Her Silent Secret in Hindi Women Focused by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Her Silent Secret - 40

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Her Silent Secret - 40

खाना खाने के बाद, संयोगिता की आँखों में एक अजीब सी थकान थी। वह थकान सिर्फ शारीरिक नहीं थी, बल्कि उसकी रूह की थी। सालों तक जागते रहने, डरते रहने और मारते रहने के बाद, उसे पहली बार 'सुरक्षित' महसूस हो रहा था।

विराट ने धीरे से उसे तकिये पर लिटाया। संयोगिता ने करवट बदली और विराट की बांहों के बीच अपनी जगह बना ली। उसका सिर विराट के सीने पर था, और उसका एक हाथ विराट की कमीज को मुट्ठी में भींचे हुए था—बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई बच्चा अपनी माँ को पकड़ता है, या कोई प्रेमी अपने सहारे को।

विराट ने उसके बालों में उंगलियां फेरनी शुरू कीं। यह वही हरकत थी जो वह सालों पहले करता था। और तभी... समय रुक सा गया। संयोगिता की सांसों की गति, उसके सोने का तरीका, और उसका चेहरा... सब कुछ विराट को एक ऐसे अतीत में ले गया जहाँ से वह भागना चाहता था, लेकिन जिससे वह कभी पूरी तरह अलग नहीं हो पाया।

**संपूर्णा।**
विराट की पहली पत्नी।
संयोगिता और संपूर्णा में शारीरिक समानता इतनी ज्यादा थी कि कई बार लोग उन्हें भ्रम में पड़ जाते थे। लेकिन आज रात, इस शांत कमरे में, जब संयोगिता विराट की बांहों में सो रही थी, तो वह सिर्फ एक हमशक्ल नहीं लग रही थी। वह *वही* लग रही थी।

विराट की आँखों के सामने संपूर्णा का चेहरा तैरने लगा। वह यादें जो वह दफन करना चाहता था, वे फिर से ताजा हो गईं। संपूर्णा भी ऐसे ही सोती थी—शांत, भरोसेमंद, और विराट के सीने से सटी हुई। संपूर्णा की मौत के बाद, विराट ने खुद को कसम खाई थी कि वह कभी किसी को इतना करीब नहीं आएगा। वह डरता था कि अगर वह फिर से प्यार करेगा, तो वह फिर से टूटेगा।

लेकिन संयोगिता... संयोगिता ने उसकी सभी दीवारें तोड़ दीं थीं। विराट ने संयोगिता के चेहरे को देखा। चांदनी की हल्की रोशनी खिड़की से आकर उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसकी पलकें कांप रही थीं, शायद वह सपने देख रही थी। विराट का दिल भारी हो गया। उसे एहसास हुआ कि वह संयोगिता से प्यार इसलिए नहीं करता क्योंकि वह संपूर्णा जैसी दिखती है। वह उसे इसलिए प्यार करता है क्योंकि संयोगिता ने उसके टूटे हुए दिल को फिर से जोड़ा था, हालांकि उसका अपना दिल हजार टुकड़ों में बिखरा हुआ था।

लेकिन इस पल, इस खामोशी में, संपूर्णा की याद एक छाया की तरह उनके बीच खड़ी थी। विराट ने धीरे से संयोगिता के माथे को चूमा।

उसने मन में कहा -
माफ़ करना, संपूर्णा, मैंने वादा किया था कि मैं तुम्हारे बाद किसी और को अपने दिल में जगह नहीं दूंगा। लेकिन संयोगिता... वह मेरी नियति बन गई।

संयोगिता ने नींद में बुदबुदाया -
विराट...

