पिछले अध्याय में हमने देखा कि जब मैं हार मानने ही वाला था, तभी वह लड़की मुझे दिखाई दी। उसकी एक झलक पाने के लिए मैं दिन भर से दर-दर भटक रहा था, और आख़िरकार वह मुझे मिल ही गई। मेरा दोस्त मेरे साथ ही खड़ा था, लेकिन मैंने उसकी तरफ ध्यान दिए बिना सीधा उस लड़की की ओर दौड़ लगा दी। करीब जाकर देखा तो वह बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी मैंने कल्पना की थी।
मैं उससे बात करना चाहता था, लेकिन मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी। मैं उसके पास जाकर खड़ा हो गया। वह मुझे ऐसे देखने लगी, जैसे कोई किसी चोर या अजनबी को घूरता है। मेरे मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था।
तभी उसने मुझे देखा और बोली, "हाँ, कौन हो भाई? क्या चाहिए तुम्हें?"
उसके बगल में खड़ी उसकी दोस्त ने ताना मारते हुए कहा, "घर बसा नहीं, लुटेरे पहले ही आ गए।"
यह सुनते ही मैं हैरान रह गया। मैंने उसकी दोस्त से पूछा, "आपके कहने का क्या मतलब है?"
उसने तमतमाते हुए जवाब दिया, "खूबसूरत लड़की दिखी नहीं कि फौरन आ गए। अभी कॉलेज शुरू भी नहीं हुआ है और अभी से तुम्हारा यह हाल है, बाद में क्या करोगे? तुम्हारे जैसे लड़के सिर्फ लड़कियों के पीछे पड़ते हैं और उन्हें अपने जाल में फँसाते हैं। हमारे घरवालों ने हमें ऐसे लड़कों के बारे में सब बता रखा है।"
मैं उसे कोई सफाई नहीं देना चाहता था, क्योंकि मुझे पता था कि इससे कोई फायदा नहीं होगा। मैंने उसे नज़रअंदाज़ किया और उस लड़की की तरफ मुड़कर पूछा, "आपका नाम क्या है?"
लड़की ने पहले तो मुझे घूरकर देखा और फिर बोली, "मैं तुम्हें अपना नाम क्यों बताऊँ? कौन हो तुम? क्या हम एक-दूसरे को जानते हैं?"
मैंने कहा, "नहीं, पर मुझे आपका नाम जानना है।"
जब मैंने उसकी दोस्त को नज़रअंदाज़ किया, तो वह चिढ़ते हुए बोली, "चलो यहाँ से, ऐसे बहुत से लड़के हैं इस कॉलेज में।"
वह लड़की मेरी तरफ देख रही थी, लेकिन यह समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या बोलना चाह रही है। मुझे अभी तक उसका नाम पता नहीं चला था और वह बताना भी नहीं चाहती थी। पर अंदर ही अंदर मुझे ऐसा महसूस होने लगा था कि क्या यही ज़िंदगी है? क्या यही वह चीज़ है, जो किसी इंसान को मिल जाए तो उसकी लाइफ बन जाती है?
वह आगे बढ़ गई, लेकिन मैंने पीछे से एक ज़ोरदार आवाज़ देकर उससे सिर्फ एक बात पूछी, "क्या आपने भी यहाँ एडमिशन लिया है?"
उसने मुड़कर देखा तक नहीं और सीधे निकल गई। उसकी दोस्त उसे लगभग खींचते हुए अपने साथ ले गई।
मेरा दोस्त मेरे पास आया और बोला, "क्या इसी लड़की के लिए तू दिन भर से यहाँ-वहाँ भटक रहा था?"
