BLAST - EPISODE 3 in Hindi Fiction Stories by Muhib Khan books and stories PDF | BLAST - EPISODE 3

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BLAST - EPISODE 3

नौशाद ने हमदान का कॉलर अपनी मुट्ठी में पूरी ताकत से जकड़ रखा था। उसकी आँखों में दावर के खून का बदला लेने की आग साफ दिख रही थी। लेकिन घुटनों के बल गिरे हमदान के चेहरे पर डर की जगह अचानक एक खौफनाक और ज़हरीली मुस्कान फैल गई।
उसने खांसते हुए खून थूका और मिस्री अरबी में तंज़ कसते हुए कहा:
हमदान मीर:
"نادي على رجالتك كده يا نوشاد... شوف حد فيهم هيرد عليك ولا كلهم بقوا جثث؟"
(Nadi ala regalatak keda ya Naushad... Shoof hadd feehom hayrodd aleek wala kollohom ba'oo gosas?)
हिंदी अनुवाद: "ज़रा अपने आदमियों को पुकार कर तो देख नौशाद... देख कोई जवाब देता है या सब की सब लाशें बन चुके हैं?"
हमदान की बात सुनकर नौशाद का माथा ठनका। उसने तुरंत अपने कान में लगे रेडियो कॉम को ऑन किया और अपनी टीम के कमांडोज़ को कोडनेम से पुकारना शुरू किया।
नौशाद इब्राहिम खान:
"ईगल-वन... रिस्पॉन्ड! विक्रम, पोजीशन रिपोर्ट करो! कबीर... समीर... कोई सुन रहा है? टीम अल्फा, रिपोर्ट स्टेटस!"
रेडियो के उस पार सिर्फ खौफनाक सन्नाटा और हवा की सरसराहट थी। कोई जवाब नहीं आया।
नौशाद को नहीं पता था कि जब वह दावर के पास झुका हुआ था, ठीक उसी वक्त फैक्ट्री के अंधेरे कोनों में घात लगाकर बैठे हमदान के विदेशी स्नाइपर्स और प्राइवेट मर्सिनरीज़ ने साइलेंसर से उसकी पूरी टीम को एक-एक करके मौत के घाट उतार दिया था।
नौशाद का ध्यान एक सेकंड के लिए जैसे ही रेडियो के सन्नाटे पर भटका, हमदान ने अपनी आस्तीन में छिपाया हुआ एक खास टैक्टिकल सिरिंज निकाला।
बिजली की फुर्ती से हमदान ने वह न्यूरोटॉक्सिन केमिकल का इंजेक्शन सीधे नौशाद की गर्दन की नस में घोंप दिया।
नौशाद इब्राहिम खान:
"आहहह!"
नौशाद ने हमदान को पीछे झटका, लेकिन तब तक पूरा हरा केमिकल उसके खून में उतर चुका था। यह कोई आम ज़हर नहीं था, बल्कि एक मिलिट्री-ग्रेड साइको-केमिकल था जो इंसान के दिमाग के सोचने-समझने के हिस्से को सुन्न करके उसके अंदर बेहिसाब, बेकाबू गुस्सा और पागलपन भर देता था।
नौशाद की गर्दन की नसें नीली पड़ने लगीं। उसकी आँखें खून की तरह लाल हो गईं और उसका दिल किसी हथौड़े की तरह सीने में धड़कने लगा। उसका खुद के दिमाग और शरीर पर से कंट्रोल छूटने लगा। बेपनाह गुस्सा और वहशीपन उसकी रग-रग में दौड़ने लगा।
हमदान लड़खड़ाते हुए उठा और पीछे हटकर हंसते हुए मिस्री अरबी में चिल्लाया:
हमदान मीर:
"السم ده هيخليك تفقد عقلك... هتتحول لوحش وتقتل أي حد قدامك، حتى صحابك!"
(El-semm da haykhalleek tef'ed a'lak... Hat-t-hawwel le-wahsh w-te'tel ay hadd oddamak, hatta sohabak!)
हिंदी अनुवाद: "यह ज़हर तेरा दिमाग तबाह कर देगा... तू एक दरिंदा बन जाएगा और अपने सामने आने वाले हर इंसान को मार डालेगा, अपने दोस्तों को भी!"
नौशाद ने अपना सिर दोनों हाथों से पकड़ लिया। उसका दिमाग फट रहा था, और सामने पड़े घायल दावर और भागते हुए हमदान के चेहरे उसे लाल धुंध में तैरते हुए नजर आ रहे थे।

