Adhuri Kitaab - 2 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 72

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 72

अधूरी किताब
एपिसोड 72 — कहानीकार का वारिस
अर्णव की आँखों में सुनहरी रोशनी जल उठी।
कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।
नैना डरकर उसके पास गई।
“अर्णव...?”
अर्णव ने उसकी तरफ देखा, लेकिन उसकी आँखों की चमक अभी भी वैसी ही थी।
उसने अपनी हथेली खोली।
उसकी हथेली के बीचों-बीच एक छोटा-सा काला निशान उभर आया था।
ठीक वैसा ही निशान...
जो किताब के पहले पन्ने पर बना हुआ था।
कबीर ने उसे देखते ही पीछे कदम बढ़ा लिया।
“नहीं...”
अर्णव ने उसकी तरफ देखा।
“क्या हुआ?”
कबीर की आवाज काँप रही थी।
“अब सब समझ आ गया।”
अनन्या ने पूछा—
“क्या?”
कबीर ने किताब उठाई और उस तस्वीर की तरफ इशारा किया जिसमें अर्णव का चेहरा बना था।
“तुम्हें कहानी से मिटाया नहीं गया था।”
अर्णव ने कहा—
“तो?”
“तुम्हें छिपाया गया था।”
“किससे?”
कबीर ने धीरे से जवाब दिया—
“कहानीकार से।”
अर्णव की भौंहें सिकुड़ गईं।
“लेकिन अगर मैं उसका वारिस हूँ, तो मुझे उससे छिपाने की जरूरत क्यों पड़ी?”
कबीर ने माँ की तरफ देखा।
“क्योंकि तुम्हारे अंदर वही शक्ति है।”
माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।
अर्णव उनके पास गया।
“माँ... क्या यह सच है?”
माँ ने कुछ पल उसे देखा।
फिर सिर झुका लिया।
“हाँ।”
अर्णव पीछे हट गया।
“तो आपने मुझसे भी झूठ बोला?”
“मैं तुम्हें बचाना चाहती थी।”
“हर बार यही कहती हैं आप।”
उसकी आवाज़ में दर्द था।
“पहले अनन्या से सच छिपाया।”
“फिर नैना से।”
“और अब मुझसे।”
माँ की आँखें भर आईं।
“अगर तुम्हें सच पता चल जाता तो कहानीकार तुम्हें अपने पास बुला लेता।”
अर्णव ने पूछा—
“क्यों?”
माँ ने कहा—
“क्योंकि तुम उसके खून के नहीं... उसकी शक्ति के वारिस हो।”
अर्णव चुप हो गया।
अनन्या ने धीरे से पूछा—
“इसका मतलब क्या है?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“कहानीकार किसी इंसान की तरह पैदा नहीं हुआ था।”
“वह शक्ति थी।”
“जिसे पहली बार तुम्हारे पूर्वजों ने एक कहानी में कैद किया था।”
कबीर ने बात आगे बढ़ाई—
“लेकिन वह शक्ति एक शरीर से दूसरे शरीर में जा सकती थी।”
“और आखिरी बार...”
उसकी नजर अर्णव पर गई।
“वह तुम्हारे अंदर आई।”
अर्णव ने अपनी हथेली को देखा।
काला निशान और गहरा हो चुका था।
अचानक किताब के पन्ने पलटने लगे।
फड़फड़... फड़फड़... फड़फड़...
एक पन्ना आकर रुक गया।
उस पर एक पुरानी तस्वीर थी।
एक परिवार।
बीच में एक आदमी।
उसके पास एक औरत।
और उनके सामने तीन छोटे बच्चे।
अर्णव तस्वीर को देखकर जम गया।
“ये...”
अनन्या ने तस्वीर उसके हाथ से ली।
“तुम इन्हें पहचानते हो?”
अर्णव ने धीरे से कहा—
“हाँ।”
नैना ने हैरानी से पूछा—
“कैसे?”
“ये मेरे सपने में आते थे।”
अनन्या ने तस्वीर ध्यान से देखी।
उस आदमी का चेहरा धुंधला था।
लेकिन उसके हाथ में वही सुनहरी कलम थी।
और उसकी बगल में खड़ी औरत...
अनन्या की माँ जैसी दिख रही थी।
अनन्या ने काँपते हुए पूछा—
“माँ?”
माँ ने तस्वीर देखते ही चेहरा फेर लिया।
अर्णव ने उन्हें पकड़ लिया।
“सच बताइए।”
माँ चुप रहीं।
“यह कौन है?”
माँ की आवाज़ टूट गई।
“तुम्हारे पिता।”
अर्णव की साँस रुक गई।
“मेरे पिता?”
“हाँ।”
“लेकिन मेरे पिता तो...”
वह रुक गया।
उसे बताया गया था कि उसके पिता की मृत्यु बहुत पहले हो चुकी थी।
माँ ने कहा—
“वह मरे नहीं थे।”
अर्णव की आँखों में गुस्सा भर गया।
“तो कहाँ हैं?”
