एपिसोड 68— कहानीकार का नाम
“कहानीकार: अनन्या।”
किताब के पन्ने पर लिखे उन शब्दों को देखकर अनन्या कुछ पल तक बिल्कुल स्थिर खड़ी रही।
उसके आसपास सब कुछ जैसे थम गया था।
नैना की साँसें तेज थीं।
अर्णव के चेहरे पर अविश्वास था।
और माँ...
माँ जमीन पर बैठी काँप रही थी।
अनन्या ने धीरे से किताब उठाई।
“ये झूठ है।”
उसकी आवाज़ धीमी थी।
“मैं कहानीकार नहीं हूँ।”
उसने किताब के पन्ने पलटने शुरू किए।
एक पन्ना।
दूसरा।
तीसरा।
हर पन्ने पर एक ही नाम था।
अनन्या।
फिर अचानक एक पन्ने पर शब्द बदलने लगे।
“कहानीकार वही होता है जो कहानी लिखता है।”
अनन्या ने किताब बंद कर दी।
“मैंने कुछ नहीं लिखा।”
माँ ने काँपती आवाज़ में कहा—
“यही तो समस्या है।”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
माँ ने धीरे से कहा—
“तुमने लिखा नहीं... तुमने कहानी को जन्म दिया था।”
अर्णव आगे बढ़ा।
“माँ, साफ-साफ बोलिए।”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“जिस दिन तुम तीनों पैदा हुए थे, उसी दिन कहानी भी पैदा हुई थी।”
नैना ने परेशान होकर पूछा—
“लेकिन हम तीनों तो अलग-अलग हैं।”
माँ ने सिर हिलाया।
“तुम्हें ऐसा लगता है।”
अनन्या ने किताब को कसकर पकड़ लिया।
“तो सच क्या है?”
माँ ने कुछ कहने की कोशिश की।
लेकिन अचानक कमरे की सारी रोशनी बुझ गई।
अँधेरा।
इतना गहरा कि किसी का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
फिर...
एक आवाज़ आई।
“सच सुनना चाहती हो?”
अनन्या का दिल जोर से धड़का।
वह आवाज़ कबीर की थी।
“कबीर?”
अनन्या ने चारों तरफ देखा।
कोई नहीं था।
फिर आवाज़ आई—
“मैं कहीं गया नहीं हूँ।”
“तो सामने क्यों नहीं आते?”
कुछ सेकंड तक खामोशी रही।
फिर कबीर ने कहा—
“क्योंकि अगर तुम मुझे देखोगी... तो तुम्हें अपना सबसे पहला चेहरा याद आ जाएगा।”
अनन्या के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“मेरा पहला चेहरा?”
“हाँ।”
“वह कैसा था?”
कबीर की आवाज़ धीमी हो गई।
“तुम्हारी माँ के लिखे हुए कागज़ पर बनी एक छोटी-सी लड़की।”
अनन्या की आँखें बंद हो गईं।
और उसी पल उसके दिमाग में एक तस्वीर चमकी।
एक सफेद कमरा।
मेज पर कागज़।
माँ के हाथ में कलम।
और कागज़ पर एक छोटी बच्ची का चित्र।
उस बच्ची के माथे पर एक छोटा-सा काला निशान था।
अनन्या ने अपना माथा छुआ।
वही निशान।
जो उसे बचपन से था।
वह पीछे हट गई।
“ये निशान...”
माँ की आँखें भर आईं।
“वही है।”
“क्या?”
“कहानी का पहला निशान।”
अचानक जमीन के नीचे से आवाज़ आने लगी।
धक...
धक...
धक...
जैसे कोई बहुत नीचे से दरवाज़ा पीट रहा हो।
अर्णव ने चारों तरफ देखा।
“यहाँ कुछ है।”
नैना ने पूछा—
“क्या?”
