अधूरी किताब
एपिसोड 75 — नैना की असली शक्ति
“अब तुम्हारी बारी है।”
आर्या की आवाज़ नैना के कानों में गूँजी।
नैना के चारों तरफ काली स्याही तेजी से फैल रही थी।
वह पीछे हटना चाहती थी, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे।
“मुझे छोड़ो!”
आर्या मुस्कुराई।
“मैं तुम्हें पकड़ नहीं रही।”
“तुम खुद मेरे पास आ रही हो।”
नैना ने नीचे देखा।
सच में...
उसके पैरों के नीचे बनी काली स्याही खुद उसे अपनी तरफ खींच रही थी।
ऊपर खड़ी अनन्या ने यह देखा तो वह सीढ़ियों से भागती हुई नीचे आने लगी।
“नैना!”
अर्णव भी उसके पीछे दौड़ा।
लेकिन जैसे ही दोनों नीचे पहुँचे, एक अदृश्य दीवार उनके बीच आ गई।
अर्णव ने पूरी ताकत से उस दीवार पर हाथ मारा।
“नैना!”
नैना ने उसकी तरफ देखा।
“अर्णव!”
अर्णव ने दोबारा हाथ मारा।
इस बार उसकी हथेली से सुनहरी रोशनी निकली, लेकिन दीवार पर कोई असर नहीं हुआ।
कबीर ऊपर से चिल्लाया—
“अर्णव, अपनी शक्ति मत लगाओ!”
“क्यों?”
“क्योंकि यही वह चाहती है!”
अर्णव ने आर्या की तरफ देखा।
आर्या मुस्कुरा रही थी।
“कौन?”
कबीर ने कहा—
“आर्या नहीं।”
“कहानीकार।”
नैना का चेहरा बदल गया।
“आर्या... कहानीकार नहीं है?”
आर्या ने उसकी तरफ देखा।
उसकी मुस्कान गायब हो गई।
“कबीर को हमेशा लगता है कि वह सब जानता है।”
कबीर ने कहा—
“मैं उतना जानता हूँ जितना तुम्हें बचाने के लिए जरूरी है।”
आर्या ने जवाब दिया—
“तुम मुझे बचा नहीं सकते।”
“क्योंकि मैं कहानी नहीं हूँ।”
“मैं उसकी याद हूँ।”
अनन्या ने चौंककर पूछा—
“किसकी?”
आर्या ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारी।”
---
अचानक नैना के सामने एक सफेद दरवाजा दिखाई दिया।
दरवाजे पर लिखा था—
“नैना की पहली कहानी।”
नैना ने उसे देखा।
“ये क्या है?”
आर्या ने कहा—
“तुम्हारा असली घर।”
नैना ने सिर हिलाया।
“मेरा घर तो वही है जहाँ अनन्या है।”
“नहीं।”
आर्या उसके पास आई।
“तुम्हारा घर वह जगह है जहाँ तुम्हें पहली बार लिखा गया था।”
नैना ने दरवाजे की तरफ देखा।
उसका हाथ धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।
लेकिन तभी अनन्या ने चिल्लाकर कहा—
“नैना, दरवाजा मत खोलना!”
नैना रुक गई।
“क्यों?”
अनन्या ने कहा—
“क्योंकि कहानीकार यही चाहता है।”
आर्या ने हँसते हुए कहा—
“तुम्हें अभी भी लगता है कि मैं तुम्हारी दुश्मन हूँ?”
अनन्या ने कहा—
“मैं नहीं जानती तुम कौन हो।”
आर्या की आँखें नरम हो गईं।
“मैं भी यही नहीं जानती।”
अनन्या चौंक गई।
“क्या?”
आर्या ने नैना की तरफ देखा।
“मैं तुम्हारी याद हूँ।”
“लेकिन मैं खुद भी नहीं जानती कि मैं किसकी याद हूँ।”
कुछ पल तक कोई नहीं बोला।
फिर आर्या ने कहा—
“और शायद...”
“मैं भी किसी और की बनाई हुई कहानी हूँ।”
---
अचानक काली स्याही से एक हाथ बाहर आया।
उस हाथ ने आर्या की कलाई पकड़ ली।
आर्या पहली बार डर गई।
“नहीं!”
वह हाथ उसे पीछे खींचने लगा।
आर्या ने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने की कोशिश की।
कबीर चिल्लाया—
“सब पीछे हटो!”
