अधूरी किताब
एपिसोड 73— कबीर का सच
कमरे में पसरा अँधेरा इतना गहरा था कि कुछ पल के लिए किसी को कुछ दिखाई ही नहीं दिया।
फिर किताब के पन्ने पर एक हल्की रोशनी जली।
उस रोशनी में सिर्फ एक वाक्य दिखाई दे रहा था—
“कहानीकार अकेला नहीं है।”
अर्णव की नजर धीरे-धीरे कबीर पर टिक गई।
“इसका मतलब क्या है?”
कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसका चेहरा देखकर ही लग रहा था कि वह कुछ ऐसा जानता है जिसे इतने सालों से सबसे छिपाता आया है।
नैना उसके सामने आकर खड़ी हो गई।
“तुम्हें पता था।”
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
“सब कुछ।”
उसकी आवाज में दर्द था।
“तुम्हें मेरे बारे में पता था। अनन्या के बारे में पता था। अर्णव के बारे में पता था।”
कबीर चुप रहा।
नैना की आँखें भर आईं।
“और फिर भी तुमने हमसे झूठ बोला।”
कबीर ने धीरे से कहा—
“अगर सच बता देता तो तुम तीनों में से कोई भी आज यहाँ खड़ा नहीं होता।”
अर्णव ने गुस्से में पूछा—
“तो अब बताओ।”
“कौन हो तुम?”
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
कुछ सेकंड तक उसकी आँखों में संघर्ष चलता रहा।
फिर उसने अपनी हथेली आगे कर दी।
उसकी हथेली पर एक निशान उभर आया।
लेकिन वह न तो काला था, न सुनहरा।
वह चाँदी जैसा चमक रहा था।
अनन्या की आँखें फैल गईं।
“ये निशान...”
कबीर ने कहा—
“कहानी के रक्षक का निशान।”
अर्णव ने पूछा—
“रक्षक?”
“हाँ।”
“और तुम?”
कबीर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“मैं कहानीकार का बेटा नहीं हूँ।”
“मैं उसका दुश्मन हूँ।”
कमरे में अचानक तेज हवा चलने लगी।
अर्णव ने पूछा—
“फिर तुम इतने सालों से उसके साथ क्यों थे?”
कबीर की नजर अनन्या पर गई।
“क्योंकि मुझे तुम्हारी रक्षा करनी थी।”
अनन्या ने पूछा—
“मेरी?”
“तुम्हारी... और उस कहानी की।”
अचानक अर्णव के पिता ने कमरे के कोने की तरफ देखा।
“बहुत देर हो चुकी है।”
कबीर ने उनकी तरफ देखा।
“आपको पता था?”
उन्होंने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
अर्णव चौंक गया।
“आपको भी?”
उसके पिता ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारी माँ ने मुझे सब बताया था।”
“फिर आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि तुम तैयार नहीं थे।”
अर्णव हँसा।
लेकिन उसकी हँसी में दर्द था।
“सबको लगता है कि मैं तैयार नहीं था।”
“किसी ने मुझे तैयार होने का मौका ही नहीं दिया।”
माँ धीरे-धीरे उसके पास आईं।
“बेटा...”
अर्णव ने हाथ पीछे कर लिया।
“अब नहीं।”
“अब मुझे कोई आधा सच नहीं चाहिए।”
उसकी आवाज भारी हो गई।
“मुझे पूरी कहानी चाहिए।”
कमरे में कुछ पल तक खामोशी रही।
फिर माँ ने कहा—
“ठीक है।”
उन्होंने गहरी साँस ली।
“लेकिन जो सुनोगे... उसके बाद तुम्हारी जिंदगी पहले जैसी नहीं रहेगी।”
अर्णव ने कहा—
“पहले जैसी तो वैसे भी नहीं रही।”
माँ ने किताब की तरफ देखा।
“बहुत साल पहले एक कहानी लिखी गई थी।”
“उस कहानी में चार शक्तियाँ थीं।”
“याद। शक्ति। शून्य। और रक्षा।”
नैना ने पूछा—
“ये चार शक्तियाँ किसके पास थीं?”
माँ ने अनन्या की तरफ देखा।
“यादें... अनन्या के पास।”
फिर अर्णव की तरफ।
“शक्ति... तुम्हारे पास।”
नैना की तरफ देखते हुए उन्होंने कहा—
“शून्य... तुम्हारे पास।”
और अंत में कबीर की तरफ देखा।
“रक्षा... इसके पास।”
नैना ने धीमे से पूछा—
“तो हम चारों...”
कबीर ने कहा—
“एक ही कहानी के चार हिस्से हैं।”
अनन्या ने पूछा—
“लेकिन आर्या?”
माँ चुप हो गईं।
कबीर ने कहा—
“आर्या इन चारों शक्तियों का स्रोत थी।”
अर्णव ने पूछा—
“तो वह कहाँ है?”
