शहर का वह सुनसान, वीरान इलाका जहाँ कभी संयोगिता की जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी शुरू हुई थी, आज उसका अंत होने वाला था। बारिश की हल्की बूंदाबांदी हो रही थी, जो खून की गंध को धो नहीं पा रही थी, बस उसे और ज्यादा भयानक बना रही थी।
संयोगिता उस पुरानी गोदाम की इमारत के अंदर दाखिल हुई। उसके कदम भारी थे, लेकिन उसके हाथ में पकड़ी हुई पिस्तौल एकदम स्थिर थी। सामने, एक टूटी कुर्सी पर बैठा वह 'शिकारी' था—वह आदमी जिसने संयोगिता की मासूमियत छीनी थी, जिसने उसे एक मशीन बना दिया था। वह अब भी वहीं था, शायद अपनी जीत का जश्न मना रहा था या अगले शिकार की योजना बना रहा था।
उसे संयोगिता के आने की भनक तक नहीं लगी।
*धड़ाम!*
संयोगिता ने बिना कोई चेतावनी दिए, बिना कोई डायलॉग बोले, ट्रिगर दबा दिया। गोली सीधी उस आदमी के माथे में लगी। उसका सिर पीछे की तरफ झटके से उछला और वह वहीं ढेर हो गया। उसे संभलने का मौका भी नहीं मिला। सालों का बदला एक ही पल में चुकता हो गया।
लेकिन संयोगिता नहीं रुकी। उसके अंदर का राक्षस जाग चुका था। वह दौड़कर उसके पास गई और पिस्तौल फेंक दी। अब उसे हथियार की जरूरत नहीं थी। उसने अपने नंगे हाथों से उस लाश को पकड़ा, जैसे वह अभी भी जीवित हो। उसकी आँखों में कोई चमक नहीं थी, बस एक खालीपन और पागलपन था। वह चीख रही थी, लेकिन आवाज गले में ही घुट रही थी। उसने उस बेजान शरीर को नोचना शुरू कर दिया, जैसे वह अपने अंदर के सारे दर्द, सारे अपमान को उस शरीर पर उतार रही हो।
वह सिसकते हुए चिल्लाई -
मर जा! मर जा तू!
जबकि उसके हाथ खून से लाल हो चुके थे। कुछ ही देर में, वह शिकारी सिर्फ एक खून से लथपथ लाश बनकर रह गया था। संयोगिता के चेहरे, कपड़े, हाथ... सब कुछ लाल रंग से सने हुए थे। वह थक कर वहीं जमीन पर बैठ गई। उसके सांस तेज चल रहे थे। उसके कानों में सिर्फ अपनी ही धड़कनों की आवाज गूंज रही थी।
अब शांति थी। लेकिन यह शांति डरावनी थी। उसने धीरे से अपना सिर उठाया। उसके सामने वही पिस्तौल पड़ी थी जिससे उसने शिकारी को मारा था। उसने उसे उठाया। उसका हाथ कांप रहा था, लेकिन इस बार डर से नहीं, बल्कि राहत से।
उसने फुसफुसाया -
खत्म...सब खत्म।
उसने पिस्तौल की नली अपनी दाहिनी कनपटी पर रख ली। उसकी आँखें बंद थीं। उसे विवान का चेहरा याद आया, विराट की वो आँखें जो उसे बचाने के लिए रो रही थीं। एक पल के लिए उसे लगा कि वह रुक जाए, लेकिन फिर उसे एहसास हुआ कि वह विराट और विवान के लिए एक खतरा है। एक किलर कभी अच्छी माँ या पत्नी नहीं बन सकती। उसने उंगली ट्रिगर पर रखी। दबाव बढ़ाने वाली ही थी...तभी, गोदाम के भारी लोहे के दरवाजे पर जोरदार आवाज हुई।
विराट की आवाज -
संयोगिता!!
संयोगिता की आँखें खुलीं, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। उसने ट्रिगर दबाने की कोशिश की, लेकिन उससे पहले ही विराट अंदर कूदा। उसने संयोगिता के हाथ को जोर से झटका दिया।
*छपाक!*
पिस्तौल संयोगिता के हाथ से छूटकर दूर जा गिरी।
संयोगिता चीखी -
मुझे छोड़ दो विराट! मुझे मरने दो!
