डॉ. आर्यन ने अपनी फाइल बंद की और विराट की तरफ देखा। उनकी आवाज में वह गंभीरता थी जो एक अनुभवी चिकित्सक की होती है।
डॉ. आर्यन बोले -
देखिए विराट, संयोगिता का मामला सामान्य डिप्रेशन या ट्रॉमा का नहीं है। इसके अंदर कई परतें हैं—गिल्ट, रेज, सेल्फ-हैट्रेड, और एक गहरा साइकोलॉजिकल डैमेज। इसकी थेरेपी चलेगी। लंबी चलेगी। कभी-कभी मुझे लगेगा कि हम पीछे जा रहे हैं, लेकिन हम आगे बढ़ रहे होंगे। आपको रोज आना होगा। हर दिन। चाहे कुछ भी हो जाए।
विराट ने बिना एक पल की हिचकिचाहट के सिर हिलाया।
विराट बोला -
"हम जरूर आएंगे, डॉक्टर। रोज। चाहे मुझे दुनिया के किसी भी कोने से क्यों न आना पड़े।
डॉ. आर्यन ने एक पल के लिए संयोगिता को देखा, जो खिड़की के पास खड़ी बाहर देख रही थी। उसकी पीठ पर वही पुराना कोट था, जो अब थोड़ा बड़ा लग रहा था, जैसे उसका शरीर सिकुड़ गया हो।
डॉ. आर्यन (धीमी आवाज में, विराट से) बोले -
विराट, दवाइयाँ मैं दूंगा, सेशन मैं लूंगा... लेकिन सच कहूँ तो अभी इसे सबसे ज्यादा जिस चीज की जरूरत है, वो मेरी दवाइयों में नहीं मिलेगी।
विराट ने पूछा -
किस चीज की?
डॉ. आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा -
इसे बस... प्यार की जरूरत है। बिना शर्त वाला प्यार। जिसे देखकर इसे लगे कि वह अभी भी इंसान है। जिसके छूने से इसे लगे कि उसके हाथ गंदे नहीं हैं। जिसकी आवाज से इसे लगे कि वह अभी भी प्यारी है। बाकी सब मैं संभाल लूंगा।
विराट की आँखें नम हो गईं। उसने डॉक्टर को धन्यवाद दिया और संयोगिता के पास गया।
एक शांत होटल – शाम का वक्त
विराट संयोगिता को लेकर शहर से दूर एक पहाड़ी इलाके में बने एक छोटे से बुटीक होटल में आया था। यह वही जगह थी जहाँ विराट और संपूर्णा अपने हनीमून पर आए थे—बरसों पहले, जब सब कुछ अच्छा था। विराट ने जानबूझकर यह जगह चुनी थी। क्योंकि ये जगह संपूर्णा को बहुत पसंद थी।
कमरा नंबर 204।
दरवाजा खोला। अंदर हल्की पीली रोशनी थी। एक बड़ा सा बिस्तर, खिड़की से पहाड़ों का नजारा, और कोने में एक छोटी सी बालकनी। कमरे में ताजी चादरों की महक थी और हवा में हल्की सी लैवेंडर की खुशबू।
विराट ने धीरे से संयोगिता का हाथ पकड़ा और उसे अंदर ले आया। उसे बेड के किनारे पर बिठा दिया। संयोगिता अभी भी खामोश थी। उसकी नजरें जमीन पर टिकी थीं, जैसे वह उस खून को फिर से देख रही हो जो कभी उसके हाथों पर था।
विराट उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया। उसने संयोगिता के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया। यह वही हाथ थे, जो कुछ घंटे पहले एक इंसान को नोच रहे थे। लेकिन विराट की उंगलियों में कोई घृणा नहीं थी। वह उन्हें ऐसे थामे हुए था जैसे कोई कीमती चीज हो।
विराट (बहुत ही कोमल आवाज में) बोला -
संयोगिता... मेरी तरफ देखो।
संयोगिता ने धीरे से सिर उठाया। उसकी आँखें अभी भी सूनी थीं, लेकिन उनमें अब वह पागलपन नहीं था।
विराट बोला -
तुम यहाँ सुरक्षित हो। यहाँ सिर्फ हम हैं। कोई डर नहीं... कोई खून नहीं... कोई पागलपन नहीं... सिर्फ हम।
उसने एक पल रुककर संयोगिता के माथे को चूमा।
विराट बोला -
यह कमरा, यह बिस्तर, यह खिड़की... सब कुछ तुम्हारा इंतजार कर रहा था। जैसे मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।
संयोगिता की आँखों में कुछ हिला। जैसे एक जमी हुई झील के नीचे कोई लहर उठी हो। उसने धीरे से सिर हिलाया। यह बहुत छोटी सी हिल थी, लेकिन विराट के लिए यह किसी पहाड़ से बड़ी थी। उसकी संयोगिता... उसकी बात सुन रही थी। उसकी बात पर प्रतिक्रिया दे रही थी।
फिर, अचानक, संयोगिता ने कुछ कहा। उसकी आवाज बहुत धीमी थी, लगभग फुसफुसाहट जैसी, लेकिन उस एक वाक्य ने विराट के दिल को ऐसे हिला दिया जैसे सदियों बाद कोई घंटी बजी हो।
संयोगिता (झिझकते हुए) बोली -
विराट... मुझे... भूख लगी है।
विराट एक पल के लिए स्तब्ध रह गया।
भूख?
