुछ पल सोचा।

फिर शांत आवाज में बोले—

"अब उसे आयत से दूर करना होगा।"

"कैसे?"

रघुवीर की आँखें ठंडी हो गईं।

"ऐसा सबूत बनाओ कि अर्जुन खुद आयत पर शक करने लगे।"

फोन कट गया।

रघुवीर ने आखिरी बार ऊपर देखा।

और मुस्कुराते हुए कहा—

"अब असली खेल शुरू होगा।"

क्रमशः...