एपिसोड 53— निशाने पर परिवार
अर्जुन के हाथ में फोन था।
स्क्रीन पर वही तस्वीर खुली थी।
उसका छोटा भाई हवेली के बाहर खड़ा था और उसके पीछे रघुवीर चाचा दिखाई दे रहे थे।
तस्वीर बहुत सामान्य लग रही थी।
लेकिन अर्जुन जानता था कि यह सामान्य तस्वीर नहीं थी।
यह एक चेतावनी थी।
एक ऐसी चेतावनी, जिसका मतलब बिल्कुल साफ था—
“हम तुम्हारे परिवार तक पहुंच सकते हैं।”
अर्जुन की मुट्ठियां कस गईं।
रोहन ने उसके चेहरे को देखा।
“क्या हुआ?”
अर्जुन ने फोन उसकी तरफ बढ़ा दिया।
रोहन ने तस्वीर देखी और उसका चेहरा भी गंभीर हो गया।
“ये कब की है?”
“पता नहीं।”
“तुम्हारे भाई को पता है कि रघुवीर उसके आसपास था?”
“नहीं।”
अर्जुन ने तुरंत अपने भाई को फोन किया।
फोन की घंटी बजती रही।
लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया।
अर्जुन के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई देने लगी।
उसने दोबारा कॉल किया।
इस बार फोन उठ गया।
“भैया?”
अर्जुन ने राहत की सांस ली।
“तुम कहां हो?”
“स्कूल जा रहा हूं।”
“अभी?”
“हां। क्यों?”
अर्जुन ने कुछ सेकंड आंखें बंद रखीं।
“कुछ नहीं। स्कूल पहुंचकर मुझे फोन करना।”
“लेकिन हुआ क्या है?”
“बस मेरी बात मानो।”
“ठीक है।”
फोन कट गया।
रोहन ने कहा,
“कम से कम वो ठीक है।”
अर्जुन ने फोन जेब में रखा।
“अभी।”
“क्या मतलब?”
“मुझे नहीं पता रघुवीर अगला कदम कब उठाएगा।”
रोहन ने धीरे से कहा,
“तो फिर हमें उससे पहले उसका खेल खत्म करना होगा।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“मैं आज उससे बात करूंगा।”
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उधर आयत कॉलेज के पुराने पुस्तकालय में बैठी थी।
उसके सामने उसके पिता से जुड़ी वही तस्वीर रखी थी।
तस्वीर के पीछे बना V का निशान उसे लगातार परेशान कर रहा था।
उसने अपने फोन में उस निशान की तस्वीर खींचकर zoom किया।
अचानक उसे निशान के नीचे बहुत हल्के अक्षर दिखाई दिए।
उसने स्क्रीन को और बड़ा किया।
वहां लिखा था—
17 / K / 4
आयत ने अपनी नोटबुक निकाली।
“17... K... 4... इसका मतलब क्या हो सकता है?”
तभी रीवा वहां आ गई।
“तुम यहां अकेली क्या कर रही हो?”
आयत ने तुरंत तस्वीर ढक दी।
“कुछ नहीं।”
रीवा ने भौंहें चढ़ाईं।
“तुम पिछले दो दिन से बिल्कुल बदल गई हो।”
आयत ने उसकी तरफ देखा।
“मेरे पापा के बारे में कुछ ऐसी बातें पता चल रही हैं, जिनके बारे में मुझे कभी बताया ही नहीं गया।”
रीवा कुछ पल चुप रही।
“अर्जुन को पता है?”
आयत ने धीरे से कहा,
“हां।”
“और?”
“हम दोनों साथ में पता लगा रहे हैं।”
रीवा मुस्कुराई।
“तो फिर डर किस बात का?”
आयत की आंखें झुक गईं।
“डर इस बात का है कि कहीं सच इतना बुरा न हो कि हम सब एक-दूसरे से दूर हो जाएं।”
रीवा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“सच्चा रिश्ता सच से नहीं टूटता।”
आयत हल्का-सा मुस्कुराई।
लेकिन उसके मन में एक सवाल अभी भी था—
उसके पिता ने उससे आखिर क्या छिपाया था?
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दोपहर में अर्जुन अस्पताल की पार्किंग में खड़ा रघुवीर का इंतजार कर रहा था।
कुछ देर बाद वही काली कार वहां आकर रुकी।
रघुवीर बाहर निकला।
उसने अर्जुन को देखते ही हल्की मुस्कान दी।
“अर्जुन बाबू, आप यहां?”
अर्जुन सीधा उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।
“हमें बात करनी है।”
“जरूर।”
“अकेले।”
रघुवीर ने आसपास देखा।
“ठीक है।”
दोनों पार्किंग के एक शांत हिस्से में चले गए।
अर्जुन ने अपना फोन निकाला और तस्वीर रघुवीर के सामने कर दी।
“ये तस्वीर कब की है?”
रघुवीर ने तस्वीर देखी।
कुछ सेकंड बाद बोले—
“कौन-सी तस्वीर?”