मैंने गहरी साँस लेते हुए कहा, "भाई, मुझे कुछ अलग ही फील हो रहा है।"
वह चिढ़कर बोला, "अबे साले! आते ही इस आशिकी के लफड़े में मत पड़। जो-जो इस लफड़े में पड़ा है ना, वह बहुत बर्बाद हुआ है। यह कॉलेज एक ऐसी जगह है जहाँ लोग इतिहास रचते हैं। यह वो कॉलेज है जहाँ कई लव स्टोरीज़ शुरू होती हैं और अंत तक जाती हैं। पर ऐसे बहुत से आशिक भी हैं, जिन्होंने आशिकी तो कर ली, लेकिन अंत में उन्हें अकेला ही रहना पड़ा।"
मैंने उसे समझाते हुए कहा, "भाई, कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें सिर्फ फील किया जा सकता है, उन्हें शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।"
उसने बात काटते हुए कहा, "बहुत हो गया तेरा, चल अब। शाम हो गई है। उसने तो तुझे ठीक से देखा भी नहीं, ना ही अपना नाम बताया और ना ही यह बताया कि वह इस कॉलेज की स्टूडेंट है या नहीं।"
मैंने हामी भरते हुए कहा, "हाँ यार, यही तो प्रॉब्लम है।"
उसके बाद हम दोनों वापस अपने कमरे में लौट आए।
अगली सुबह मैं जल्दी उठा, अपना नाश्ता किया और फिर से निकल पड़ा। आज से ही हमारा कॉलेज शुरू होने वाला था, लेकिन मेरे ख्यालों में वह लड़की इस कदर छाई हुई थी कि मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। मैं रवि और श्याम के साथ अपनी क्लास में पहुँचा। वहाँ की बड़ी-बड़ी बेंचें और वह आलीशान क्लासरूम—सब कुछ इतना शानदार था कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। हम तीनों एक साथ बैठ गए।
मैं बार-बार बाहर की तरफ देख रहा था, इसी उम्मीद में कि कहीं से वह नज़र आ जाए और मेरा आज का दिन बन जाए। सुबह से ही मैं थोड़ा उदास था, लेकिन दिल के किसी कोने में एक आस थी कि वह आज दिख सकती है।
धीरे-धीरे समय बीतता गया और मैं अपने ही ख्यालों में खो गया। तभी रवि ने मुझे झकझोरते हुए कहा, "अरे वो देख! जिसके पीछे तू कल भाग रहा था, वही लड़की।"
मैं अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आया और हड़बड़ाकर पूछा, "क्या है बे?"
उसने इशारा करते हुए कहा, "वो देख, कल तू जिस लड़की को देख रहा था, वही है। इतनी सुंदर है यार, मैं क्या कहूँ! भाई, तूने तो आते ही पहली ही बार में इतनी सुंदर लड़की को पसंद कर लिया। वो तेरे हाथ नहीं आने वाली।"
मैंने उसकी बात सुनी और बेचैनी से पूछा, "कहाँ है? कहाँ है वो?"
उसने जवाब दिया, "वो देख, सामने।"
तभी प्रोफेसर भी क्लास में आ गए। वे सबको इंट्रोड्यूस कर रहे थे, तभी मुझे उसका नाम पता चला। उसका नाम कोमल था। वह मुझसे कुछ बेंच आगे बैठी थी। शायद उसने मुझे देखा नहीं था, लेकिन मैंने भी सच में यह नहीं सोचा था कि वह लड़की मेरी क्लासमेट निकलेगी।
जब क्लास खत्म हुई, तो मैं उसके पास गया और बोला, "हाय! कल हम मिले थे। तब आपने अपना नाम नहीं बताया था, लेकिन अब मुझे पता चल गया है।"
उसने मुझे देखा और बोली, "तुम पीछा करते-करते यहाँ भी आ गए?"
उसकी वह दोस्त भी हमारी ही क्लास में थी, तो ज़ाहिर सी बात थी कि वह बीच में बोलने लगी, "क्या बात है? तू क्यों हमारे पीछे पड़ा है?"
मैंने शांति से जवाब दिया, "कुछ नहीं, मैं सिर्फ आपका दोस्त बनना चाहता हूँ।"
उसकी दोस्त ने ताना मारा, "सुंदर लड़की दिखी नहीं कि दोस्त बनने आ जाते हो। अभी तक कम से कम दस लड़के हमारे पास आकर जा चुके हैं, और वो भी सिर्फ इस कोमल की वजह से।"
कोमल ने कुछ देर सोचा और फिर पूछा, "तुम्हें दोस्त बनाने में मेरा क्या फायदा है?"
मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "दोस्ती में फायदा और नुकसान कभी नहीं गिना जाता। दोस्ती में कभी नफ़ा-नुकसान होता ही नहीं है। दोस्ती तो बस दोस्ती होती है।"
उसकी दोस्त ने फिर चेतावनी देते हुए कहा, "सच में सिर्फ दोस्त बनना चाहते हो या आगे कुछ और? अगर कुछ और सोचा है, तो अच्छा नहीं होगा।"
कोमल ने अपनी दोस्त को शांत कराते हुए मुझसे कहा, "सोचूँगी... अभी नहीं।"
उस दिन के बाद से उस सिलसिले की शुरुआत हुई, जिसका मुझे आज भी हर दिन पछतावा होता है। मैं अक्सर सोचता हूँ कि अगर उस दिन मैंने यह सब सोचा भी न होता, तो क्या सच में यह सब हो पाता?
प्रिय पाठकों,
उम्मीद है आपको यह कहानी पसंद आ रही होगी। इस खूबसूरत सफर में मेरे साथ जुड़े रहने और आगे के भाग का नोटिफिकेशन सबसे पहले पाने के लिए मुझे अभी Follow ज़रूर करें! साथ ही, कहानी को बिना किसी रुकावट के पढ़ने के लिए इसे Download करना न भूलें। आपका साथ मेरे लिए बहुत मायने रखता है।