उसकी आवाज में वही मिठास थी जो संपूर्णा की आवाज में होती थी। विराट की आँखों से एक आंसू गिरा और संयोगिता के गाल पर जा गिरा। संयोगिता ने झिझकते हुए अपनी उंगली से उस आंसू को पोंछा, बिना आँखें खोले, जैसे उसे पता हो कि विराट रो रहा है।

यह छोटा सा इशारा विराट के लिए काफी था। उसने संयोगिता को और कसकर गले लगा लिया। अब वह संपूर्णा की यादों में नहीं जी रहा था। वह वर्तमान में जी रहा था। संयोगिता के साथ।

रात गहरी होती गई। बाहर हवाएं चल रही थीं, पेड़ सरसरा रहे थे। लेकिन कमरे के अंदर, दो टूटी हुई रूहें एक-दूसरे की गर्माहट में सुकून ढूंढ रही थीं। विराट जानता था कि सुबह होते ही असली लड़ाई शुरू होगी। डॉक्टर आर्यन की थेरेपी, समाज का डर, पुलिस की जांच, और संयोगिता के अंदर का अंधेरा... सब कुछ उनका इंतजार कर रहा था।

लेकिन अभी, इस पल, सब कुछ शांत था। विराट ने आँखें बंद कीं और संयोगिता की सांसों की लय के साथ अपनी सांसों को मिलाने की कोशिश की।

उसने फुसफुसाया -
सो जाओ, संयोगिता,मैं यहीं हूँ। और मैं कहीं नहीं जाऊंगा।

और इस बार, संयोगिता ने सच में सोना स्वीकार कर लिया। क्योंकि उसे विश्वास था कि जब वह जागेगी, तो विराट वहीं होगा। यही वह पल था जब संयोगिता की 'इंसान बनने की यात्रा' का दूसरा पड़ाव पूरा हुआ। 

पहला पड़ाव था: **भूख लगना (जीने की इच्छा)।**
दूसरा पड़ाव था: **भरोसा करना (सुरक्षा का एहसास)।**

अब तीसरा पड़ाव बाकी था: **खुद को क्षमा करना।**

और वह सबसे मुश्किल होने वाला था। 

अगली सुबह, धूप की किरणें खिड़की से अंदर आ रही थीं, लेकिन कमरे का माहौल अभी भी गंभीर था। डॉ. आर्यन के क्लिनिक का वह कमरा सफेद दीवारों और हल्के नीले रंग से सजा हुआ था, जो शांति देने के लिए डिज़ाइन किया गया था, लेकिन संयोगिता के लिए यह एक कोर्ट रूम जैसा लग रहा था।

विराट संयोगिता के बिल्कुल पास बैठा था। उसने संयोगिता का हाथ थाम रखा था, ताकि उसे लगे कि वह अकेली नहीं है। डॉ. आर्यन अपनी नोटबुक के साथ सामने वाली कुर्सी पर बैठे थे। उनकी आँखों में सहानुभूति थी, लेकिन पेशेवर दूरी भी।

डॉ. आर्यन बोले - 
संयोगिता, हमें उस जड़ तक जाना होगा जहाँ से यह सब शुरू हुआ। तुम्हारा 'शिकारी' बनना कोई अचानक हुआ फैसला नहीं था। यह एक प्रतिक्रिया थी। एक बहुत गहरी चोट की प्रतिक्रिया। क्या तुम मुझे बता सकती हो कि वह पहली चोट कब लगी?

संयोगिता ने सिर झुका लिया। उसके हाथ कांपने लगे। विराट ने उसकी उंगलियों को थोड़ा कसकर पकड़ा।

संयोगिता (धीमी, टूटी हुई आवाज में) बोली - 
कॉलेज... मेरा दूसरा साल था। मैं बहुत शर्मीली थी। बहुत भोली।

उसने एक लंबी सांस ली, जैसे किसी भारी पत्थर को उठाने की तैयारी कर रही हो।

संयोगिता बोली - 
कुछ लड़के... वे पावरफुल परिवारों से थे। उन्होंने मुझे पार्टी में नशा दिया। जब मैं नशे में थी... उन्होंने...