लेकिन अनन्या ने आर्या की तरफ देखा।
“उसे छोड़ो!”
वह दीवार के पास गई और अपनी हथेली उस पर रख दी।
सुनहरी रोशनी फैल गई।
काला हाथ कुछ पल के लिए रुक गया।
आर्या ने अनन्या की तरफ देखा।
“तुमने मेरी मदद क्यों की?”
अनन्या ने कहा—
“क्योंकि तुम मेरी याद हो।”
“और मैं अपनी याद को किसी के हाथों में मरने नहीं दूँगी।”
आर्या की आँखों में आँसू आ गए।
लेकिन अगले ही पल...
काली शक्ति ने उसे पूरी तरह खींच लिया।
वह गायब हो गई।
नैना के चारों तरफ की स्याही भी अचानक खत्म हो गई।
वह जमीन पर गिर पड़ी।
अर्णव और अनन्या तुरंत उसके पास पहुँचे।
“नैना!”
नैना ने आँखें खोलीं।
“दीदी...”
अनन्या ने उसे गले लगा लिया।
“तुम ठीक हो?”
नैना ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
अर्णव ने राहत की साँस ली।
लेकिन कबीर अभी भी उस जगह को देख रहा था जहाँ आर्या गायब हुई थी।
उसने धीरे से कहा—
“वह उसे ले गया।”
अनन्या ने पूछा—
“कौन?”
कबीर ने जवाब दिया—
“कहानीकार।”
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नैना अचानक उठ बैठी।
“नहीं।”
सबने उसकी तरफ देखा।
“वह उसे नहीं ले गया।”
कबीर ने कहा—
“तुम्हें कैसे पता?”
नैना ने अपनी हथेली खोली।
उसकी हथेली पर एक छोटा-सा सुनहरा बिंदु चमक रहा था।
“क्योंकि आर्या मेरे अंदर है।”
अनन्या स्तब्ध रह गई।
“क्या?”
नैना ने आँखें बंद कीं।
और तभी उसकी आँखों के सामने आर्या दिखाई दी।
वह एक विशाल अंधेरे कमरे में कैद थी।
उसके हाथ-पैर स्याही की जंजीरों से बंधे थे।
और उसके सामने एक आदमी खड़ा था।
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
आर्या ने उसकी तरफ देखकर कहा—
“तुम मुझे हमेशा कैद नहीं रख सकते।”
आदमी हँसा।
“मुझे तुम्हें कैद रखने की जरूरत नहीं।”
“क्योंकि अब तुम्हारा दरवाजा खुल चुका है।”
आर्या ने पूछा—
“कौन-सा दरवाजा?”
आदमी ने पीछे इशारा किया।
वहाँ नैना खड़ी थी।
आर्या का चेहरा बदल गया।
“नैना?”
आदमी ने कहा—
“वही खाली पन्ना।”
“जिसे तुमने कभी समझा ही नहीं।”
नैना ने अचानक आँखें खोल दीं।
“वह...”
अनन्या ने उसका कंधा पकड़ा।
“क्या देखा?”
नैना ने कहा—
“कहानीकार आर्या को नहीं चाहता।”
“तो किसे?”
नैना ने धीरे से कहा—
“मुझे।”
कबीर का चेहरा गंभीर हो गया।
“यही डर था।”
अर्णव ने पूछा—
“क्यों?”
नैना ने अपनी हथेली देखी।
“क्योंकि मेरे अंदर कोई कहानी नहीं है।”
“मैं खाली हूँ।”
कबीर ने कहा—
“और इसलिए तुम उसके लिए सबसे खतरनाक हो।”
---
अचानक हवेली के अंदर घंटी बजने लगी।
टन...
टन...
टन...
हर घंटी के साथ दीवारों पर बने चित्र बदलने लगे।
एक चित्र में अनन्या थी।
दूसरे में अर्णव।
तीसरे में नैना।
चौथे में कबीर।
और पाँचवें चित्र में...
एक खाली चेहरा।
कबीर ने उसे देखते ही कहा—
“ये वही है।”
अनन्या ने पूछा—
“कौन?”
“कहानीकार का असली चेहरा।”
अर्णव ने ध्यान से देखा।
“लेकिन इसमें चेहरा तो है ही नहीं।”
कबीर ने कहा—
“यही उसकी असली पहचान है।”
“वह किसी चेहरे में नहीं रहता।”
“वह उस व्यक्ति में रहता है जिसे सबसे ज्यादा भरोसा मिलता है।”
नैना ने धीरे से पूछा—
“मतलब?”
