एपिसोड 56— तस्वीर में कैद सच
आयत के हाथ कांप रहे थे।
उसकी नजर मोबाइल की स्क्रीन पर जमी हुई थी।
स्क्रीन पर वही तस्वीर थी।
एक घर के बाहर खड़ा एक आदमी...
और चेहरा बिल्कुल उसके पिता नासिर खान जैसा।
आयत ने कांपती आवाज में कहा,
“ये मेरे पापा हैं...”
अर्जुन कुछ नहीं बोला।
वह तस्वीर को लगातार zoom करके देख रहा था।
आदमी का चेहरा साफ था।
बाल...
आंखें...
चेहरे की बनावट...
सब कुछ नासिर खान जैसा था।
लेकिन अर्जुन के दिमाग में एक सवाल बार-बार घूम रहा था।
अगर नासिर जिंदा थे, तो इतने सालों से कहां थे?
आयत ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अर्जुन... मेरे पापा जिंदा हैं।”
“हो सकता है।”
“हो सकता है नहीं।”
आयत की आंखों से आंसू बहने लगे।
“मैं उन्हें पहचानती हूं।”
अर्जुन ने धीरे से कहा,
“मैं जानता हूं।”
“तो फिर हमें अभी उनके घर जाना चाहिए।”
“नहीं।”
आयत ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
“क्योंकि यही वो चाहते हैं।”
“कौन?”
“जिसने ये फोटो भेजी है।”
अर्जुन ने फोन स्क्रीन की तरफ देखते हुए कहा,
“वो हमें जल्दी में कोई गलती करवाना चाहता है।”
आयत चुप हो गई।
अर्जुन ने फिर कहा,
“पहले हमें पता करना होगा कि ये तस्वीर कब की है।”
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सुबह के पांच बज रहे थे।
आयत को बिल्कुल नींद नहीं आई।
वह बार-बार वही तस्वीर देख रही थी।
उसके मन में सिर्फ एक ही बात थी—
पापा जिंदा हैं।
उसने अपने कमरे की अलमारी खोली।
एक पुराना डिब्बा बाहर निकाला।
उसमें उसके पिता की कुछ चीजें थीं।
एक पुरानी घड़ी।
कुछ तस्वीरें।
एक पेन।
और एक छोटा-सा कागज।
आयत ने कागज खोला।
उस पर उसके पिता की लिखावट थी।
सिर्फ एक लाइन—
“अगर कभी तुम्हें लगे कि मैं मर चुका हूं, तो समझना कि मैंने खुद को छिपाया है।”
आयत की आंखें फैल गईं।
“पापा...”
उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।
आयत ने जल्दी से कागज छिपा दिया।
“कौन?”
बाहर से रीवा की आवाज आई।
“मैं हूं।”
आयत ने दरवाजा खोला।
रीवा ने उसे देखते ही पूछा,
“तुम पूरी रात सोई नहीं?”
आयत ने कुछ नहीं कहा।
रीवा ने उसके चेहरे को देखा।
“फिर वही मामला?”
आयत ने आखिरकार फोन उसकी तरफ बढ़ा दिया।
“ये देखो।”
रीवा ने तस्वीर देखी।
उसकी आंखें भी फैल गईं।
“ये तो...”
“हां।”
“लेकिन तुम्हारे पापा...”
“सब कहते हैं कि वो मर चुके हैं।”
रीवा कुछ सेकंड तक चुप रही।
फिर बोली,
“अगर ये सच है तो तुम्हारे पापा खुद को छिपाकर क्यों रखेंगे?”
आयत ने धीमे से कहा,
“शायद किसी से बचने के लिए।”
रीवा ने पूछा,
“किससे?”