कबीर ने जवाब दिया—
“यहीं।”
सबकी नजरें अनन्या पर टिक गईं।
अनन्या का दिल तेज धड़कने लगा।
“मैं?”
कबीर ने सिर हिलाया।
“आर्या कोई दूसरी लड़की नहीं थी।”
“वह तुम्हारी पहली पहचान थी।”
“जब कहानीकार ने तुम्हारा नाम मिटाया, तब तुम्हारी शक्ति अलग हो गई।”
अनन्या ने धीरे से पूछा—
“और फिर?”
“फिर तुम्हें अनन्या बनाया गया।”
नैना ने अचानक कहा—
“इसका मतलब... आर्या वापस आना चाहती है।”
कबीर ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“लेकिन वह सिर्फ तुम्हारा नाम वापस नहीं चाहती।”
“वह तुम्हारा शरीर भी चाहती है।”
अनन्या की साँस अटक गई।
उसी समय किताब अपने आप खुल गई।
एक नया पन्ना सामने आया।
उस पर एक घर बना था।
बहुत पुराना घर।
घर के बाहर तीन पेड़ थे।
अनन्या ने चित्र देखते ही कहा—
“मैं इस जगह को जानती हूँ।”
अर्णव ने पूछा—
“कहाँ है?”
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।
“मुझे नहीं पता।”
लेकिन उसके दिमाग में एक दृश्य उभर चुका था।
वह छोटी थी।
उसके साथ एक बच्ची थी।
नैना।
और उनके सामने एक तीसरी लड़की।
आर्या।
तीनों किसी पुराने घर के सामने खड़ी थीं।
आर्या ने कहा था—
“जब भी हम अलग होंगे, इस जगह वापस आना।”
छोटी अनन्या ने पूछा था—
“अगर हम एक-दूसरे को भूल गए तो?”
आर्या मुस्कुराई थी।
“तो कहानी हमें वापस मिला देगी।”
दृश्य खत्म हो गया।
अनन्या ने आँखें खोल दीं।
“मुझे जगह याद आ गई।”
माँ ने पूछा—
“कहाँ?”
अनन्या ने कहा—
“पुराना हवेली वाला घर।”
माँ का चेहरा अचानक बदल गया।
“नहीं।”
“वहाँ नहीं जाना।”
अर्णव ने पूछा—
“क्यों?”
माँ ने जवाब दिया—
“क्योंकि वहीं से सब शुरू हुआ था।”
कबीर ने कहा—
“और वहीं खत्म भी होगा।”
माँ ने उसे घूरकर देखा।
“तुम्हें नहीं पता कि वहाँ क्या है।”
कबीर ने कहा—
“मुझे पता है।”
“क्योंकि मैं वहाँ था।”
अर्णव ने पूछा—
“कब?”
कबीर कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
“उस रात।”
“जिस रात अनन्या की जिंदगी बदली थी।”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“तुम वहाँ थे?”
“हाँ।”
“तुमने मुझे देखा था?”
“हाँ।”
“और फिर मुझे छोड़ दिया?”
कबीर की आँखों में पछतावा उतर आया।
“मैंने तुम्हें छोड़ा नहीं था।”
“मुझे तुमसे दूर कर दिया गया था।”
“किसने?”
कबीर ने कहा—
“तुम्हारे पिता ने।”
अनन्या स्तब्ध रह गई।
“मेरे पिता?”
कबीर ने सिर हिलाया।
“वह चाहते थे कि तुम कभी अपने अतीत तक न पहुँचो।”
“क्यों?”
“क्योंकि उन्हें पता था कि तुम वापस हवेली पहुँचोगी तो...”
वह रुक गया।
अनन्या ने पूछा—
“तो?”
कबीर ने धीरे से कहा—
“तुम्हें अपनी माँ की मौत का असली कारण पता चल जाएगा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अनन्या के चेहरे से जैसे सारी भावनाएँ गायब हो गईं।
“मेरी माँ की मौत?”
माँ ने आँखें बंद कर लीं।
अनन्या ने उनकी तरफ देखा।
“आप जानती हैं?”
माँ चुप रहीं।
“माँ...”
इस बार उसकी आवाज टूट गई।
“मेरी माँ की मौत हादसा नहीं थी?”
माँ ने सिर उठाया।
उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
“नहीं।”
अनन्या पीछे हट गई।
“तो क्या था?”
माँ ने जवाब देने के लिए होंठ खोले।
लेकिन तभी...
दरवाजा जोर से बंद हो गया।
धड़ाम!
सभी चौंक गए।
काली धुंध कमरे में भरने लगी।
कबीर ने तुरंत कहा—
“वह आ गया।”
अर्णव ने अपनी शक्ति सक्रिय की।
उसकी हथेली से सुनहरी रोशनी निकली।
“कौन?”