वह औरत, जो कुछ घंटे पहले खुद को मारना चाहती थी... जो कह रही थी कि उसके पास जीने का कोई कारण नहीं बचा... वह अब भूख की बात कर रही थी?
विराट की आँखों से आंसू छलक पड़े। लेकिन ये आंसू दर्द के नहीं थे। ये राहत के आंसू थे। वह जानता था कि भूख लगना सिर्फ पेट की खालीपन नहीं है—भूख लगना यह मतलब है कि शरीर जीना चाहता है। भूख लगना यह मतलब है कि अंदर की वह आवाज़, जो कह रही थी "मर जाओ", अब धीरे-धीरे कह रही है "जीना है"।
यह उसकी इंसान बनने की यात्रा का पहला कदम था। विराट ने जल्दी से अपने आंसू पोंछे और एक बड़ी सी मुस्कान के साथ उठा।
विराट (हँसते हुए, लेकिन आँखों में आंसू लिए) बोला -
भूख? बस? और तुमने मुझे इतना डरा दिया? रुको, अभी लाया।
वह दौड़कर फोन की तरफ गया और होटल के रूम सर्विस को कॉल किया।
विराट बोला -
हाँ, रूम नंबर 204। दो प्लेट खाना भेज दीजिए। कुछ गर्म, कुछ हल्का... और हाँ, एक ग्लास गर्म दूध भी। जल्दी भेजिए।
फोन रखकर वह वापस संयोगिता के पास आया और बेड पर उसके बगल में बैठ गया।
विराट बोला -
क्या खाओगी? मैंने मटर पनीर मंगाया है, रोटी, दाल, और तुम्हारे लिए गर्म दूध। याद है तुम्हे मटर पनीर बहुत पसंद है?
संयोगिता ने धीरे से सिर हिलाया।
बोली -
हाँ... याद है।
यह सुनकर विराट का दिल फिर भर आया। उसे याद था। उसकी संयोगिता को याद था। मतलब वह लड़की, जो उससे प्यार करती थी, वह अभी भी कहीं अंदर जिंदा थी। बस दब गई थी, उस खून और उस पागलपन के नीचे।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। वेटर खाना ले आया था। विराट ने ट्रे अपने हाथों में ली और वेटर को जाने दिया। उसने खुद ट्रे बेड के सामने वाले टेबल पर रखी। मटर पनीर की खुशबू पूरे कमरे में फैल गई। उसने एक रोटी तोड़ी, थोड़ा सा साग लगा, और संयोगिता की तरफ बढ़ाया।
विराट बोला -
लो... खाओ।
संयोगिता ने झिझकते हुए हाथ बढ़ाया। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। जैसे उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह रोटी छू सकती है। जैसे उसे डर हो कि कहीं उसके हाथ फिर से खून से न रंग जाएं। विराट ने उसका हाथ पकड़ा और रोटी उसके होंठों तक पहुंचाई।
विराट बोला -
डरो मत। तुम्हारे हाथ साफ हैं। अब साफ हैं। हमेशा साफ रहेंगे।
संयोगिता ने धीरे से वह रोटी का टुकड़ा खाया। निगलते ही उसकी आँखों से एक आंसू गिर पड़ा। यह आंसू दर्द का था, लेकिन साथ ही राहत का भी। विराट ने मुस्कुराते हुए दूसरा टुकड़ा तैयार किया।
विराट बोला -
और लो। धीरे-धीरे खाओ। जल्दी नहीं है। हमारे पास पूरी रात है। पूरी जिंदगी है।
संयोगिता ने खाते-खाते धीमी आवाज में कहा -
विराट...
विराट बोला -
हाँ?
संयोगिता बोली -
आपने... मेरे हाथों को क्यों नहीं छोड़ा?
विराट ने एक पल के लिए उसे देखा। फिर उसने संयोगिता का हाथ अपने होंठों से लगा लिया।
विराट बोला -
क्योंकि ये हाथ... मेरी जिंदगी हैं। और मैं अपनी जिंदगी कभी नहीं छोड़ता। ये वही हाथ हैं जिन्होंने मेरे रोते हुए बच्चे को तब संभाला जब मैं खुद टूट चुका था। ये वही हाथ हैं जिन्होंने मेरे बच्चे को बचाया था। ये वही हाथ हैं जिन्होंने मुझे संभाला।
बाहर हवा चल रही थी। पहाड़ों पर चाँदनी बिखरी थी। और उस छोटे से कमरे में, दो टूटे हुए इंसान, एक ट्रे पर रखे खाने के सामने बैठे, धीरे-धीरे फिर से जुड़ रहे थे। यह सिर्फ खाना खाना नहीं था। यह संयोगिता का पहला कदम था—मौत की दुनिया से, जीवन की तरफ। और विराट, हमेशा की तरह, उसके साथ था। हर कदम पर। क्योंकि उसने वादा किया था। और विराट अपने वादे निभाता है।