“आप मेरे भाई के साथ क्या कर रहे थे?”
रघुवीर ने आश्चर्य का नाटक किया।
“मैं? आपके भाई के साथ?”
“झूठ मत बोलिए।”
अर्जुन की आवाज में गुस्सा था।
रघुवीर ने शांत स्वर में कहा,
“अर्जुन, मैं आपके परिवार के साथ बचपन से हूं। आपके भाई से मिलना कोई अपराध नहीं है।”
“लेकिन आपने मुझे बताया क्यों नहीं?”
“क्या हर बात बताना जरूरी है?”
अर्जुन ने उनकी आंखों में देखते हुए कहा—
“जब बात मेरे परिवार की हो, तब हां।”
रघुवीर की मुस्कान गायब हो गई।
“आप मुझ पर शक कर रहे हैं?”
“हां।”
कुछ सेकंड दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर रघुवीर ने धीमी आवाज में कहा—
“शक बहुत खतरनाक चीज है, अर्जुन।”
“और विश्वासघात उससे भी ज्यादा।”
रघुवीर के चेहरे पर पहली बार तनाव दिखाई दिया।
“आपको जो समझना है समझिए।”
“मैं समझूंगा।”
अर्जुन उनके करीब आया।
“और इस बार सच सामने लाकर रहूंगा।”
रघुवीर बिना जवाब दिए वहां से चले गए।
लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।
जैसे अर्जुन का उनसे सामना करना भी उनकी योजना का हिस्सा हो।
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शाम को सभी छात्र हॉस्टल के कॉमन हॉल में बैठे थे।
Rohan, Samer और Karan एक तरफ बैठे थे।
Sanaya भी वहीं थी।
Rohan ने अर्जुन की तरफ देखा।
“क्या हुआ?”
“रघुवीर से बात की।”
“उसने क्या कहा?”
“कुछ नहीं।”
“मतलब?”
“मतलब उसने वही कहा जो कोई दोषी आदमी कहता है—कुछ भी साफ नहीं।”
Karan ने पूछा,
“अब?”
अर्जुन ने कहा,
“अब हमें पुराने रिकॉर्ड ढूंढने होंगे।”
Sanaya ने पहली बार बातचीत में हिस्सा लिया।
“किस चीज के रिकॉर्ड?”
सबकी नजर उसकी तरफ गई।
अर्जुन ने कुछ पल सोचा।
फिर बोला,
“नासिर खान।”
आयत का नाम सुनते ही Sanaya चौंक गई।
“आयत के पिता?”
“हां।”
Sanaya ने धीरे से कहा,
“मेरे पापा के अस्पताल में कुछ पुराने रिकॉर्ड हैं।”
अर्जुन तुरंत उसकी तरफ मुड़ा।
“तुम्हें यकीन है?”
“हां। बचपन में मैंने पापा की स्टडी में कुछ फाइलें देखी थीं। उन पर A-27 लिखा हुआ था।”
Rohan ने तुरंत कहा,
“तो हमें वहां जाना होगा।”
Sanaya ने कहा,
“लेकिन पापा किसी को वो रिकॉर्ड देखने नहीं देंगे।”
Rohan कुछ सोचने लगा।
“तो फिर चोरी नहीं करेंगे। रास्ता निकालेंगे।”
Karan ने मजाक में कहा,
“वाह, अपराध करने से पहले नैतिकता याद आ गई।”
Rohan ने उसे घूरा।
“मजाक का समय नहीं है।”
Karan ने हाथ उठा दिए।
“ठीक है, भाई।”
तभी अर्जुन ने देखा कि आयत चुपचाप बैठी हुई थी।
वह उसके पास गया।
“तुम ठीक हो?”
आयत ने सिर हिलाया।
“हां।”
“कुछ मिला?”
आयत ने उसे तस्वीर दिखाई।
“ये निशान।”
अर्जुन ने तस्वीर हाथ में ली।
उसने उसे ध्यान से देखा।
फिर अचानक उसकी आंखें फैल गईं।
“17/K/4...”
आयत ने पूछा,
“तुम जानते हो?”
“ये कोई तारीख नहीं है।”
“तो?”
अर्जुन ने कहा,
“ये हमारे पुराने मेडिकल रिकॉर्ड का कोड है।”
आयत चौंक गई।
“मतलब?”
“17 मतलब केस नंबर। K मतलब कानपुर। 4 मतलब चौथा रिकॉर्ड सेक्शन।”
आयत ने तुरंत पूछा—
“तो मेरे पापा का रिकॉर्ड कानपुर में था?”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“शायद।”
लेकिन तभी Rohan ने धीरे से कहा—
“नहीं।”
सब उसकी तरफ देखने लगे।
“क्या?”
Rohan ने अपना फोन निकाला।
“मुझे आज फिर मैसेज मिला।”
उसने स्क्रीन सबको दिखाई।
मैसेज में लिखा था—
“A-27 की शुरुआत कानपुर में हुई थी... लेकिन उसका अंत लखनऊ में नहीं हुआ।”
नीचे एक लोकेशन थी।
आगरा।
सभी एक-दूसरे को देखने लगे।
अर्जुन ने कहा,
“आगरा?”