माँ ने धीरे से कहा—
“कहानी के अंदर।”
अचानक कमरे की दीवार पर एक विशाल दरार पड़ गई।
दरार के पीछे एक रास्ता दिखाई देने लगा।
और उस रास्ते के अंत में...
एक बंद कमरा।
कबीर ने उसे देखते ही कहा—
“वही जगह है।”
अनन्या ने पूछा—
“कौन-सी?”
“जहाँ तुम्हारे पिता कैद हैं।”
अर्णव ने बिना कुछ सोचे उस रास्ते की तरफ कदम बढ़ा दिया।
नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अकेले मत जाओ।”
अर्णव ने उसकी तरफ देखा।
“इस बार नहीं।”
“मैं अपने पिता को अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
अनन्या भी उसके साथ हो गई।
“हम सब साथ चलेंगे।”
कबीर ने कहा—
“लेकिन एक बात याद रखना।”
सब उसकी तरफ देखने लगे।
“जो आदमी उस कमरे में बंद है...”
“हो सकता है वह तुम्हारा पिता हो।”
“और हो सकता है...”
कबीर रुक गया।
अर्णव ने पूछा—
“क्या?”
“वह कहानीकार का सबसे खतरनाक रूप हो।”
अर्णव ने जवाब दिया—
“जो भी होगा, इस बार सच सामने आएगा।”
वे चारों उस रास्ते से आगे बढ़े।
माँ भी उनके पीछे चल रही थीं।
रास्ता बेहद संकरा था।
दोनों तरफ दीवारों पर लोगों के नाम लिखे थे।
कुछ नामों पर लाल निशान था।
कुछ पर काली स्याही।
और कुछ नाम पूरी तरह मिटाए जा चुके थे।
अनन्या ने एक नाम पढ़ा।
“रघुनाथ।”
वह रुक गई।
“ये तो वही नाम है...”
कबीर ने कहा—
“वह भी कहानी का पात्र था।”
“लेकिन वह असली इंसान था।”
“था।”
अनन्या ने पूछा—
“फिर उसकी कहानी क्यों मिटाई गई?”
कबीर ने कहा—
“क्योंकि उसने कहानीकार के खिलाफ जाने की कोशिश की थी।”
नैना ने दीवार पर हाथ रखा।
अचानक उसे कुछ महसूस हुआ।
“रुको।”
सब रुक गए।
“यहाँ कोई रो रहा है।”
अर्णव ने दीवार के पास कान लगाया।
सच में...
बहुत धीमी आवाज आ रही थी।
“बचाओ...”
अर्णव ने दीवार पर हाथ मारा।
“कौन है?”
अंदर से आवाज आई—
“अर्णव...”
अर्णव पीछे हट गया।
“ये... मेरे पिता की आवाज है।”
माँ की आँखों में डर उतर आया।
“हमें यहाँ से जाना होगा।”
अर्णव ने गुस्से से कहा—
“नहीं।”
उसने पूरी ताकत से दीवार पर मुक्का मारा।
धड़ाम!
दीवार में दरार पड़ गई।
दूसरी बार उसने हाथ मारा।
धड़ाम!
दीवार टूट गई।
उसके पीछे एक छोटा-सा कमरा था।
कमरे के बीच एक आदमी कुर्सी से बंधा हुआ था।
उसके चारों तरफ काली स्याही की जंजीरें थीं।
उसका चेहरा बहुत कमजोर था।
लेकिन आँखें...
अर्णव जैसी थीं।
“पापा...”
अर्णव की आवाज टूट गई।
उस आदमी ने सिर उठाया।
उसने अर्णव को देखा।
और उसकी आँखों में आँसू आ गए।
“तुम...”
“तुम यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
अर्णव उसके पास गया।
“आपने मुझे क्यों छोड़ा?”
उस आदमी ने जवाब नहीं दिया।
अर्णव ने जंजीरें तोड़ने की कोशिश की।
लेकिन जैसे ही उसने उन्हें छुआ...
उसकी हथेली का निशान चमक उठा।
काली जंजीरें खुद टूटने लगीं।
छन्न!
एक-एक करके सारी जंजीरें जमीन पर गिर गईं।
अर्णव के पिता आज़ाद हो गए।
लेकिन आज़ाद होते ही उन्होंने अर्णव को धक्का देकर पीछे कर दिया।
“दूर रहो!”
अर्णव स्तब्ध रह गया।
“पापा?”
उस आदमी की आँखों में डर था।
“तुम्हारे अंदर उसकी शक्ति जाग चुकी है।”
“किसकी?”
उसने काँपते हुए कहा—
“पहले कहानीकार की।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अर्णव ने कहा—
“मैं कहानीकार नहीं हूँ।”
उसके पिता ने सिर हिलाया।
“मुझे पता है।”
“फिर?”
उन्होंने अनन्या की तरफ देखा।
“लेकिन तुम दोनों मिलकर...”