कबीर ने कहा—
“कहानीकार नहीं।”
“उससे भी खतरनाक।”
काली धुंध के बीच एक आदमी की आकृति बनने लगी।
चेहरा धीरे-धीरे साफ हुआ।
अनन्या ने उसे देखते ही पहचान लिया।
“पापा...”
लेकिन वह आदमी मुस्कुरा रहा था।
“बहुत देर कर दी तुम लोगों ने।”
अर्णव के पिता ने पीछे हटते हुए कहा—
“तुम यहाँ कैसे आए?”
वह आदमी हँसा।
“क्योंकि कहानी का दरवाजा अब खुल चुका है।”
अनन्या ने गुस्से में कहा—
“तुमने मेरी माँ को क्यों मारा?”
वह आदमी कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर बोला—
“मैंने तुम्हारी माँ को नहीं मारा।”
“तो कौन था?”
उसने धीरे से कहा—
“तुम्हारी माँ ने खुद को बलिदान किया था।”
अनन्या की आँखों में आँसू आ गए।
“किसके लिए?”
उस आदमी ने किताब की तरफ देखा।
“तुम्हारे लिए।”
नैना ने पूछा—
“क्यों?”
उसने जवाब दिया—
“क्योंकि उस रात कहानीकार तुम्हें लेने आया था।”
“तुम्हारी माँ ने उसे रोकने के लिए अपनी जिंदगी दे दी।”
अनन्या की साँसें तेज हो गईं।
“तो आग...”
“हादसा नहीं थी।”
“वह युद्ध था।”
अनन्या की आँखों में पुरानी आग की तस्वीर चमक उठी।
माँ उसे बचाने के लिए दौड़ रही थीं।
लेकिन उस दृश्य में...
एक और बच्ची थी।
नैना।
और उसके पीछे खड़ा था...
कबीर।
अनन्या ने कबीर की तरफ देखा।
“तुम वहाँ थे।”
कबीर ने धीरे से सिर झुका दिया।
“हाँ।”
“और तुमने मेरी माँ को मरते देखा?”
“हाँ।”
“तुमने मुझे क्यों नहीं बचाया?”
कबीर की आँखों में आँसू आ गए।
“क्योंकि उस समय मुझे तुम्हें बचाने और नैना को बचाने में से एक को चुनना पड़ा था।”
नैना का चेहरा बदल गया।
“क्या?”
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“और मैंने तुम्हें चुना।”
अनन्या की आँखों में दर्द उतर आया।
“तो मेरी माँ...”
कबीर ने कहा—
“तुम्हें बचाने के लिए मरी।”
कमरे में एक पल के लिए सब कुछ शांत हो गया।
फिर किताब का पन्ना अपने आप पलटा।
इस बार उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“हवेली में लौटो।”
नीचे चार नाम थे।
अनन्या।
अर्णव।
नैना।
कबीर।
और उनके नीचे...
एक पाँचवाँ नाम धीरे-धीरे उभरने लगा।
अनन्या ने जैसे ही वह नाम पढ़ा, उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
“माँ।”
नैना ने कहा—
“लेकिन माँ तो यहीं हैं।”
सभी ने पीछे देखा।
माँ वहाँ खड़ी थीं।
लेकिन उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
कबीर धीरे-धीरे उनके पास गया।
उसने उनकी आँखों में देखा।
और अचानक पीछे हट गया।
“नहीं...”
अर्णव ने पूछा—
“क्या हुआ?”
कबीर की आवाज काँप रही थी।
“ये तुम्हारी माँ नहीं हैं।”
अनन्या की धड़कन रुक गई।
“क्या?”
कबीर ने उस औरत की तरफ इशारा किया।
“तुम्हारी असली माँ...”
वह रुक गया।
और उसी पल उस औरत का चेहरा बदलने लगा।
त्वचा पर काली दरारें उभर आईं।
आँखें पूरी तरह सफेद हो गईं।
और उसकी आवाज किसी और की थी—
“तुम्हारी असली माँ तो हवेली में तुम्हारा इंतजार कर रही है।”
दरवाजा अपने आप खुल गया।
बाहर वही पुराना रास्ता दिखाई दे रहा था।
और रास्ते के अंत में...
एक हवेली।
जिसकी छत पर आग जल रही थी।
अनन्या ने किताब को कसकर पकड़ लिया।
कबीर ने धीमे से कहा—
“अब कहानी का अगला अध्याय शुरू होगा।”
और हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में...
एक औरत दिखाई दी।
वह अनन्या को देखकर मुस्कुराई।
फिर उसने हाथ उठाया।
उसकी कलाई पर वही निशान था...
जो अनन्या की कलाई पर था।
क्रमशः...