उसकी आवाज गले में अटक गई। उसकी आँखों में वही पुराना डर लौट आया। विराट का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, लेकिन उसने खुद को संभाला। वह जानता था कि अगर वह बीच में बोला, तो संयोगिता रुक जाएगी।

**डॉ. आर्यन (कोमलता से) बोले - 
उन्होंने तुम्हारे साथ r*** किया, है ना संयोगिता?

संयोगिता ने सिर हिलाया। आँसू उसकी पलकों से टपकने लगे।

संयोगिता बोली - 
नहीं। मैं बच कर भाग गई थी। पर मैं टूट चुकी थी। उन लोगों ने मेरा वीडियो बनाया था। उन्होंने मुझे बहुत दिनों तक परेशान किया। मजाक बनाया। Video दिखाई। और सबसे बड़ी बात... पुलिस ने कुछ नहीं किया। उनके बाप के पैसे ने सब खरीद लिया। मुझे कहा गया कि चुप रहो, वरना मेरी इज्जत और खराब हो जाएगी। मैं टूट गई थी। मैंने सोचा था कि मैं मर जाऊंगी। लेकिन मैं जियी। और उस दिन, उस रात, मैंने कसम खाई थी कि अब कोई भी मुझे कमजोर नहीं समझेगा। मैंने खुद को कठोर बना लिया।

डॉ. आर्यन ने नोट किया। 

वो बोले - 
तो यहाँ से शुरू हुआ तुम्हारा विश्वासघात। समाज ने, कानून ने, और उन लोगों ने तुम्हें बताया कि तुम्हारी आवाज का कोई महत्व नहीं है। इसलिए तुमने हिंसा को अपनी आवाज बना लिया।

संयोगिता ने सिर हिलाया। 

वो बोली - 
लेकिन असली बदलाव... असली वह पल जब मैंने 'इंसान' होना छोड़ दिया और 'शिकारी' बन गई... वह कॉलेज के बाद नहीं था।

विराट ने हैरानी से संयोगिता की तरफ देखा। उसे लगा था कि कॉलेज वाला मामला ही मुख्य कारण है।

संयोगिता बोली - 
जब मैंने जॉब शुरू की। मैं अकेली रहती थी। मेरा कोई नहीं था। अनजान शहर था। सिर्फ एक बिल्ली थी... 'मुन्नी'। वह मेरी एकमात्र दोस्त थी। वह मेरी सारी बातें सुनती थी। जब मैं रोती, तो वह मेरे पास आकर बैठ जाती। वह मेरे लिए परिवार थी।

संयोगिता की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई—दर्द और क्रोध की मिली-जुली चमक।

संयोगिता बोली - 
"एक दिन मैं ऑफिस से लौटी। दरवाजा खुला था। अंदर खून फैला हुआ था। मुन्नी... मेरी मुन्नी...

उसकी आवाज कांप गई। विराट ने उसे गले लगा लिया, लेकिन संयोगिता ने हल्का सा प्रतिरोध किया। उसे यह कहना था।

संयोगिता बोली - 
कुछ स्थानीय गुंडों ने, जो उस इमारत में दबदबा रखते थे, सिर्फ मजे के लिए... सिर्फ यह दिखाने के लिए कि वे कितने ताकतवर हैं... उन्होंने मुन्नी को पीटा बहुत मारा। और फिर... उसे छत से फेंक दिया।

कमरे में सन्नाटा छा गया। विराट का दिल पसीज गया। उसे याद आया कि कैसे संयोगिता हमेशा जानवरों से इतना प्यार करती थी।

संयोगिता (आँसू पोंछते हुए, लेकिन आवाज में अब ठंडक थी) बोली - 
मैंने उन्हें पकड़ा। मैंने पुलिस को बुलाया। लेकिन फिर वही हुआ। रिश्वत। धमकी। उन्होंने कहा, 'यह तो बस एक बिल्ली थी, इंसान नहीं।' एक बिल्ली थी... इंसान नहीं।