आयत ने जवाब दिया—
“रुद्रा से।”
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सुबह छह बजे अर्जुन आगरा जाने की तैयारी कर रहा था।
उसने बाइक निकाली ही थी कि पीछे से आयत आ गई।
“मैं भी चल रही हूं।”
अर्जुन ने उसे देखा।
“मैंने कहा था अकेले जाऊंगा।”
“और मैंने कहा था कि मैं तुम्हारा पीछा करूंगी।”
“आयत...”
“बहस मत करो।”
अर्जुन ने कुछ पल उसे देखा।
फिर हार मानकर कहा,
“ठीक है।”
आयत बाइक पर बैठ गई।
लेकिन इस बार दोनों के चेहरे पर पहले जैसी सहजता नहीं थी।
दोनों जानते थे कि आज उन्हें किसी बहुत बड़े सच का सामना करना पड़ सकता है।
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करीब तीन घंटे बाद दोनों आगरा के पुराने शिव मंदिर पहुंचे।
मंदिर लगभग सुनसान था।
अर्जुन ने चारों तरफ देखा।
“कोई नहीं है।”
आयत ने कहा,
“शायद वो अभी नहीं आया।”
अचानक मंदिर की घंटी बज उठी।
टन...
दोनों चौंककर पीछे मुड़े।
मंदिर के अंदर एक आदमी खड़ा था।
काले कपड़े।
चेहरे पर हल्का कपड़ा।
अर्जुन तुरंत आगे बढ़ा।
“तुम रुद्रा हो?”
आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने एक लिफाफा जमीन पर रखा।
फिर पीछे हट गया।
अर्जुन ने लिफाफा उठाया।
अंदर एक फोटो थी।
इस बार फोटो पुरानी थी।
उसमें नासिर खान एक अस्पताल के कमरे में बैठे थे।
उनके साथ विक्रम वशिष्ठ थे।
और तीसरा आदमी...
राघव मेहरा।
फोटो के पीछे लिखा था—
“तीनों ने मिलकर A-27 शुरू किया था।”
आयत ने तस्वीर देखते ही कहा,
“लेकिन मेरे पापा तो डॉक्टर थे। उन्होंने ऐसा क्या किया था?”
आदमी पहली बार बोला।
“तुम्हारे पिता ने A-27 बनाया नहीं था।”
आयत ने पूछा,
“फिर?”
“उन्होंने उसे खत्म करने की कोशिश की थी।”
अर्जुन ने तुरंत पूछा,
“और रुद्रा?”
आदमी ने उसकी तरफ देखा।
“रुद्रा वही था जिसने उन्हें रोकने की कोशिश की।”
अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाया।
“तुम रुद्रा नहीं हो?”
आदमी मुस्कुराया।
“नहीं।”
“तो फिर तुम कौन हो?”
आदमी ने अपना चेहरा ढकने वाला कपड़ा हटाया।
अर्जुन और आयत दोनों स्तब्ध रह गए।
आयत की सांस अटक गई।
“आप...”
वह आदमी था—
हरिशंकर।
वही बुजुर्ग मरीज।
आयत ने हैरानी से पूछा,
“आप यहां कैसे?”
हरिशंकर मुस्कुराए।
“क्योंकि मैं तुम्हारे पिता का आखिरी राज जानता हूं।”
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हरिशंकर ने मंदिर की सीढ़ियों पर बैठते हुए कहा,
“नासिर को पता चल गया था कि A-27 के नाम पर जो research हो रही थी, उसका इस्तेमाल गलत तरीके से किया जा रहा है।”
अर्जुन ने पूछा,
“किसके द्वारा?”
हरिशंकर ने सीधा जवाब नहीं दिया।
“उस समय कई लोग इस project से जुड़े थे।”
“लेकिन रुद्रा कौन था?”
हरिशंकर ने कहा,
“रुद्रा कोई एक व्यक्ति नहीं था।”
अर्जुन और आयत एक-दूसरे को देखने लगे।
“क्या मतलब?”
“रुद्रा एक code name था।”
आयत ने पूछा,
“किसका?”
