शाम ढल रही थी। होटल के कमरे में हल्की सी ठंडक थी। विराट ने अपने फोन को टेबल पर रखा और वीडियो कॉल मिलाया। स्क्रीन पर गंगा जी का चेहरा आया, और उनके पीछे, सोफे पर बैठा विवान दिखा।
विवान का चेहरा उदास था। उसकी आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह रो-रोकर थक गया हो। जब उसने स्क्रीन पर विराट को देखा, तो उसके चेहरे पर एक क्षण के लिए राहत की लहर दौड़ी, लेकिन फिर उसकी नजरें विराट के पीछे खड़ी संयोगिता पर टिक गईं।
विराट (मुस्कुराते हुए) बोला -
हेलो बेटा! कैसा है मेरा शेर?
विवान ने धीमे से सिर हिलाया, लेकिन उसकी आवाज नहीं निकली। वह बस स्क्रीन को घूर रहा था। गंगा जी ने फोन को थोड़ा पास किया।
गंगा जी बोलीं -
विराट, बेटा... विवान पूरे दिन से तुम्हारा और संयोगिता का इंतजार कर रहा है। वह कुछ खा भी नहीं रहा।
विराट ने फोन को संयोगिता की तरफ बढ़ाया। संयोगिता हिचकिचा रही थी। उसे डर था कि विवान उसे देखकर क्या कहेगा। क्या वह उससे नफरत करेगा? क्या वह उसे 'राक्षस' कहेगा?
लेकिन विराट ने उसे हल्के से आगे धकेला।
विराट बोला -
संयोगिता... बात करो। वह तुम्हें देखना चाहता है।
संयोगिता ने कांपते हाथों से फोन लिया। उसने स्क्रीन पर अपने बेटे को देखा। विवान की आँखों में वही बेचैनी थी जो संयोगिता की अपनी आँखों में होती थी जब वह असुरक्षित महसूस करती थी।
संयोगिता (कांपती आवाज में) बोली -
विवान... मेरे बच्चे...
विवान की आँखों में आंसू छलक आए। उसने स्क्रीन को छूने की कोशिश की, जैसे वह अपनी माँ को छू सके।
विवान (सिसकते हुए) बोला -
मम्मा... आप कहाँ हैं? आप मुझे छोड़कर क्यों चली गईं? पापा कह रहे थे कि आप बीमार हैं, लेकिन मुझे लगा कि आप मुझसे नाराज हैं। क्या मैंने कोई गलती की? प्लीज मम्मा, वापस आ जाओ। मुझे डर लग रहा है। दादी मुझे समझा रही हैं, काजल चाची चुप हैं... सब कुछ अजीब लग रहा है। मुझे बस आप चाहिए।
संयोगिता का दिल टूट गया। उसकी आँखों से आंसू बह निकले। उसने फोन को और करीब किया।
संयोगिता बोली -
नहीं बेटा... नहीं। तुमने कोई गलती नहीं की। तुम सबसे अच्छे बच्चे हो। मम्मा... मम्मा थोड़ी बीमार थी। बहुत ज्यादा बीमार। इसलिए डॉक्टर अंकल ने कहा कि मुझे कुछ दिन आराम करना होगा। लेकिन मैं तुमसे नाराज नहीं हूँ। कभी नहीं।
विवान ने अपनी नाक पोंछी।
विवान बोला -
तो आप वापस कब आएंगी? मुझे आपकी कहानियाँ सुननी हैं। मुझे आपके साथ सोना है। अकेले सोने में डर लगता है।
संयोगिता ने विराट की तरफ देखा। विराट ने सिर हिलाया, जैसे कह रहा हो, *सच बोलो, लेकिन उसे चोट मत पहुंचाओ।*
संयोगिता बोली -
बेटा, मम्मा जल्दी वापस आएंगी। पापा मेरा ख्याल रख रहे हैं। हम दोनों मिलकर तुम्हारे लिए एक सरप्राइज लेकर आएंगे। तब तक तुम दादी का ख्याल रखोगे? और अपनी पढ़ाई?