वह रुक गए।
“क्या?”
उन्होंने धीमे से कहा—
“तुम दोनों कहानीकार को जन्म दे सकते हो।”
अनन्या और अर्णव एक-दूसरे को देखने लगे।
नैना घबरा गई।
“ये कैसे संभव है?”
अर्णव के पिता ने कहा—
“क्योंकि अनन्या कहानी की आवाज़ है।”
“और अर्णव कहानी की शक्ति।”
कबीर ने तुरंत पूछा—
“और नैना?”
अर्णव के पिता की नजर नैना पर गई।
कुछ पल तक वह उसे देखते रहे।
फिर उनकी आँखें फैल गईं।
“नहीं...”
नैना ने पूछा—
“क्या हुआ?”
उन्होंने काँपते हुए कहा—
“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”
नैना पीछे हट गई।
“क्यों?”
उन्होंने कहा—
“क्योंकि तुम कहानी की खाली जगह हो।”
“और खाली जगह में...”
अचानक कमरे की सारी रोशनी बुझ गई।
एक आवाज़ आई—
“सबसे बड़ी शक्ति छिपी होती है।”
कबीर ने तुरंत कहा—
“नैना, पीछे हटो!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
नैना के पैरों के नीचे एक गोल निशान बन चुका था।
उसके चारों तरफ काली स्याही घूमने लगी।
अर्णव ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।
“नैना!”
लेकिन नैना ने उसे रोक दिया।
“नहीं!”
“मुझे जाने दो।”
“क्यों?”
नैना की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“क्योंकि...”
उसने नीचे देखा।
“मुझे याद आ गया है।”
अनन्या ने पूछा—
“क्या?”
नैना ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
उसके चेहरे पर डर नहीं था।
बस एक अजीब-सी शांति थी।
“मैं कभी तुम्हारी बहन नहीं थी।”
अनन्या का दिल टूट गया।
“नैना...”
“मैं कहानीकार की पहली रचना थी।”
कबीर का चेहरा बदल गया।
“नहीं।”
नैना ने उसकी तरफ देखा।
“हाँ, कबीर।”
“और तुम जानते थे।”
कबीर ने नजरें झुका लीं।
अनन्या ने हैरानी से पूछा—
“कबीर?”
कबीर चुप रहा।
नैना की आँखें चमकने लगीं।
“कबीर ने मुझे बचाने के लिए मेरी यादें मिटाई थीं।”
“लेकिन अब...”
उसने अपनी हथेली आगे की।
उस पर वही सुनहरी निशान उभर आया जो अर्णव की हथेली पर था।
अर्णव के पिता ने डरकर कहा—
“दोनों निशान एक साथ नहीं आ सकते।”
अनन्या ने पूछा—
“क्यों?”
उन्होंने जवाब दिया—
“क्योंकि जब शक्ति और खाली कहानी एक साथ मिलती हैं...”
उनकी आवाज काँपने लगी।
“तब तीसरा जन्म होता है।”
अचानक कमरे के बीचों-बीच सुनहरी रोशनी फट पड़ी।
उस रोशनी के अंदर एक आकृति बनने लगी।
पहले सिर।
फिर शरीर।
फिर चेहरा।
अनन्या की साँस रुक गई।
क्योंकि वह चेहरा...
उसी का था।
लेकिन आँखें काली थीं।
वह आकृति मुस्कुराई।
“अब समझ आया?”
“मैं कहानीकार नहीं हूँ।”
“मैं कहानीकार की बेटी हूँ।”
कबीर पीछे हट गया।
“आर्या...”
आकृति ने उसकी तरफ देखा।
“आखिर तुमने मेरा नाम ले ही लिया।”
अनन्या ने काँपते हुए पूछा—
“आर्या कौन है?”
आकृति ने उसकी तरफ देखा।
फिर मुस्कुराकर कहा—
“तुम।”
“लेकिन वह नाम तुम्हारा नहीं था।”
“वह मेरा था।”
अचानक किताब हवा में उठ गई।
उसके पन्ने तेजी से पलटने लगे।
और आखिरी पन्ने पर एक नया वाक्य लिखा गया—
“तीन शक्तियाँ मिल चुकी हैं। अब कहानी का अंतिम द्वार खुलेगा।”
उसके नीचे तीन नाम चमकने लगे—
अनन्या।
अर्णव।
नैना।
और सबसे नीचे...
एक चौथा नाम उभरने लगा।
धीरे-धीरे।
एक-एक अक्षर करके।
कबीर।
कबीर ने किताब को देखा।
उसकी आँखों में डर उतर आया।
“नहीं...”
अर्णव ने पूछा—
“अब क्या?”
कबीर ने धीमे से कहा—
“अब मेरी असली पहचान सामने आने वाली है।”
और उसी क्षण...
किताब का आखिरी पन्ना पूरी तरह काला हो गया।
उस पर सिर्फ एक वाक्य दिखाई दिया—
“कहानीकार अकेला नहीं है।”
क्रमशः...