हरिशंकर ने कहा,
“उस आदमी का जिसने A-27 को अपने कब्जे में लेने की कोशिश की।”
अर्जुन ने पूछा,
“और वह कौन था?”
हरिशंकर चुप रहे।
फिर उन्होंने कहा,
“तुम्हारे दादाजी उसे जानते थे।”
अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।
“नाम बताइए।”
हरिशंकर ने सिर हिलाया।
“अभी नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हें पहले अपने परिवार के अंदर छिपे उस इंसान को पहचानना होगा, जो आज भी रुद्रा के लिए काम कर रहा है।”
अर्जुन के दिमाग में तुरंत रघुवीर का नाम आया।
“रघुवीर?”
हरिशंकर ने कोई जवाब नहीं दिया।
उनकी खामोशी ही काफी थी।
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उसी समय मंदिर के बाहर एक कार आकर रुकी।
एक आदमी कार से उतरा।
उसने दूर से मंदिर की तरफ देखा।
फिर फोन निकाला।
“वो दोनों यहां हैं।”
फोन के दूसरी तरफ से आवाज आई—
“और हरिशंकर?”
“वो भी।”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर आवाज आई—
“उन्हें जाने मत देना।”
आदमी ने फोन बंद कर दिया।
और धीरे-धीरे मंदिर की तरफ बढ़ने लगा।
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अंदर अर्जुन ने हरिशंकर से पूछा,
“मेरे दादाजी की मौत के बारे में आपको क्या पता है?”
हरिशंकर ने गहरी सांस ली।
“वो दुर्घटना नहीं थी।”
अर्जुन के चेहरे पर सदमा छा गया।
“क्या?”
“तुम्हारे दादाजी को मारा गया था।”
आयत ने अपना मुंह हाथ से ढक लिया।
अर्जुन की आंखें लाल हो गईं।
“किसने?”
“ये मुझे नहीं पता।”
“आप झूठ बोल रहे हैं।”
“नहीं।”
हरिशंकर ने कहा,
“लेकिन मुझे इतना पता है कि मरने से पहले तुम्हारे दादाजी ने नासिर को एक चीज दी थी।”
“क्या?”
हरिशंकर ने आयत के लॉकेट की तरफ देखा।
“वही।”
आयत ने अपने गले का लॉकेट पकड़ लिया।
“ये?”
“हां।”
अर्जुन ने हैरानी से पूछा,
“इसमें ऐसा क्या है?”
हरिशंकर ने कहा,
“ये सिर्फ लॉकेट नहीं है।”
उन्होंने लॉकेट की तरफ इशारा किया।
“इसमें A-27 की असली फाइल छिपी है।”
आयत का हाथ अपने आप लॉकेट पर कस गया।
“क्या?”
“तुम्हारे पिता ने इसे तुम्हारी मां के पास भेजा था। उन्हें पता था कि अगर वो पकड़े गए तो ये लॉकेट ही आखिरी सबूत रहेगा।”
अर्जुन ने कहा,
“इसे खोलना कैसे है?”
हरिशंकर ने कहा,
“उसका तरीका सिर्फ नासिर जानता था।”
आयत की आंखों में उम्मीद चमकी।
“तो मुझे अपने पापा को ढूंढना होगा।”
हरिशंकर ने सिर हिलाया।
“हां।”
“कहां?”
हरिशंकर ने धीरे से कहा—
“लखनऊ।”
आयत चौंक गई।
“लेकिन हमने तो उनकी तस्वीर आगरा में देखी थी।”
“तस्वीर पुरानी है।”
“कितनी पुरानी?”
हरिशंकर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“तीन दिन।”
आयत के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“तीन दिन पहले?”
हरिशंकर ने सिर हिलाया।
“हां।”
अर्जुन ने तुरंत पूछा,
“तो नासिर लखनऊ में हैं?”