केमिकल के बेकाबू असर और दिमाग पर छाते पागलपन के बीच नौशाद की आँखों के आगे अंधेरा छा गया। उसके हाथ-पैर सुन्न पड़ गए और वह एक भारी धमाके के साथ कंक्रीट के ठंडे फर्श पर बेहोश होकर गिर पड़ा। उसकी रगों में दौड़ता वह हरा ज़हर धीरे-धीरे उसके नर्वस सिस्टम को हाइजैक कर रहा था।
हमदान अपने बचे हुए मर्सिनरीज़ के साथ अपनी खास फाइलों को समेटकर फैक्ट्री के गुप्त रास्ते से भाग निकला, यह सोचकर कि यहाँ अब कोई ज़िंदा नहीं बचेगा।
फैक्ट्री के पिछले हिस्से में, टूटी हुई मशीनों और लाशों के मलबे के बीच अचानक एक हल्की सी हरकत हुई।
नौशाद की टीम का सबसे जांबाज स्नाइपर अज़गर अभी ज़िंदा था। लेकिन उसकी हालत बेहद नाज़ुक थी। उसके जिस्म में चार गोलियां धंसी हुई थीं—दो उसके कंधे में, एक पेट के दाहिने हिस्से में और एक जांघ के आर-पार हो चुकी थी। उसकी वर्दी खून से पूरी तरह भीग चुकी थी और हर सांस के साथ उसके मुंह से दर्द भरी कराह निकल रही थी।


अज़गर ने अपने दांत भींचे और ज़मीन पर रेंगते हुए आगे बढ़ना शुरू किया। फर्श पर उसके खून की एक लंबी लकीर खिंचती जा रही थी। उसकी नजर सामने बेसुध पड़े नौशाद और दूसरी तरफ तड़पते दावर पर पड़ी।
अज़गर किसी तरह घिसटते हुए नौशाद के पास पहुंचा। उसने अपने कांपते, खून से सने हाथ से नौशाद का कंधा हिलाया।
अज़गर:
"सर... सर, आँखें खोलिए... नौशाद सर!"
नौशाद के जिस्म में कोई हरकत नहीं हुई। उसकी सांसें बेहद तेज़ और भारी चल रही थीं, गर्दन की नसें काली-नीली पड़ चुकी थीं और माथे पर ज़हरीला पसीना चमक रहा था। केमिकल ने उसके दिमाग को एक खतरनाक कोमा जैसे ट्रांस में धकेल दिया था, जहाँ से जागने का मतलब सिर्फ अंधाधुंध तबाही और बेकाबू गुस्सा था।
अज़गर ने अपनी धुंधलाती आँखों से पास पड़ी खाली सिरिंज को देखा और समझ गया कि कमांडर के साथ क्या हुआ है।
अज़गर ने अपने कांपते हाथों से अपनी बेल्ट में लगी मेडिकल किट की तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन ज्यादा खून बह जाने की वजह से उसकी अपनी आँखें भी बंद होने लगी थीं।
फैक्ट्री में सिर्फ दो घायल ज़िंदगियां बची थीं—एक चार गोलियों से छलनी अज़गर, और दूसरा अपने ही ज़हन के अंदर कैद होता बेकाबू नौशाद।