Adhuri Kitaab - 2 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 69

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 69

एपिसोड 69— अनन्या के अंदर कौन है?
“अब कहानी मैं लिखूँगी।”
अनन्या के मुँह से निकले इन शब्दों ने पूरे कमरे को जैसे जमा दिया था।
नैना कुछ कदम पीछे हट गई।
अर्णव ने अनन्या को देखा और फिर उसकी माँ की तरफ।
माँ के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
“नहीं...” माँ के होंठ काँपे, “ये नहीं हो सकता।”
नैना ने घबराकर पूछा, “माँ, अनन्या को क्या हो रहा है?”
माँ ने जवाब नहीं दिया।
वह बस अनन्या को देखती रही।
अनन्या वहीं खड़ी थी।
उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
चेहरा शांत था।
लेकिन वह शांति सामान्य नहीं थी।
उसके अंदर कुछ और जाग चुका था।
अर्णव धीरे-धीरे उसके पास जाने लगा।
“अनन्या...”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में कोई पहचान नहीं थी।
अर्णव वहीं रुक गया।
“अनन्या, मेरी तरफ देखो। मैं अर्णव हूँ।”
अनन्या के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
“अर्णव...”
उसने उसका नाम ऐसे दोहराया जैसे पहली बार सुन रही हो।
फिर बोली—
“अंत।”
अर्णव का चेहरा बदल गया।
“क्या?”
“तुम्हें अंत बनना था।”
अनन्या की आवाज़ अब उसकी अपनी आवाज़ नहीं लग रही थी।
“लेकिन तुमने अपनी कहानी से बाहर निकलने की गलती कर दी।”
अर्णव ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
“तुम अनन्या नहीं हो।”
अनन्या ने सिर थोड़ा झुकाया।
“सही कहा।”
नैना की आँखों में आँसू आ गए।
“तो मेरी बहन कहाँ है?”
अनन्या कुछ पल उसे देखती रही।
फिर बोली—
“तुम्हारी बहन?”
उसने किताब की तरफ देखा।
“वह अभी मेरे अंदर बंद है।”
नैना का दिल बैठ गया।
“उसे बाहर निकालो!”
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसने मुझे बहुत सालों तक कैद करके रखा।”
माँ अचानक आगे बढ़ी।
“बस!”
अनन्या की काली आँखें माँ पर टिक गईं।
“आपने मुझे बनाया था।”
माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।
“मैंने तुम्हें नहीं बनाया।”
“झूठ।”
कमरे की दीवारें काँपने लगीं।
“तुमने कागज़ पर एक लड़की बनाई।”
अनन्या ने अपनी उँगली हवा में घुमाई।
अचानक हवा में वही पुराना दृश्य दिखाई दिया।
एक छोटी बच्ची।
माँ की मेज।
कागज़।
कलम।
और माँ की आवाज़—
“तुम्हारा नाम... अनन्या होगा।”
माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैंने उसे बचाने के लिए ऐसा किया था।”
अनन्या ने पूछा—
“किससे?”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
“किससे?”
इस बार कमरे की हर दीवार से वही आवाज़ टकराई।
माँ ने आखिरकार कहा—
“कहानीकार से।”
अनन्या मुस्कुराई।
“और अगर कहानीकार मैं ही हूँ?”
माँ चुप हो गई।
तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ आई।
धक...
धक...
धक...
नैना ने मुड़कर देखा।
सफेद गलियारे के आखिरी दरवाज़े के पास कबीर खड़ा था।
लेकिन वह पहले जैसा नहीं दिख रहा था।
उसके कपड़े स्याही से भीगे हुए थे।
चेहरे पर चोट के निशान थे।
और उसकी हथेली से खून की जगह काली स्याही टपक रही थी।
“कबीर!”
