Namumkin Ishq in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | नामुमकिन इश्क - एपिसोड 54

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नामुमकिन इश्क - एपिसोड 54

एपिसोड 54— आगरा की निशानी

सुबह के करीब सात बजे थे।

सिटी हॉस्पिटल के हॉस्टल में अभी ज्यादातर छात्र सो रहे थे, लेकिन अर्जुन की आंखों में नींद का नाम तक नहीं था।

वह रातभर अपने दादाजी की डायरी के उन्हीं तीन शब्दों को देखता रहा था—

कानपुर — शुरुआत।

लखनऊ — धोखा।

आगरा — सच्चाई।

उसके सामने कुर्सी पर आयत बैठी थी।

उसके हाथ में वही पुरानी तस्वीर थी, जिसमें उसके पिता नासिर खान के साथ एक अनजान आदमी खड़ा था।

आयत ने धीरे से पूछा,

“क्या तुम्हें लगता है कि हमें सच में आगरा जाना चाहिए?”

अर्जुन ने डायरी बंद करते हुए कहा,

“हां।”

“लेकिन हम यहां ट्रेनिंग के लिए आए हैं। बिना किसी को बताए आगरा जाना ठीक होगा?”

“हम भागकर नहीं जाएंगे।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“अगर कोई जरूरी काम है तो कॉलेज से permission लेंगे।”

आयत ने हल्की मुस्कान दी।

“तुम हर चीज इतनी आसानी से कैसे संभाल लेते हो?”

“आसानी से नहीं संभालता।”

अर्जुन कुछ पल चुप रहा।

“बस चेहरे पर दिखने नहीं देता।”

आयत उसे देखने लगी।

उसे पहली बार महसूस हुआ कि अर्जुन जितना मजबूत दिखाई देता है, उसके अंदर उतनी ही उथल-पुथल चलती रहती है।

आयत ने धीरे से कहा,

“तुम्हें डर लगता है?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“हां।”

“किससे?”

“तुम्हें खोने से।”

आयत की आंखें झुक गईं।

कुछ पल दोनों चुप रहे।

फिर अर्जुन ने माहौल हल्का करने के लिए कहा,

“अब चलो। अगर ऐसे ही बैठे रहे तो अस्पताल पहुंचने में देर हो जाएगी।”

आयत मुस्कुरा दी।

“ठीक है, डॉक्टर साहब।”

---

करीब आधे घंटे बाद दोनों अस्पताल पहुंच गए।

बाकी छात्र भी अपनी-अपनी ड्यूटी में लग चुके थे।

आज अर्जुन को Emergency Unit में ड्यूटी मिली थी।

आयत भी उसी के साथ थी।

कुछ देर तक दोनों मरीजों को संभालने में व्यस्त रहे।

तभी अचानक एक बुजुर्ग आदमी को स्ट्रेचर पर लाया गया।

उसके साथ कोई नहीं था।

नर्स ने कहा,

“इनका accident हुआ है।”

अर्जुन तुरंत मरीज के पास पहुंचा।

“BP?”

“बहुत कम।”

“IV line लगाओ।”

आयत ने तुरंत काम शुरू किया।

मरीज बेहोश था।

अर्जुन ने उसकी जांच की।

“हमें अभी treatment शुरू करना होगा।”

कुछ देर की कोशिश के बाद मरीज की हालत स्थिर होने लगी।

आयत ने राहत की सांस ली।

तभी मरीज की आंखें थोड़ी खुलीं।

उसने सामने अर्जुन को देखा।

कुछ सेकंड तक वह उसे घूरता रहा।

फिर अचानक उसने अर्जुन की कलाई पकड़ ली।

“वशिष्ठ...”

अर्जुन चौंक गया।

“आप मुझे जानते हैं?”

बुजुर्ग ने मुश्किल से कहा—

“तुम... विक्रम वशिष्ठ के पोते हो?”

अर्जुन का चेहरा बदल गया।

“हां।”

मरीज ने आयत की तरफ देखा।

फिर उसकी नजर उसके गले के लॉकेट पर टिक गई।

उसकी आंखें अचानक फैल गईं।

“ये... ये तुम्हारे पास कैसे आया?”

आयत घबरा गई।

“आप मेरे लॉकेट को जानते हैं?”

बुजुर्ग ने आंखें बंद कर लीं।

“नासिर...”

आयत का दिल जोर से धड़कने लगा।

“आप मेरे पापा को जानते थे?”

बुजुर्ग ने कुछ बोलने की कोशिश की।

लेकिन उसकी हालत फिर बिगड़ गई।

नर्स ने तुरंत डॉक्टर को बुलाया।

अर्जुन और आयत पीछे हट गए।

कुछ मिनट बाद डॉक्टर ने कहा,

“अभी इन्हें आराम चाहिए।”

अर्जुन ने आयत की तरफ देखा।

दोनों समझ चुके थे—

यह आदमी कोई सामान्य मरीज नहीं था।

---

दोपहर तक बुजुर्ग की हालत स्थिर हो गई।

अर्जुन उसके पास फिर गया।

इस बार वह होश में था।

“आपका नाम?”