लेकिन विराट ने उसे नहीं छोड़ा। उसने संयोगिता को अपनी बांहों में जकड़ लिया, इतनी ताकत से कि संयोगिता हिल भी नहीं पाई। संयोगिता ने उसे धक्का देने की कोशिश की, अपने खून से सने हाथों से विराट के चेहरे और कमीज को रंग दिया, लेकिन विराट को कोई परवाह नहीं थी।
विराट (रोते हुए, लेकिन दृढ़ता से) बोला -
चुप रहो संयोगिता! चुप रहो! तुम मरोगी नहीं। मैंने वादा किया था, याद है? मैं तुम्हें वापस लाऊंगा।
संयोगिता ने हाथ-पैर मारे।
बोली -
मैं एक मर्डरर हूँ विराट! देखो मेरे हाथ! देखो इस खून को! मैं तुम्हारे लिए काली हूँ!
विराट ने उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में ले लिया। संयोगिता का चेहरा खून से सना था, उसकी सांसों में मौत की गंध थी, लेकिन विराट ने झुककर उसके माथे को चूम लिया। फिर उसकी आँखों को, और फिर उसके कांपते हुए होंठों को।
यह किसी रोमांटिक पल जैसा नहीं था, यह एक प्राणदायी क्षण था। विराट का प्यार, उसका स्पर्श, उसकी गर्माहट... यह सब संयोगिता के उस ठंडे, जमे हुए दिल में एक दरार पैदा कर रहा था।
विराट (फुसफुसाते हुए) बोला -
तुम काली नहीं हो, संयोगिता। तुम मेरी हो। और मैं तुम्हें कहीं नहीं जाने दूंगा। चाहे तुम दुनिया की सबसे बड़ी अपराधी क्यों न हो जाओ, मेरे लिए तुम वही हो जो मेरे बेटे की माँ है।
संयोगिता का संघर्ष धीमा पड़ने लगा। विराट की बांहों में उसे वह सुरक्षा महसूस हुई जिसकी उसे बरसों से तलाश थी। उसका पागलपन, उसका गुस्सा, उसका दर्द... सब धीरे-धीरे पिघलने लगा। उसकी आँखों से आंसू बह निकले, जो उसके गालों पर जमे खून को धोते हुए नीचे गिरे।
वो बोली -
विराट... मुझे... मुझे बहुत थकान हो रही है...
उसकी आवाज अब कमजोर थी। विराट ने उसे और कसकर गले लगा लिया।
वो बोला -
सो जाओ संयोगिता। बस सो जाओ। मैं यहीं हूँ। मैं तुम्हारे साथ हूँ।
संयोगिता के शरीर का तनाव पूरी तरह खत्म हो गया। उसकी पलकें भारी होने लगीं। उसके सामने का दृश्य धुंधला पड़ने लगा। गोदाम की टिमटिमाती लाइट्स, विराट का चेहरा, खून की गंध... सब कुछ एक गहरे अंधेरे में समा गया।
उसका सिर विराट के कंधे पर झुक गया। उसकी सांसें अब नियमित और शांत थीं। वह बेहोश हो चुकी थी। विराट ने राहत की एक लंबी सांस ली, हालांकि उसकी आँखों से अभी भी आंसू बह रहे थे। उसने संयोगिता को अपनी गोद में उठाया। वह खून से लथपथ थी, लेकिन विराट के लिए वह अब भी वही पवित्र प्राणी थी जिससे वह प्यार करता था।
उसने बाहर निकलते हुए आसमान की तरफ देखा। बारिश अब तेज हो गई थी, जैसे प्रकृति भी इस त्रासदी के बाद एक नई शुरुआत के लिए रो रही हो।
विराट (मन में) बोला -
अब असली लड़ाई शुरू होगी, संयोगिता। तुम्हें बचाने की, तुम्हें ठीक करने की। लेकिन इस बार, तुम अकेली नहीं होगी।
वह अपनी कार की तरफ बढ़ा, संयोगिता को सुरक्षित अपनी बांहों में थामे हुए। पीछे उस गोदाम में मौत का सन्नाटा था, लेकिन कार के अंदर, जीवन की एक नई, संघर्षपूर्ण लेकिन उम्मीद से भरी यात्रा शुरू हो चुकी थी।