नैना उसकी तरफ दौड़ी।
लेकिन कबीर ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
“पास मत आना।”
“तुम्हें चोट लगी है।”
“ये चोट नहीं है।”
कबीर ने अपनी हथेली दिखाई।
“ये कहानी की स्याही है।”
अर्णव ने पूछा—
“तुम्हारे साथ क्या हुआ?”
कबीर ने अनन्या की तरफ देखा।
“उसने मुझे बाहर फेंक दिया।”
अनन्या ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
कबीर धीरे-धीरे उसके सामने आया।
“अनन्या।”
अनन्या की आँखों में हल्की चमक आई।
“तुम वापस आ गए।”
“हाँ।”
“क्यों?”
“तुम्हें लेने।”
अनन्या हँसी।
“मुझे?”
“हाँ।”
कबीर ने धीरे से कहा—
“क्योंकि असली कहानीकार अभी जागा नहीं है।”
अनन्या का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“तुम फिर वही झूठ बोल रहे हो।”
“नहीं।”
कबीर ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“तुम कहानीकार नहीं हो।”
“तो मैं कौन हूँ?”
कबीर कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर उसने कहा—
“तुम उसकी आवाज़ हो।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
नैना ने पूछा—
“किसकी?”
कबीर ने धीरे से ऊपर देखा।
“उसकी।”
दीवार की छत पर अचानक दरार पड़ गई।
काली स्याही की एक बूंद नीचे गिरी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
कुछ ही पलों में पूरा सफेद कमरा काली स्याही से भरने लगा।
माँ ने चीखकर कहा—
“वह आ गया!”
अर्णव ने पूछा—
“कौन?”
माँ ने काँपते हुए कहा—
“कहानीकार।”
एक गहरी हँसी पूरे कमरे में गूँज उठी।
“तुम लोग अभी तक मुझे ढूँढ रहे थे?”
सबने ऊपर देखा।
छत पर एक विशाल काला चेहरा उभर आया।
उसकी आँखें नहीं थीं।
सिर्फ खाली सफेद जगह।
और उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
“मैं तो तुम्हारे बीच हमेशा से था।”
कबीर ने दाँत भींचे।
“तुमने अपना चेहरा क्यों छिपाया?”
वह आकृति हँसी।
“क्योंकि तुम लोग चेहरों पर भरोसा करते हो।”
फिर उसकी नजर अनन्या पर गई।
“लेकिन वह...”
उसने अनन्या की तरफ इशारा किया।
“वह मुझे पहचानती है।”
अनन्या अचानक अपना सिर पकड़कर जमीन पर गिर पड़ी।
“आह!”
नैना उसके पास दौड़ी।
“अनन्या!”
लेकिन इस बार अनन्या की आँखों में फिर बदलाव आया।
काली परत धीरे-धीरे हटने लगी।
एक पल के लिए उसकी असली आँखें दिखाई दीं।
“नैना...”
नैना रो पड़ी।
“दीदी!”
“मुझे... यहाँ से निकालो।”
नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगी।”
अनन्या ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“वो मेरे अंदर है।”
“कौन?”
“जो कहानी लिखता है।”
नैना ने कबीर की तरफ देखा।
“इसे कैसे बचाएँ?”
कबीर ने तुरंत कहा—
“इसे किताब से अलग करना होगा।”
अर्णव ने किताब उठाई।
“कैसे?”
कबीर ने किताब की तरफ देखा।
“तीन नाम चाहिए।”
“कौन-से तीन?”
“याद।”
उसने अनन्या की तरफ देखा।
“चुनाव।”
उसने नैना की तरफ देखा।
“और अंत।”
उसकी नजर अर्णव पर टिक गई।
अर्णव समझ गया।
“हम तीनों?”
कबीर ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
माँ ने घबराकर कहा—
“नहीं! ऐसा मत करना।”
अर्णव ने पूछा—
“क्यों?”
माँ ने कहा—
“अगर तुम तीनों अपनी असली शक्तियों को एक साथ इस्तेमाल करोगे, तो कहानी का मूल पन्ना खुल जाएगा।”
“और?”