हरिशंकर ने कहा—
“या फिर कोई तुम्हें ऐसा विश्वास दिलाना चाहता है।”
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अचानक बाहर से कांच टूटने की आवाज आई।
छन्न्न!
अर्जुन तुरंत उठ खड़ा हुआ।
“यहां कोई आया है।”
हरिशंकर ने घबराकर कहा,
“तुम दोनों पीछे जाओ।”
अर्जुन ने आयत को अपने पीछे कर लिया।
मंदिर का दरवाजा जोर से खुला।
तीन आदमी अंदर घुस आए।
अर्जुन ने आयत का हाथ पकड़ लिया।
“भागो!”
तीनों मंदिर के पीछे वाले रास्ते से निकलने लगे।
लेकिन बाहर भी एक आदमी खड़ा था।
अर्जुन ने तुरंत आयत को दूसरी तरफ धकेला।
“तुम उधर जाओ!”
“नहीं!”
“आयत, जाओ!”
वह आदमी अर्जुन की तरफ बढ़ा।
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़कर रोक लिया।
कुछ सेकंड दोनों में धक्का-मुक्की हुई।
आखिर अर्जुन ने उसे पीछे धकेल दिया।
वह आयत के साथ भागने लगा।
लेकिन पीछे से किसी ने आवाज लगाई—
“अर्जुन!”
वह रुक गया।
आवाज सुनकर उसके कदम जम गए।
क्योंकि वह आवाज किसी अजनबी की नहीं थी।
वह आवाज थी—
रघुवीर की।
अर्जुन ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
रघुवीर मंदिर के दरवाजे पर खड़े थे।
उनके हाथ में वही पुरानी फाइल थी।
रघुवीर ने कहा—
“तुम्हें कितनी बार समझाऊं कि इस मामले से दूर रहो?”
अर्जुन ने गुस्से में पूछा—
“आप यहां क्यों आए हैं?”
रघुवीर ने आयत की तरफ देखा।
“क्योंकि तुम्हारे सवालों के जवाब तुम्हें जितने चाहिए, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक हैं।”
आयत ने आगे बढ़कर पूछा—
“आप मेरे पापा को जानते हैं?”
रघुवीर चुप रहे।
“क्या वो जिंदा हैं?”
रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।
फिर धीमे से कहा—
“हां।”
आयत की आंखें फैल गईं।
अर्जुन भी स्तब्ध रह गया।
लेकिन अगले ही पल रघुवीर ने जो कहा, उससे दोनों के होश उड़ गए—
“लेकिन अगर तुमने उन्हें ढूंढ लिया... तो वो तुम्हें पहचानेंगे भी नहीं।”
आयत के चेहरे पर डर उतर आया।
“मतलब?”
रघुवीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह सिर्फ मुस्कुराए।
फिर उनकी नजर अर्जुन के हाथ में पकड़े लॉकेट पर गई।
और पहली बार उनके चेहरे पर लालच साफ दिखाई दिया।
“क्योंकि असली A-27 अभी भी उसी लॉकेट के अंदर है।”
अर्जुन ने तुरंत लॉकेट आयत से ले लिया।
और उसी क्षण पीछे खड़े किसी आदमी ने रघुवीर से कहा—
“सर, हमें निकलना होगा। पुलिस आ रही है।”
रघुवीर ने आखिरी बार अर्जुन को देखा।
“अब खेल शुरू होगा।”
कार वहां से तेज रफ्तार में निकल गई।
आयत वहीं खड़ी रह गई।
उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।
उसने अर्जुन से सिर्फ एक सवाल पूछा—
“अगर मेरे पापा जिंदा हैं... तो उन्होंने मुझे पांच साल तक ढूंढा क्यों नहीं?”
अर्जुन के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।
और उसकी मुट्ठी में बंद लॉकेट के अंदर...
कुछ हल्की-सी आवाज हुई।
क्लिक।
लॉकेट अपने आप खुलने लगा।
जारी रहेगा...