Rohan ने सिर हिलाया।
“हां।”
Karan बोला,
“मतलब अब कहानी तीन शहरों तक पहुंच गई?”
अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी नजर आयत पर थी।
आयत भी उसे ही देख रही थी।
दोनों समझ चुके थे कि मामला अब सिर्फ उनके परिवारों का नहीं रहा।
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रात में अर्जुन अपने कमरे में बैठा था।
उसने दादाजी की पुरानी डायरी फिर से खोली।
कई पन्ने देखने के बाद उसे एक लाइन मिली—
“कानपुर—शुरुआत।”
उसके नीचे—
“लखनऊ—धोखा।”
और आखिरी लाइन—
“आगरा—सच्चाई।”
अर्जुन की धड़कन तेज हो गई।
तभी कमरे का दरवाजा खुला।
आयत अंदर आई।
“तुम अभी तक सोए नहीं?”
“नहीं।”
आयत उसके पास आकर बैठ गई।
“मुझे भी नींद नहीं आ रही थी।”
अर्जुन ने डायरी उसकी तरफ कर दी।
आयत ने तीनों लाइनें पढ़ीं।
“तो हमें आगरा जाना होगा।”
“हां।”
“लेकिन हमारी ट्रेनिंग अभी खत्म नहीं हुई।”
अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“तो फिर ट्रेनिंग के साथ-साथ सच भी ढूंढेंगे।”
आयत ने उसकी तरफ देखा।
“तुम हमेशा इतना मुश्किल रास्ता क्यों चुनते हो?”
“क्योंकि आसान रास्ते पर अक्सर सच नहीं मिलता।”
आयत मुस्कुराई।
“और अगर सच बहुत दर्दनाक हुआ?”
अर्जुन ने उसकी आंखों में देखा।
“तो दर्द अकेले नहीं सहोगी।”
आयत की आंखें नम हो गईं।
“तुम्हारे साथ रहना शायद मेरी सबसे बड़ी गलती है।”
अर्जुन ने पूछा,
“क्यों?”
आयत मुस्कुराई।
“क्योंकि अब तुम्हारे बिना रहना मुश्किल लगने लगा है।”
अर्जुन कुछ पल उसे देखता रहा।
दोनों के बीच खामोशी छा गई।
लेकिन तभी अर्जुन का फोन बजा।
एक अनजान नंबर।
उसने कॉल उठाई।
दूसरी तरफ भारी आवाज आई—
“आगरा जाने की जरूरत नहीं है।”
अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।
“कौन बोल रहा है?”
“जिसे तुम ढूंढ रहे हो, वह तुम्हें ढूंढ रहा है।”
“रुद्रा?”
दूसरी तरफ हल्की हंसी सुनाई दी।
फिर आवाज आई—
“रुद्रा कोई नाम नहीं... एक पहचान है।”
अर्जुन ने पूछा—
“तुम कौन हो?”
जवाब आया—
“जिसे तुम अपना दुश्मन समझ रहे हो... वही तुम्हें तुम्हारे परिवार से बचा रहा है।”
कॉल कट गया।
अर्जुन और आयत एक-दूसरे को देखते रह गए।
आयत ने धीमे से पूछा—
“क्या कहा उसने?”
अर्जुन ने फोन नीचे रखा।
“अब कुछ भी वैसा नहीं है जैसा हमें लगता था।”
उसी वक्त हवेली के एक बंद कमरे में रघुवीर खड़ा था।
उसके सामने एक पुराना फोटो एलबम खुला था।
उसने एक तस्वीर निकाली।
तस्वीर में एक जवान रघुवीर था।
उसके साथ खड़ा था—
विक्रम वशिष्ठ।
अर्जुन के दादाजी।
और उनके बीच खड़ा एक तीसरा आदमी।
रघुवीर ने तस्वीर को देखते हुए कहा—
“अर्जुन... तुम जिस रुद्रा को ढूंढ रहे हो, अगर तुमने उसका सच जान लिया... तो तुम्हें अपने दादाजी से नफरत हो जाएगी।”
वह तस्वीर वापस एलबम में रखने ही वाला था कि पीछे से किसी ने कहा—
“क्या अर्जुन को सब पता चल गया?”
रघुवीर पलटा।
दरवाजे पर एक औरत खड़ी थी।
रघुवीर ने उसे देखकर कहा—
“अभी नहीं।”
औरत ने पूछा—
“तो फिर?”
रघुवीर की आंखों में अजीब चमक आई।
“अब उसे आगरा जाने देना होगा।”
“क्यों?”
रघुवीर मुस्कुराया।
“क्योंकि आगरा में उसे रुद्रा नहीं मिलेगा...”
वह कुछ पल रुका।
फिर बोला—
“उसे अपने पिता की आखिरी निशानी मिलेगी।”
जारी रहेगा...