जाइए...", दादाजी ने अपना हाथ हवा में उठाकर उसे बीच में ही टोक दिया।
दादाजी: "चुप रहो अवनि! चुप रहो बेटी। आज मुझे बोलने दो।
बहुत बरसों तक मैं शांत रहा, लेकिन आज तुम्हारी ममता और तुम्हारे त्याग का जो अपमान हुआ है, उसके बाद अगर मैं चुप रहा तो यह खुद के साथ गद्दारी होगी।"
दादाजी ने फिर से आर्यमन के परिवार की ओर देखा, जो अब भी वहां जड़ बने खड़े थे। दादाजी की आँखों में दहकता गुस्सा देख उनकी रूह कांप गई।
दादाजी (गरजते हुए): "तुम लोग अब भी यहीं खड़े हो? क्या थो़ड़ी बहुत शर्म बाकी है या वह भी बेच खाई? निकल जाओ यहाँ से, इससे पहले कि मैं पुलिस बुलाकर तुम्हें यहाँ से बेदखल करवाऊँ! दफा हो जाओ!"
आर्यमन के माता-पिता और भाई-भाभी अब एक पल भी वहां रुकने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। वे सिर झुकाए अपनी गाड़ियों की ओर भागे और धूल उड़ाते हुए वहां से गायब हो गए।
पहाड़ी पर अब सिर्फ सन्नाटा था। दादाजी ने गहरी सांस ली और अवनि की ओर मुड़े।
अवनि का चेहरा आंसुओं से भीगा था। दादाजी ने बड़े ही प्यार से अवनि का हाथ पकड़ा, जैसे उसे यकीन दिला रहे हों कि अब वह अकेली नहीं है।
दादाजी: "चलो बेटी। यहाँ अब हमारा एक पल भी रुकना बेकार है। यह जगह उन यादों के लायक नहीं है जो तुम्हें दुख दें।"
दादाजी अवनि का हाथ पकड़कर उसे अपनी शानदार आलीशान गाड़ी की ओर ले गए। अवनि के माता-पिता भी चुपचाप पीछे-पीछे आए।
जैसे ही अवनि गाड़ी में बैठी, उसने उस पहाड़ की ओर आखिरी बार देखा जहाँ उसने आर्यमन की जान बचाई थी, पर अब उसकी आँखों में दर्द की जगह एक नई दृढ़ता थी।
गाड़ियाँ तेज़ी से शहर की ओर मुड़ गईं। दादाजी अवनि को लेकर अपने उस विशाल बंगले पर पहुँचे जो शहर के रईसों के लिए भी एक सपना था।
उधर, श्रद्धा आर्यमन को अपने होटल के कमरे में ले आई थी। जैसे ही कमरे का दरवाज़ा बंद हुआ, श्रद्धा ने अपनी बनावटी मुस्कान बिखेरी और आर्यमन के गले लगने के लिए हाथ आगे बढ़ाए।
लेकिन इससे पहले कि वह उसे छू पाती, आर्यमन ने पूरी नफरत के साथ उसे पीछे धक्का दे दिया। श्रद्धा लड़खड़ाकर बेड पर जा गिरी, उसकी आँखों में हैरानी और गुस्सा एक साथ उभर आया।
आर्यमन (दहाड़ते हुए): "बस श्रद्धा! बहुत हुई तुम्हारी ये नौटंकी! अब एक कदम भी मेरे पास आने की कोशिश मत करना। आखिर तुम चाहती क्या हो? क्यों मेरे पास वापस लौट कर आई हो?"
श्रद्धा ने खुद को संभाला और अपने बाल ठीक करते हुए बोली, "आर्यमन, ये कैसा बर्ताव है?
मैं तुम्हारी मंगेतर बनने वाली हूँ, मैं यहाँ सिर्फ तुम्हारे लिए आई हूँ..."
आर्यमन (चीखते हुए): "मंगेतर? तुम उस वक्त कहाँ थीं जब मैं मौत और ज़िंदगी के बीच जंग लड़ रहा था?
आर्यमन की आँखों में बरसों का जमा गुबार ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा। उसने श्रद्धा की ओर एक कदम बढ़ाया, उसकी आँखों में नफरत और पुराने ज़ख्मों का दर्द साफ़ झलक रहा था।
आर्यमन (चीखते हुए): "मंगेतर? कैसी मंगेतर? तुम उस वक्त कहाँ थीं जब मैं मौत और ज़िंदगी के बीच जंग लड़ रहा था?