माँ की आवाज़ टूट गई।
“और उसके बाद जो कुछ लिखा है... सब मिट जाएगा।”
नैना ने अनन्या का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
“अगर हम कुछ नहीं करेंगे तो?”
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“तो अनन्या हमेशा के लिए उसके अंदर चली जाएगी।”
नैना की आँखों से आँसू गिरने लगे।
अर्णव ने किताब खोली।
“तो फिर करते हैं।”
माँ ने उसे रोकना चाहा।
“अर्णव—”
“माँ।”
अर्णव ने पहली बार बहुत शांत आवाज़ में कहा—
“आपने हमें बचाने के लिए हमारी कहानियाँ बदल दी थीं।”
उसने अनन्या की तरफ देखा।
“अब हमारी बारी है।”
नैना ने अपना हाथ किताब पर रखा।
अर्णव ने भी।
फिर अनन्या ने काँपते हुए अपनी हथेली किताब के बीच रख दी।
तीनों के हाथ एक साथ छूते ही किताब से तेज रोशनी निकली।
कमरे की दीवारों पर हजारों शब्द दिखाई देने लगे।
पुरानी कहानियाँ।
अधूरी कहानियाँ।
मरे हुए पात्र।
भूले हुए नाम।
सब एक साथ घूमने लगे।
और फिर किताब का एक छिपा हुआ पन्ना खुला।
उस पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—
“पहली कहानी शुरू।”
अचानक अनन्या की आँखें बंद हो गईं।
वह एक दूसरे संसार में पहुँच गई।
वहाँ कोई कमरा नहीं था।
कोई दीवार नहीं।
कोई आसमान नहीं।
सिर्फ एक विशाल सफेद मैदान।
उस मैदान के बीच एक बच्चा बैठा था।
उसके हाथ में कलम थी।
अनन्या धीरे-धीरे उसके पास गई।
“तुम कौन हो?”
बच्चे ने अपना चेहरा ऊपर किया।
अनन्या की साँस रुक गई।
वह बच्चा...
कबीर जैसा दिखता था।
लेकिन बिल्कुल वैसा भी नहीं था।
बच्चे ने मुस्कुराकर पूछा—
“तुम मुझे पहचानती नहीं?”
अनन्या ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
बच्चे ने कहा—
“मैंने तुम्हें पहली बार तब देखा था जब तुम्हारी माँ ने तुम्हें कागज़ पर बनाया था।”
अनन्या ने पूछा—
“तुम कहानीकार हो?”
बच्चे ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“फिर?”
बच्चे ने कलम जमीन पर रख दी।
“मैं उसका बेटा हूँ।”
अनन्या के चेहरे पर सदमा फैल गया।
“किसका?”
बच्चे ने धीरे से पीछे देखा।
सफेद मैदान के दूर एक दरवाज़ा खुल रहा था।
उस दरवाज़े के पीछे एक आदमी खड़ा था।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन उसकी आवाज़ साफ थी—
“मेरी।”
अनन्या पीछे हट गई।
उस आदमी ने कहा—
“बहुत सालों से मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था, अनन्या।”
“तुम कौन हो?”
आदमी ने धीरे-धीरे अपना चेहरा रोशनी में लाया।
अनन्या की आँखें फैल गईं।
वह चेहरा...
उसके पिता का था।
और आदमी मुस्कुराकर बोला—
“मैं तुम्हारा पिता नहीं हूँ।”
उसने हाथ में कलम उठाई।
“मैं हूँ...”
उसकी आवाज़ पूरे संसार में गूँज उठी—
“पहला कहानीकार।”
अनन्या के हाथ से किताब गिर गई।
और उसी क्षण बाहर मौजूद नैना ने देखा—
किताब के पन्ने पर एक नया नाम लिखा जा चुका था।
“अगला पात्र — नैना।”
क्रमशः...