अर्णव ने फर्श पर हाथ रखा।
“नीचे कोई कमरा है।”
अनन्या ने तुरंत किताब खोली।
एक नया पन्ना सामने था।
उस पर लिखा था—
“जिस कमरे में पहली कहानी लिखी गई थी, वहीं पहला अंत छिपा है।”
अर्णव ने जमीन पर हाथ मारा।
फर्श में दरार पड़ गई।
एक तेज सफेद रोशनी नीचे से निकली।
कुछ ही सेकंड में फर्श का एक हिस्सा खुल गया।
नीचे सीढ़ियाँ थीं।
बहुत पुरानी।
दीवारों पर अनगिनत शब्द लिखे थे।
कुछ मिटे हुए।
कुछ अधूरे।
कुछ ऐसे जिन्हें पढ़ना भी मुश्किल था।
नैना ने नीचे देखा।
“हमें वहाँ जाना चाहिए?”
माँ ने तुरंत कहा—
“नहीं!”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
माँ उठ खड़ी हुई।
“क्योंकि उस कमरे में कहानीकार का जन्म हुआ था।”
अर्णव ने कहा—
“और अगर हमें कहानीकार को ढूँढना है तो वहीं जाना होगा।”
माँ ने सिर हिलाया।
“तुम समझ नहीं रहे।”
“तो समझाइए।”
माँ कुछ पल चुप रही।
फिर उसने कहा—
“कहानीकार कोई इंसान नहीं था।”
अनन्या ने पूछा—
“तो क्या था?”
माँ की आवाज़ काँप गई।
“एक इच्छा।”
“इच्छा?”
“हाँ।”
“किसकी?”
माँ ने अनन्या की तरफ देखा।
“मेरी।”
अनन्या जैसे पत्थर बन गई।
“आपकी?”
माँ की आँखों से आँसू गिरने लगे।
“मैंने तुम्हें खोने के डर से एक कहानी लिखी थी।”
अर्णव ने तुरंत पूछा—
“किसे खोने के डर से?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें।”
अर्णव चुप हो गया।
“उस समय तुम बहुत छोटे थे। भक्षक तुम्हारी कहानी से जुड़ चुका था। मुझे डर था कि वह तुम्हें भी निगल जाएगा।”
अर्णव ने धीरे से पूछा—
“फिर आपने क्या किया?”
माँ ने आँखें बंद कर लीं।
“मैंने एक ऐसी कहानी लिखी जिसमें तुम कभी मर नहीं सकते थे।”
अनन्या ने पूछा—
“और उसी कहानी से कहानीकार पैदा हुआ?”
माँ ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तो?”
“उस कहानी को पूरा करने के लिए मुझे किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो उसके बाहर से उसे देख सके।”
माँ ने अनन्या की तरफ देखा।
“और वह तुम थीं।”
अनन्या की साँस अटक गई।
“मैं?”
“हाँ।”
“लेकिन मैं तो बच्ची थी।”
“तुम बच्ची नहीं थीं, अनन्या।”
कमरे में फिर वही डरावनी खामोशी छा गई।
माँ ने कहा—
“तुम उस कहानी की पहली पाठक थीं।”
नैना ने हैरानी से पूछा—
“पहली पाठक?”
माँ ने सिर हिलाया।
“और जब तुमने पहली बार वह कहानी पढ़ी... कहानी ने तुम्हें पढ़ लिया।”
अनन्या की उँगलियाँ ठंडी पड़ गईं।
“मतलब?”
कबीर की आवाज़ फिर सुनाई दी।
“मतलब यह कि उस दिन से कहानी तुम्हारे अंदर रहने लगी।”
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।
उसके दिमाग में एक के बाद एक यादें चमकने लगीं।
एक किताब।
एक बच्ची।
एक कमरा।
एक आवाज़—
“अगर तुम मुझे पढ़ोगी... तो मैं तुम्हें लिख दूँगा।”
अनन्या ने अचानक अपनी आँखें खोल दीं।
“ये आवाज़...”
कबीर बोला—
“तुम्हें याद आ गया।”
“कौन था?”
कुछ सेकंड की चुप्पी।
फिर कबीर ने कहा—
“मैं।”
अनन्या के चेहरे पर सदमा था।
“तुम?”