उसने विराट की आँखों में देखा।

संयोगिता बोली - 
उस दिन मुझे एहसास हुआ कि इस दुनिया में 'इंसान' होने का कोई मतलब नहीं है अगर तुम्हारे पास ताकत नहीं है। अगर तुम कमजोर हो, तो तुम सिर्फ एक 'बिल्ली' हो जिसे कोई भी कुचल सकता है। इसलिए मैंने फैसला किया। मैं इंसान नहीं बनूंगी। मैं वह बनूंगी जिससे वे डरें। मैं वह बनूंगी जो शिकार करता है, न कि शिकार होता है।

डॉ. आर्यन ने गहरी सांस ली।

डॉ. आर्यन बोले - 
तो तुम्हारी हिंसा, तुम्हारा क्रोध... यह सिर्फ बदला नहीं था। यह एक सुरक्षा कवच था। तुमने खुद को एक हथियार में बदल लिया ताकि फिर कभी कोई तुम्हारी 'मुन्नी' को, या तुम्हें, नुकसान न पहुंचा सके।

संयोगिता ने सिर हिलाया। 

बोली - 
हाँ। और फिर धीरे-धीरे, मुझे इसमें आदत हो गई। खून बहाना आसान हो गया। दर्द महसूस करना बंद हो गया। मैंने खुद को मार दिया, ताकि मैं दूसरों को मार सकूं।

विराट अब समझ पा रहा था। संयोगिता एक साइकोपैथ नहीं थी। वह एक ट्रॉमाइटाइज्ड सर्वाइवर थी जिसने अपने दर्द को हिंसा में बदल दिया था। उसकी निर्दयता उसके अंदर के टूटे हुए बच्चे की चीख थी। विराट ने संयोगिता के हाथ को चूमा।

विराट बोला - 
तुमने खुद को नहीं मारा, संयोगिता। तुमने सिर्फ उस भोली लड़की को दफन कर दिया था जो चोट सहन नहीं कर पा रही थी। लेकिन वह लड़की अभी भी जीवित है। और अब... अब उसे दफन होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि अब मैं हूँ। और मैं वादा करता हूँ, अब कोई भी तुम्हें, या तुम्हारे अपनों को, नुकसान नहीं पहुंचाएगा। कानून चाहे काम न करे, लेकिन मैं करूंगा।

डॉ. आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा -
यह बहुत अच्छी शुरुआत है, विराट। संयोगिता, आज तुमने अपना सबसे बड़ा राज खोला है। यह दर्दनाक था, लेकिन जरूरी था। अब हम इस दर्द को बाहर निकालेंगे। धीरे-धीरे।

संयोगिता ने विराट की ओर देखा। उसकी आँखों में अब वह ठंडा संकल्प नहीं था, बल्कि एक थकी हुई, लेकिन उम्मीद से भरी नमी थी।

संयोगिता बोली - 
क्या... क्या मैं फिर से इंसान बन सकती हूँ, विराट? क्या मैं फिर से वह लड़की बन सकती हूँ जो मुन्नी के लिए रोती थी, बिना किसी को मारे?

विराट ने उसके माथे को चूमा।

विराट बोला - 
तुम वही हो, संयोगिता। बस तुम्हें खुद को पहचानना है। और मैं तुम्हें हर कदम पर याद दिलाता रहूंगा।

बाहर बारिश शुरू हो गई थी। लेकिन इस बार, वह बारिश धोने के लिए नहीं, बल्कि नई शुरुआत के लिए हो रही थी। थेरेपी का पहला सेशन खत्म हो चुका था। लेकिन असली इम्तिहान तो अब शुरू होने वाला था—जब संयोगिता को अपने अंदर के उस 'शिकारी' से लड़ना होगा, जो अब भी उसमें कहीं छिपा हुआ था, और उसे 'इंसान' बनने का रास्ता दिखाना होगा।