“हरिशंकर।”

“आप मेरे दादाजी को जानते थे?”

हरिशंकर ने धीमे से सिर हिलाया।

“बहुत अच्छे से।”

“और मेरे पिता?”

हरिशंकर कुछ सेकंड चुप रहे।

“तुम्हारे पिता नहीं... नासिर खान।”

आयत आगे बढ़ी।

“मेरे पापा के बारे में आपको क्या पता है?”

हरिशंकर ने उसकी तरफ देखा।

“तुम... नासिर की बेटी हो?”

आयत की आंखों में आंसू आ गए।

“हां।”

हरिशंकर ने लंबी सांस ली।

“तो फिर शायद समय आ गया है कि तुम्हें कुछ बताया जाए।”

अर्जुन और आयत दोनों उसके पास बैठ गए।

हरिशंकर ने कहा,

“पंद्रह साल पहले नासिर और विक्रम वशिष्ठ एक साथ एक medical project पर काम कर रहे थे।”

अर्जुन ने पूछा,

“कौन-सा project?”

हरिशंकर ने उसकी तरफ देखा।

“A-27।”

आयत की उंगलियां कांपने लगीं।

“लेकिन A-27 आखिर था क्या?”

हरिशंकर ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

“ये कोई साधारण medical file नहीं थी।”

“तो?”

“ये एक research project था... जिसे बाद में बंद कर दिया गया।”

अर्जुन ने पूछा,

“क्यों?”

हरिशंकर की आंखों में डर दिखाई दिया।

“क्योंकि उस project के पीछे ऐसे लोग थे, जिनसे टकराना आसान नहीं था।”

आयत ने पूछा,

“रुद्रा?”

हरिशंकर अचानक चुप हो गए।

अर्जुन ने गौर किया।

“आप रुद्रा को जानते हैं?”

हरिशंकर ने कोई जवाब नहीं दिया।

कुछ सेकंड बाद उन्होंने अपनी जेब में हाथ डाला।

वहां से एक छोटी-सी चाबी निकाली।

“नासिर ने मुझे ये दी थी।”

आयत ने चाबी को देखा।

“ये किसकी है?”

“आगरा में एक पुराने लॉकर की।”

अर्जुन ने चाबी हाथ में ली।

उस पर सिर्फ एक नंबर लिखा था—

27

अर्जुन और आयत एक-दूसरे को देखने लगे।

हरिशंकर ने कहा,

“नासिर ने कहा था कि अगर कभी उसकी बेटी सच जानना चाहे... तो ये चाबी उसे दे देना।”

आयत की आंखों से आंसू निकल आए।

“उन्होंने मेरे लिए इसे छोड़ा था?”

“हां।”

“लेकिन आपने इतने सालों तक मुझे ढूंढा क्यों नहीं?”

हरिशंकर ने नजरें झुका लीं।

“क्योंकि मुझे डर था।”

“किससे?”

हरिशंकर ने धीमी आवाज में कहा—

“रुद्रा से।”

---

उधर अस्पताल की कैंटीन में रोहन बैठा था।

उसके सामने समर और करण बैठे थे।

रोहन बार-बार फोन देख रहा था।

समर ने पूछा,

“क्या हुआ?”

“अर्जुन और आयत फिर कुछ छिपा रहे हैं।”

करण ने कहा,

“तुझे हर चीज में शक क्यों होता है?”

रोहन ने उसे घूरा।

“क्योंकि जब भी कुछ बड़ा होता है, दोनों गायब हो जाते हैं।”

समर ने पूछा,

“तो तू क्या करेगा?”

रोहन कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला,

“उनका पीछा करूंगा।”

करण ने हैरानी से कहा,

“मतलब?”

“अगर वो आगरा जाएंगे तो मैं भी जाऊंगा।”

समर ने सिर पकड़ लिया।

“भाई, ये मेडिकल ट्रेनिंग है, जासूसी नहीं।”

रोहन मुस्कुराया।

“कभी-कभी जिंदगी दोनों करवाती है।”

---

शाम को अर्जुन ने कॉलेज के प्रिंसिपल शर्मा से बात की।

“सर, हमें एक जरूरी काम से आगरा जाना है।”

प्रिंसिपल ने हैरानी से पूछा,

“ट्रेनिंग के बीच?”

अर्जुन ने सारी बात नहीं बताई।

“एक मरीज से जुड़ा पुराना medical record है। शायद हमारे training project के लिए भी जरूरी हो सकता है।”

प्रिंसिपल ने कुछ सोचकर कहा,

“ठीक है। लेकिन अकेले मत जाना। दो छात्र और साथ ले जाना।”

अर्जुन ने तुरंत कहा,

“जी सर।”

आयत भी उसके साथ थी।

वह बाहर आई तो बोली,

“अब दो छात्र और कौन?”

अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा,

“मुझे पता है।”

आयत ने पूछा,

“कौन?”

पीछे से आवाज आई—

“मैं।”

दोनों पलटे।

रोहन खड़ा था।

आयत चौंक गई।

“तुम?”

रोहन ने कहा,

“हां। मैं भी चलूंगा।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें कैसे पता चला?”

रोहन मुस्कुराया।

“तुम्हें लगता है तुम दोनों ही समझदार हो?”

अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।

रोहन ने आगे कहा,

“और वैसे भी, अगर बात A-27 की है तो मैं भी इस मामले का हिस्सा हूं।”

आयत ने अर्जुन की तरफ देखा।

अर्जुन ने कुछ पल सोचा।

फिर बोला,

“ठीक है।”

लेकिन अर्जुन के मन में एक बात थी—

रोहन पर भरोसा किया जा सकता है या नहीं?

---

अगली सुबह तीनों आगरा के लिए निकल पड़े।

लगभग तीन घंटे बाद वे पुराने शहर के एक इलाके में पहुंचे।

हरिशंकर ने जो पता दिया था, वह एक पुरानी इमारत का था।

इमारत बाहर से बंद थी।

दरवाजे पर जंग लगी हुई थी।

अर्जुन ने चाबी निकाली।

उस पर लिखा नंबर फिर देखा।

27

दरवाजे के अंदर एक छोटा-सा कमरा था।

कमरे के अंदर लोहे के कई लॉकर लगे थे।

अर्जुन ने नंबर ढूंढना शुरू किया।

कुछ ही देर बाद उसे लॉकर नंबर 27 मिल गया।

उसने चाबी लगाई।

क्लिक।

लॉकर खुल गया।

अंदर एक छोटा बॉक्स था।

आयत ने कांपते हाथों से उसे उठाया।

बॉक्स खोलते ही अंदर कुछ कागज, एक पुराना मोबाइल और एक तस्वीर मिली।

तस्वीर देखकर आयत की सांस रुक गई।

उसमें उसके पिता नासिर थे।

लेकिन उनके साथ खड़ा था—

अर्जुन का दादाजी विक्रम वशिष्ठ।

और उनके पीछे...

एक तीसरा आदमी।

रोहन ने तस्वीर हाथ में ली।

उसका चेहरा अचानक बदल गया।

“ये...”

अर्जुन ने पूछा,

“क्या हुआ?”

रोहन ने तस्वीर की तरफ इशारा किया।

“ये आदमी मेरे पिता के पुराने business partner थे।”

अर्जुन ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

फिर तस्वीर के पीछे कुछ लिखा दिखाई दिया।

उसने पढ़ा—

“अगर मैं वापस नहीं आया, तो समझना रुद्रा हमारे बीच ही है।”

आयत के हाथ कांपने लगे।

“हमारे बीच?”

अर्जुन ने तुरंत पीछे देखा।

कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आ रही थी।

एक...

दो...

तीन...

कदम।

फिर दरवाजा धीरे-धीरे खुला।

तीनों की नजर दरवाजे पर टिक गई।

एक आदमी अंदर आया।

चेहरा देखते ही रोहन पीछे हट गया।

“पापा...?”

राघव मेहरा सामने खड़े थे।

उनकी नजर सबसे पहले अर्जुन पर गई।

फिर आयत पर।

और आखिर में उस बॉक्स पर।

उनका चेहरा बदल गया।

उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा—

“तुम लोगों को ये बॉक्स नहीं खोलना चाहिए था।”

अर्जुन आगे बढ़ा।

“क्यों?”

राघव ने जवाब नहीं दिया।

रोहन ने गुस्से में पूछा—

“पापा, आप यहां क्या कर रहे हैं?”

राघव ने अपने बेटे की तरफ देखा।

फिर कहा—

“क्योंकि रुद्रा को ढूंढने की कोशिश मत करो।”

अर्जुन की आंखें सिकुड़ गईं।

“क्यों?”

राघव ने सीधे अर्जुन की आंखों में देखा।

और फिर जो कहा, उसे सुनकर तीनों के पैरों तले जमीन खिसक गई—

“क्योंकि रुद्रा मर चुका है।”

अर्जुन ने तुरंत पूछा—

“तो फिर इतने सालों से हमें कौन धमका रहा है?”

राघव के चेहरे पर डर उतर आया।

उन्होंने सिर्फ एक बात कही—

“यही तो सबसे बड़ा सवाल है... अगर रुद्रा मर चुका है, तो फिर उसके नाम से तुम्हें मैसेज कौन भेज रहा है?”

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

और उसी पल—

अंदर रखा पुराना मोबाइल अपने आप चालू हो गया।

स्क्रीन पर सिर्फ एक शब्द लिखा था—

RUDRA

फिर फोन से एक आवाज आई—

“मैं मरा नहीं हूं।”

तीनों के चेहरे पर डर जम गया।

जारी रहेगा...