विवान ने सिर हिलाया, हालांकि उसकी आँखों में अभी भी संदेह था।
विवान बोला -
हाँ मम्मा। लेकिन आप वादा करो कि आप फिर नहीं जाओगी। अगर आप चली गईं, तो मैं भी आपके साथ चलूंगा। मैं पापा और दादी को छोड़ दूंगा।
यह सुनकर संयोगिता की सांस रुक सी गई। एक बच्चे का यह निस्वार्थ, लेकिन डरा हुआ प्रस्ताव उसे अंदर तक हिला गया।
संयोगिता बोली -
वादा करती हूं, विवान। मैं कहीं नहीं जाऊंगी। मैं वापस आऊंगी। और इस बार, हम तीनों हमेशा साथ रहेंगे। पक्का वादा।
विवान ने एक छोटी सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया।
बोला -
ठीक है मम्मा। मैं आपका इंतजार करूंगा। लेकिन जल्दी आना।
गंगा जी ने बीच में कहा -
बस बेटा, अब फोन रख दो। विवान को सोने का समय हो गया है।
विराट ने आगे बढ़कर फोन लिया।
विराट बोला -
गुड नाइट बेटा। पापा जल्दी आ रहे हैं। तुम हिम्मत रखो।
कॉल कट गई। कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया। लेकिन इस बार का सन्नाटा भारी नहीं था। यह एक ऐसे सन्नाटे की तरह था जिसमें उम्मीद की एक किरण बाकी थी।
संयोगिता फोन को देखती रही। उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन अब वे दर्द के आंसू नहीं थे। वे मातृत्व के आंसू थे। उस एहसास के आंसू कि वह अभी भी किसी की दुनिया है।
विराट ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
विराट बोला -
तुमने अच्छा किया, संयोगिता। उसने तुम्हें माफ़ कर दिया। वह तुमसे प्यार करता है।
संयोगिता ने विराट की आँखों में देखा।
संयोगिता बोली -
वह मेरी वजह से रोया, विराट। मेरी वजह से उसे डर लगा। मैं एक अच्छी माँ नहीं हूँ।
विराट बोला -
एक अच्छी माँ वह नहीं होती जो कभी गलती न करे। एक अच्छी माँ वह होती है जो अपनी गलतियों को सुधारने के लिए लड़े। और तुम लड़ रही हो, संयोगिता। विवान के लिए। अपने लिए।
संयोगिता ने गहरी सांस ली।
संयोगिता बोली -
"मुझे वापस जाना है, विराट। मुझे विवान के पास जाना है। लेकिन पहले... पहले मुझे खुद को ठीक करना होगा। ताकि जब मैं उसके सामने जाऊं, तो मैं एक 'किलर' नहीं, बल्कि उसकी 'मम्मा' बनकर जाऊं।
विराट ने मुस्कुराते हुए कहा -
और इसके लिए हमें डॉ. आर्यन की मदद चाहिए। और मेरी। हम साथ हैं, याद है?
संयोगिता ने सिर हिलाया।
बोली -
हाँ। साथ।
उस रात, संयोगिता ने पहली बार बिना किसी डर के, बिना किसी पिस्तौल के पास रखे, सोने की कोशिश की। क्योंकि अब उसके पास एक वजह थी जीने की। एक ऐसा चेहरा जो उसे बुला रहा था। विवान का चेहरा। और यह यात्रा, जो कल शुरू हुई थी, अब एक मकसद पा चुकी थी।
यह सच था कि संयोगिता विवान की सौतेली माँ थी। जैविक रूप से वह उसकी माँ नहीं थी, लेकिन प्यार के रिश्ते खून से नहीं, बल्कि एहसासों से बनते हैं। और संयोगिता ने विवान को अपने दिल के सबसे गहरे हिस्से में उस जगह दी थी जो अक्सर सिर्फ 'सगी' माँ के लिए सुरक्षित मानी जाती है।
विवाह के बाद से ही, जब विवान छोटा था, संयोगिता ने उसे गोद लिया था। उसने उसकी नींदें जागकर देखी थीं, उसके बुखार में रात भर पट्टियां बदली थीं, और उसके हर किले को अपनी मुस्कान से जीता था। विवान के लिए 'मम्मा' शब्द का मतलब सिर्फ जन्म देने वाली महिला नहीं, बल्कि वह शख्स था जो उसे सबसे ज्यादा सुरक्षा और प्यार देता था—और वह शख्स संयोगिता ही थी।
डॉ. आर्यन अपनी थेरेपी जारी रखे हुए थे। वे धीरे-धीरे संयोगिता के उस 'शिकारी' व्यक्तित्व को उकेर रहे थे ताकि उसके अंदर छिपी हुई उस नाजुक लड़की को बाहर लाया जा सके।
डॉ. आर्यन (एक सेशन के दौरान) बोले -
संयोगिता, तुमने कहा कि तुम विवान की सौतेली माँ हो। लेकिन क्या तुमने कभी खुद को 'अजनबी' महसूस किया है उसके साथ?