कबीर ने कहा—
“वह किसी ऐसे के अंदर है जिसे हम अपना समझते हैं।”
सबकी नजरें एक-दूसरे पर टिक गईं।
कुछ पल तक कोई नहीं बोला।
फिर अनन्या ने धीरे से कहा—
“तो हमारे बीच ही कोई...”
अचानक पीछे से आवाज आई—
“हाँ।”
सबने पलटकर देखा।
वहाँ...
अर्णव के पिता खड़े थे।
उनका चेहरा शांत था।
लेकिन उनकी आँखें बदल चुकी थीं।
अनन्या ने तुरंत कहा—
“आप?”
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“बहुत देर लगा दी तुम लोगों ने समझने में।”
अर्णव पीछे हट गया।
“पापा...”
उस आदमी ने उसकी तरफ देखा।
“मुझे पापा मत कहो।”
अर्णव की आँखों में दर्द भर गया।
“आप कौन हैं?”
वह आदमी धीरे-धीरे मुस्कुराया।
“मैं वह हूँ... जिसने तुम्हें पैदा नहीं किया।”
“मैंने तुम्हें लिखा है।”
अर्णव के चेहरे पर सदमा फैल गया।
“नहीं।”
“तुम झूठ बोल रहे हो।”
“काश।”
उस आदमी ने अपनी उँगली उठाई।
हवा में एक कलम दिखाई दी।
काली कलम।
उसने हवा में एक शब्द लिखा—
“अर्णव।”
अर्णव अचानक घुटनों पर गिर पड़ा।
उसकी हथेली का सुनहरा निशान चमक उठा।
कबीर चिल्लाया—
“उसे रोकना होगा!”
अनन्या उसके पास पहुँची।
“कैसे?”
कबीर ने कहा—
“उसकी कहानी उससे छीन लो!”
नैना ने पूछा—
“कैसे?”
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“तुम कर सकती हो।”
नैना समझ नहीं पाई।
“मैं?”
“हाँ।”
“तुम खाली पन्ना हो।”
“तुम किसी की कहानी मिटा सकती हो।”
नैना ने अर्णव की तरफ देखा।
“अगर मैंने उसकी कहानी मिटा दी तो?”
कबीर ने कहा—
“वह आज़ाद हो जाएगा।”
नैना ने किताब उठाई।
उसका हाथ काँप रहा था।
“और अगर मैं गलत हुई?”
अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम गलत नहीं होगी।”
नैना ने किताब खोली।
अर्णव का नाम पन्ने पर चमक रहा था।
उसने कलम उठाई।
लेकिन जैसे ही उसने अर्णव के नाम पर हाथ रखा...
अर्णव ने चीखते हुए कहा—
“नैना!”
वह उसकी तरफ देखने लगा।
उसकी आँखों में अब वही काली चमक थी।
“मेरी कहानी मत मिटाना।”
नैना की आँखों में आँसू आ गए।
“मैं तुम्हें बचा रही हूँ।”
अर्णव ने धीमे से कहा—
“नहीं...”
“तुम्हें पता नहीं...”
उसकी आवाज अचानक बदल गई।
“अगर मेरी कहानी मिट गई...”
वह मुस्कुराया।
“तो कहानीकार बाहर आ जाएगा।”
नैना का हाथ रुक गया।
कबीर चौंक गया।
“क्या?”
अर्णव की मुस्कान और गहरी हो गई।
“तुम सबने सोचा कि मैं कहानीकार का वारिस हूँ।”
उसकी आँखें पूरी तरह काली हो गईं।
“लेकिन तुम गलत थे।”
अनन्या ने काँपते हुए पूछा—
“तो तुम कौन हो?”
अर्णव धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
उसके पीछे काली स्याही से एक विशाल आकृति बनने लगी।
अर्णव ने कहा—
“मैं उसका दरवाज़ा हूँ।”
और उसी क्षण...
किताब के पन्ने पर एक नया वाक्य उभरा—
“कहानीकार को जगाने के लिए अर्णव की कहानी खत्म करनी होगी।”
नैना के हाथ से कलम गिर गई।
कबीर ने चीखकर कहा—
“नैना! कलम उठाओ!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
अर्णव की छाया जमीन से अलग हो चुकी थी।
और उस छाया के अंदर...
एक दूसरा चेहरा दिखाई दे रहा था।
कहानीकार का।
क्रमशः...