“हाँ।”
“लेकिन तुम तो...”
“एक पात्र था।”
“फिर तुम मेरे अंदर कैसे आए?”
कबीर की आवाज़ धीमी हो गई।
“क्योंकि मैंने खुद को तुम्हारी कहानी में लिख दिया था।”
अर्णव ने गुस्से में कहा—
“तुमने ऐसा क्यों किया?”
“क्योंकि मुझे पता था कि कहानीकार तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ेगा।”
नैना ने पूछा—
“तो तुम हमें बचा रहे थे?”
कबीर चुप रहा।
फिर बोला—
“शुरुआत में।”
“और बाद में?”
“बाद में मैं खुद कहानी का हिस्सा बन गया।”
अनन्या की आँखों से आँसू निकल आए।
“तो तुम मेरे दुश्मन नहीं थे?”
कबीर ने कहा—
“नहीं।”
“फिर तुमने इतने रहस्य क्यों छिपाए?”
“क्योंकि अगर तुम्हें सच पहले पता चल जाता... तो तुम कहानीकार बन जातीं।”
अनन्या ने किताब की तरफ देखा।
उस पर अब भी वही शब्द थे—
कहानीकार: अनन्या।
उसने काँपते हुए कहा—
“लेकिन अब मैं बन चुकी हूँ।”
कबीर ने जवाब दिया—
“नहीं।”
“तो किताब पर मेरा नाम क्यों है?”
“क्योंकि कहानीकार ने तुम्हारा नाम चुरा लिया है।”
अनन्या ने पूछा—
“कहाँ है वह?”
कबीर ने कहा—
“तुम्हारे अंदर।”
अनन्या पीछे हट गई।
“क्या?”
“तुम्हारे अंदर एक दूसरा तुम है।”
अचानक अनन्या के सिर में तेज दर्द हुआ।
वह जमीन पर गिर गई।
नैना दौड़कर उसके पास पहुँची।
“अनन्या!”
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।
और फिर...
उसने खुद को एक विशाल कमरे में खड़ा पाया।
कमरे की दीवारें किताबों से बनी थीं।
सामने एक मेज थी।
मेज पर एक लड़की बैठी थी।
वह लड़की बिल्कुल अनन्या जैसी दिखती थी।
लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
वह मुस्कुरा रही थी।
“आखिर तुम आ ही गई।”
अनन्या पीछे हट गई।
“तुम कौन हो?”
लड़की ने कलम उठाई।
“मैं?”
उसने धीरे से अपना चेहरा ऊपर किया।
“मैं वही हूँ... जिसे तुम हर जन्म में भूल जाती हो।”
अनन्या का दिल धड़कना भूल गया।
“आर्या?”
लड़की हँसी।
“नहीं।”
“फिर?”
उसने कलम से मेज पर एक शब्द लिखा—
कहानीकार।
अनन्या ने काँपते हुए पूछा—
“तुम मेरे अंदर हो?”
लड़की ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
फिर वह उठी।
अनन्या के बिल्कुल पास आकर फुसफुसाई—
“तुम मेरे अंदर हो।”
अनन्या की आँखें फैल गईं।
लड़की ने उसका हाथ पकड़ लिया।
और अचानक दोनों के शरीर से सफेद रोशनी निकलने लगी।
उसी क्षण बाहर खड़ी नैना ने चीखते हुए कहा—
“माँ! अनन्या की आँखें...”
माँ ने देखा।
अनन्या की आँखें खुली थीं।
लेकिन उनमें अनन्या नहीं थी।
उसकी आँखें पूरी तरह काली हो चुकी थीं।
और उसके होंठों से एक अजनबी आवाज़ निकली—
“अब कहानी मैं लिखूँगी।”
किताब का आखिरी पन्ना अपने आप खुला।
उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“कहानीकार जाग चुकी है।”
और उसी पल...
कहीं बहुत दूर से कबीर की चीख सुनाई दी—
“अनन्या को बचाओ!”
क्रमशः...