संयोगिता ने तुरंत सिर हिलाया, इस बार बिना किसी झिझक के।
संयोगिता बोली -
नहीं। कभी नहीं। जब मैंने पहली बार उसे गोद में लिया, तो मुझे लगा जैसे मेरा अपना टूटा हुआ हिस्सा वापस मिल गया हो। विवान... वह मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत तोहफा है। चाहे दुनिया क्या कहे, मेरे लिए वह मेरा खून है।
डॉ. आर्यन ने नोट किया।
बोले -
यही तुम्हारी ताकत है, संयोगिता। यह निस्वार्थ प्रेम। इसी प्रेम ने तुम्हें इंसान बनाए रखा, भले ही तुम्हें लगा हो कि तुम राक्षस बन गई हो।
इसी बीच, विराट अपनी भूमिका निभा रहा था। वह सिर्फ एक पति नहीं, बल्कि संयोगिता का सहारा, उसका दोस्त, और उसका रक्षक बन गया था।
हर सुबह, विराट संयोगिता के लिए चाय बनाता। हर शाम, वह उसके साथ बैठकर बातें करता—कभी कॉलेज की यादों के बारे में, कभी विवान की शरारतों के बारे में, और कभी भविष्य के सपनों के बारे में। वह उसे यह एहसास दिलाता रहा कि वह 'संयोगिता' है, न कि कोई 'किलर'।
एक शाम, जब संयोगिता बालकनी में बैठी चांदनी देख रही थी, विराट पीछे से आया और उसके कंधों पर हाथ रख दिए।
विराट बोला -
क्या सोच रही हो?
संयोगिता बोली -
विवान के बारे में। उसे अब तक स्कूल जाना चाहिए था। क्या वह ठीक से पढ़ रहा होगा? क्या दादी उसे समय पर खिला रही होंगी?
विराट ने हंसते हुए कहा -
गंगा जी उसे राजकुमार की तरह पाल रही हैं। और विवान भी समझदार है। वह जानता है कि उसकी मम्मा उसके लिए लड़ रही है।
संयोगिता ने विराट की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक नई चमक थी।
संयोगिता बोली -
विराट, आपने मुझे क्यों नहीं छोड़ा? जब तुम्हें पता चला कि मैंने क्या किया है... जब आपको पता चला कि मैं एक हत्यान हूँ... तो तुम भाग क्यों नहीं गए? आपको एक साफ-सुथरी जिंदगी मिल सकती थी।
विराट ने संयोगिता को अपनी बांहों में भर लिया।
विराट बोला -
क्योंकि 'साफ-सुथरी' जिंदगी में प्यार नहीं होता, संयोगिता। प्यार तो उसमें होता है जो गंदगी को भी स्वीकार कर ले। तुमने मेरे अकेलेपन को भर दिया। तुमने विवान को माँ का प्यार दिया। तुमने मेरे घर को 'घर' बनाया। अगर तुम चली जातीं, तो मेरी जिंदगी फिर से वीरान हो जाती।
उसने संयोगिता के माथे को चूमा।
विराट बोला -
और हाँ, तुमने गलतियाँ कीं। बहुत बड़ी गलतियाँ। लेकिन तुमने उन्हें अकेलेपन और दर्द में कीं। अब तुम अकेली नहीं हो। इसलिए अब गलतियाँ नहीं होंगी। अब सिर्फ सुधार होगा।
संयोगिता ने विराट के सीने से लगकर रोना शुरू कर दिया। यह रोना राहत का था। वह रो रही थी क्योंकि उसे एहसास हो रहा था कि वह अकेली नहीं है। कि उसका पाप भले ही बड़ा हो, लेकिन उसका प्यार उससे भी बड़ा है।
डॉ. आर्यन की थेरेपी और विराट के अटूट प्यार ने मिलकर संयोगिता के अंदर एक नई ऊर्जा पैदा की थी। वह अब मौत की ओर नहीं, बल्कि जीवन की ओर बढ़ रही थी।
लेकिन अभी भी एक डर बाकी था। समाज का डर। कानून का डर। और सबसे बड़ा डर—खुद के अंदर छिपे उस अंधेरे का, जो कभी भी वापस आ सकता था।
पर उस रात, विराट की बांहों में, संयोगिता को लगा कि शायद... सिर्फ शायद... वह फिर से 'संयोगिता' बन सकती है। विवान की मम्मा। विराट की पत्नी। और एक इंसान।