जब मेरा एक्सीडेंट हुआ था और मैं मौत के मुंह में था, तब तुम मुझे तड़पता छोड़कर किसी दूसरे के पास चली गई थी! क्या तब तुम्हें मेरी याद नहीं आई?"
श्रद्धा की बोलती बंद हो गई, वह बस फटी आँखों से उसे देखती रही।
आर्यमन (गला रुँधते हुए): "तुम्हें पता है मैं तुम्हारी यादों में कितना तड़पा हूँ? पल-पल मरा हूँ मैं! तुम्हारी उस बेवफाई ने मुझे अंदर से खोखला कर दिया था।
मैं क्या से क्या बन गया, मेरी हंसी, मेरी खुशियाँ... सब तुमने छीन ली थीं।
और आज इतने सालों बाद, जब मैं संभलने लगा था, जब किसी ने मुझे बिना किसी स्वार्थ के नया जीवन दिया, तो तुम्हें अचानक मेरी याद आ गई?
बस करो यह नौटंकी श्रद्धा! अपनी ये बनावटी हमदर्दी अपने पास रखो।"
श्रद्धा ने लड़खड़ाते हुए कहा, "आर्यमन... वो... वो मेरी मजबूरी थी, मैं डर गई थी..."
आर्यमन (नफरत से): "मजबूरी नहीं, वो तुम्हारी फितरत थी! तुम सिर्फ चमक-धमक और रसूख से प्यार करती हो।
आज तुम्हें लगा होगा कि आर्यमन फिर से ठीक हो गया है, उसका रुतबा वापस आ गया है, तो तुम फिर से अपना हक जताने आ गईं? लेकिन तुम देर कर चुकी हो।
तुमने आज उस लड़की का अपमान किया है जिसने अपनी पवित्रता से मेरे ज़ख्मों को भरा था।"
आर्यमन ने अपना हाथ दरवाज़े की ओर किया और बेहद ठंडे लहजे में कहा, "अभी और इसी वक्त में इस कमरे से बाहर जा रहा हूं श्रद्धा।
मेरा अतीत बनने की कोशिश भी मत करना, क्योंकि तुम मेरे लिए अब मर चुकी हो।"
आर्यमन जैसे ही होटल के कमरे का दरवाजा खोलता है, वह सामने खड़े लोगों को देखकर दंग रह जाता है।
उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं क्योंकि सामने और कोई नहीं, बल्कि आर्यमन के माता-पिता, उसका भाई सोहन और भाभी नीलम खड़े थे।
आर्यमन (हैरानी और घबराहट में): "मम्मी, पापा! भैया-भाभी... आप यहाँ? और अवनि कहाँ है?
आपको इस समय तो उसके घर पर होना चाहिए था, पर आप इस होटल में इस तरह अचानक क्यों आ गए? और आप सबके चेहरे इतने उतरे हुए क्यों हैं?"
आर्यमन का सवाल सुनकर वहां सन्नाटा छा गया। सोहन ने अपनी नजरें झुका लीं और नीलम भाभी के चेहरे की वो पुरानी अकड़ अब गायब थी।
आर्यमन के पिता (कांपती आवाज में):
बेटा... सब कुछ खत्म हो गया है! सेठ श्याम सुंदर गोयनका ने हमसे सब रिश्ते तोड़ लिए हैं। उन्होंने अवनि और तेरा रिश्ता एक झटके में खत्म कर दिया है।
उन्होंने साफ़ कह दिया कि जिस खानदान में अपनों की जान बचाने वालों की इज़्ज़त नहीं, वहां उनकी पोती कभी कदम नहीं रखेगी।"
जैसे ही पिता के मुँह से ये शब्द निकले, आर्यमन के कानों में मानो बम फूट पड़ा।
'रिश्ता टूट गया?' यह सुनते ही आर्यमन के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसके शरीर की सारी ताकत जैसे खत्म हो गई और वह पीछे की ओर लड़खड़ाया।
उसका दम घुटने लगा और वह सहारे के लिए पीछे की ओर हुआ और वहीं दरवाजे से सट गया।
उसकी आँखों के सामने अवनि का वह मासूम चेहरा घूमने लगा, उसकी वो ममता भरी देखभाल, उसकी वो सादगी... जिसे उसके परिवार ने महज़ चंद मिनटों के लालच और घमंड में मिट्टी में मिला दिया था।
आर्यमन का गला रुँध गया, उसकी आवाज़ जैसे उसके अंदर ही दब गई। उसने दीवार का सहारा लेकर खुद को गिरने से बचाया।