विराट ने कार का रुख घर की तरफ नहीं, बल्कि शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक पुराने, सुनसान हिल स्टेशन की ओर मोड़ दिया। वहाँ उसका एक पुराना दोस्त, डॉ. आर्यन, रहता था—एक ऐसा मनोचिकित्सक जो कानूनी उलझनों से दूर, गोपनीयता (confidentiality) को सर्वोपरि मानता था और जिस पर विराट आँख मूंदकर भरोसा कर सकता था।
रास्ते भर संयोगिता बेहोश रही। विराट ने बीच-बीच में उसे चेक किया, उसके माथे से खून के सूखे छिलकों को साफ़ किया और उसे पानी के छींटे मारे ताकि वह होश में आए, लेकिन वह गहरी नींद में सोई रही। यह नींद उसके लिए एक जरूरी पलायन थी।
घर पहुँचने से पहले, विराट ने रुककर फोन निकाला। उसके हाथ कांप रहे थे, लेकिन आवाज में वह दृढ़ता थी जो पिछले कुछ घंटों में पैदा हुई थी।
विराट (फोन पर, गंगा जी से) बोला -
माँ, हम घर नहीं आ रहे।
गंगा जी की आवाज में घबराहट थी -
क्या हुआ बेटा? संयोगिता ठीक तो है न? पुलिस..."
विराट बोला -
पुलिस का मामला मैं संभाल लूंगा। अभी के लिए, संयोगिता सुरक्षित है, लेकिन वह मानसिक रूप से टूट चुकी है। अगर वह घर आई, तो आपके डर और समाज की नजरें उसे फिर से उसी अंधेरे में धकेल देंगी जहाँ से वह निकली है। इसलिए, जब तक वह पूरी तरह ठीक नहीं हो जाती, जब तक वह अपने आप को एक 'इंसान' महसूस नहीं करने लगती, हम दोनों यहीं रहेंगे। किसी को इस जगह के बारे में मत बताइएगा। विवान का ख्याल रखिएगा। मैं वादा करता हूँ, मैं उसे वापस लाऊंगा... लेकिन वह संयोगिता नहीं होगी जो गई थी। वह नई होगी।
फोन काटते ही विराट ने राहत की सांस ली। अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं था।
अगली सुबह
संयोगिता की आँखें खुलीं। सफेद छत, हल्की धूप, और कमरे में फैली चमेली की खुशबू। यह वह बदबूदार गोदाम या खून से सना घर नहीं था। यह शांत था। बहुत ज्यादा शांत।
उसने अपना हाथ देखा। खून धोया जा चुका था, नाखून साफ़ थे। लेकिन उसे अपने हाथों पर अभी भी वह लाल रंग दिखाई दे रहा था। वह झटके से उठ बैठी।
तभी एक आवाज़ आई -
शांत रहो, संयोगिता।
एक गहरी, सुलझी हुई आवाज आई। संयोगिता ने पलटकर देखा। एक बुजुर्ग आदमी, डॉ. आर्यन, कुर्सी पर बैठे हुए थे। और उनके पास, खिड़की के पास खड़ा विराट था। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे, जैसे उसने पूरी रात जागकर उसे देखा हो।
संयोगिता (कांपती आवाज में) बोली -
मैंने उसे मार डाला... विराट, मैंने उसे मार डाला। मैं एक जानवर हूँ।
विराट आगे बढ़ा, लेकिन डॉ. आर्यन ने हाथ उठाकर उसे रोका।
डॉ. आर्यन बोले -
विराट, अभी नहीं। अभी उसे अपनी बात कहने दो। संयोगिता, तुमने जो किया, वह अपराध है। कानून की नजर में तुम दोषी हो सकती हो। लेकिन मेरी नजर में, तुम एक पीड़ित हो जिसने अपने दर्द को हिंसा में बदल दिया। अब सवाल यह नहीं है कि तुमने क्या किया। सवाल यह है कि अब तुम कौन बनना चाहती हो?"
संयोगिता ने सिर झुका लिया।
बोली -
मैं कुछ नहीं बनना चाहती। मैं मरना चाहती थी। विराट ने मुझे क्यों रोका?
विराट ने धीमे कदमों से आकर उसके बिस्तर के पास वाली कुर्सी पर बैठ गया। उसने संयोगिता का हाथ थामा। इस बार संयोगिता ने हाथ नहीं छुड़ाया, शायद इसलिए क्योंकि उसके पास लड़ने की ताकत नहीं बची थी।
विराट बोला -
क्योंकि तुम सिर्फ एक 'किलर' नहीं हो, संयोगिता। तुम विवान की माँ हो। तुम मेरी पत्नी हो। और सबसे बड़ी बात... तुम एक इंसान हो। इंसान गलतियाँ करते हैं, इंसान टूटते हैं, लेकिन इंसान जुड़ते भी हैं। मैं तुम्हें इसलिए नहीं बचाया कि तुम मेरी पत्नी हो, बल्कि इसलिए बचाया क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम्हारे अंदर अभी भी वह लड़की बाकी है जो प्यार करना जानती थी। हमें उसे ढूंढना है।
संयोगिता की आँखों से आंसू बह निकले।
वो बोली -
वह लड़की मर चुकी है, विराट।
डॉ. आर्यन बोले -
नहीं, वह सो रही है। और उसे जगाने में समय लगेगा। संयोगिता, तुम्हारी यात्रा आज से शुरू होती है। यह यात्रा आसान नहीं होगी। तुम्हें अपने अंदर के उस अंधेरे का सामना करना होगा। तुम्हें हर उस पल को याद करना होगा जब तुमने खून बहाया, और हर उस पल को भी जब तुमने प्यार किया। तुम्हें खुद को क्षमा करना सीखना होगा, ताकि दुनिया तुम्हें क्षमा कर सके।"
विराट ने संयोगिता के आंसू पोंछे।
विराट बोला -
मैं यहीं हूँ। जब तक तुम चल नहीं पाओगी, मैं तुम्हारा सहारा बनूंगा। जब तक तुम बोल नहीं पाओगी, मैं तुम्हारी आवाज बनूंगा। लेकिन चलना तुम्हें ही है, संयोगिता। विवान के लिए। अपने लिए।
संयोगिता ने विराट की आँखों में देखा। वहां न तो डर था, न ही घृणा। वहां सिर्फ एक अटूट विश्वास था। पहली बार, उस खून से सने कमरे के बाद, उसे लगा कि शायद... सिर्फ शायद... वह फिर से इंसान बन सकती है। उसने धीरे से सिर हिलाया। यह स्वीकृति थी। हार की नहीं, बल्कि संघर्ष की।
बाहर पक्षी चहचहा रहे थे। जीवन आगे बढ़ रहा था। और संयोगिता की 'इंसान बनने की यात्रा' का पहला पन्ना पलट चुका था।