उषनिषद in Hindi Spiritual Stories by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) books and stories PDF | गणपति उपनिषद

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गणपति उपनिषद

--(98)गणपति उपनिषद---यह उपनिषद के क्रम में 98 वेंस्थान पर आता है। गणपति उपनिषद्, जिसे सामान्यतः श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष या गणपति अथर्वशीर्ष कहा जाता है, गणपति को प्रत्यक्ष तत्त्व, आत्मा और ब्रह्म के रूप में निरूपित करता है। इसके पाठ की विभिन्न शाखाओं/प्रतियों में कुछ छोटे पाठभेद मिलते हैं। नीचे प्रचलित संस्कृत मूलपाठ और सरल हिन्दी भावार्थ दे रहा हूँ।॥ श्रीगणपत्यथर्वशीर्षोपनिषत् ॥॥ शान्तिपाठ ॥ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः।व्यशेम देवहितं यदायुः॥स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥भावार्थ:हे देवगण! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें, अपनी आँखों से शुभ और मंगलमय दृश्य देखें। स्वस्थ और दृढ़ अंगों तथा शरीर से आपकी स्तुति करते हुए देवताओं द्वारा निर्धारित आयु को पूर्ण करें। इन्द्र, सर्वज्ञ पोषक पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति हमारे लिए कल्याण प्रदान करें। हमारे आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक—तीनों प्रकार के कष्ट दूर हों।॥ गणपति उपनिषद् ॥१. गणपति का ब्रह्मस्वरूपहरिः ॐ।ॐ नमस्ते गणपतये।त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।त्वमेव केवलं कर्तासि।त्वमेव केवलं धर्तासि।त्वमेव केवलं हर्तासि।त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।त्वं साक्षादात्मासि नित्यम्॥ १॥भावार्थ:हे गणपति! आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्यक्ष तत्त्व—परम सत्य—हैं। आप ही अकेले इस जगत् के कर्ता, धारण करने वाले और संहारकर्ता हैं। यह सम्पूर्ण जगत् वास्तव में ब्रह्म ही है और आप वही ब्रह्म हैं। आप ही नित्य प्रत्यक्ष आत्मस्वरूप हैं। २. ऋत और सत्यऋतं वच्मि।सत्यं वच्मि॥ २॥भावार्थ:मैं ऋत अर्थात् ब्रह्मांडीय सत्य और धर्म के अनुरूप वचन बोलूँगा। मैं सत्य ही बोलूँगा।यहाँ ऋत केवल सामान्य सत्य नहीं, बल्कि सृष्टि के शाश्वत नियम और धर्म के अनुरूप आचरण का भी बोध कराता है।३. सर्वतो रक्षण की प्रार्थनाअव त्वं माम्।अव वक्तारम्।अव श्रोतारम्।अव दातारम्।अव धातारम्।अवानूचानमव शिष्यम्।अव पश्चात्तात्।अव पुरस्तात्।अवोत्तरात्तात्।अव दक्षिणात्तात्।अव चोर्ध्वात्तात्।अवाधरात्तात्।सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात्॥ ३॥भावार्थ:हे गणपति! मेरी रक्षा कीजिए। वक्ता की रक्षा कीजिए, श्रोता की रक्षा कीजिए, दाता की रक्षा कीजिए, धारणकर्ता की रक्षा कीजिए, अध्ययन करने वाले और शिष्य की रक्षा कीजिए।पीछे से मेरी रक्षा करें, सामने से मेरी रक्षा करें, उत्तर से और दक्षिण से मेरी रक्षा करें, ऊपर से और नीचे से मेरी रक्षा करें। चारों ओर से, प्रत्येक दिशा से मेरी रक्षा करें।४. गणपति का चैतन्यस्वरूपत्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः।त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः।त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि।त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥ ४॥भावार्थ:आप वाणी के स्वरूप हैं और चेतना के स्वरूप हैं। आप आनन्दस्वरूप हैं और ब्रह्मस्वरूप हैं। आप सत्-चित्-आनन्द के अद्वितीय स्वरूप हैं। आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। आप ज्ञानमय और विज्ञानमय हैं।५. सम्पूर्ण जगत् का आधारसर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः।त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥ ५॥भावार्थ:यह सम्पूर्ण जगत् आपसे उत्पन्न होता है। यह आपसे ही स्थित और संचालित होता है। अन्त में यह आपमें ही लीन हो जाता है और पुनः आपसे ही प्रकट होता है।आप पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन पाँच महाभूतों के स्वरूप हैं। वाणी के चारों स्तर भी आप ही हैं। ६. तीनों गुणों और अवस्थाओं से परेत्वं गुणत्रयातीतः।त्वमवस्थात्रयातीतः।त्वं देहत्रयातीतः।त्वं कालत्रयातीतः।त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्।त्वं शक्तित्रयात्मकः।त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम्।त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वम्।इन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वम्।ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्॥ ६॥भावार्थ:आप सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणों से परे हैं। आप जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओं से परे हैं। आप स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों शरीरों से परे हैं। आप भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों से परे हैं।आप नित्य मूलाधार में स्थित हैं। आप इच्छा, ज्ञान और क्रिया—तीनों शक्तियों के स्वरूप हैं। योगीजन आपका नित्य ध्यान करते हैं।आप ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं; आप ही इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य और चन्द्रमा हैं। आप ही भूः, भुवः, स्वः और ॐकारस्वरूप ब्रह्म हैं। ॥ गणेश-मन्त्र का रहस्य ॥७. ॐ गं गणपतये नमःगणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम्।अनुस्वारः परतरः।अर्धेन्दुलसितम्।तारेण ऋद्धम्।एतत्तव मनुस्वरूपम्।गकारः पूर्वरूपम्।अकारो मध्यमरूपम्।अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्।बिन्दुरुत्तररूपम्।नादः सन्धानम्।संहितासन्धिः।सैषा गणेशविद्या।गणक ऋषिः।निचृद्गायत्री छन्दः।गणपतिर्देवता।ॐ गं गणपतये नमः॥ ७॥भावार्थ:गणेश-मन्त्र की रचना में ग, अ और अनुस्वार (ं) का विशेष तात्त्विक महत्त्व बताया गया है। इनके साथ बिन्दु और नाद की संकल्पना जुड़ती है। यही गणेशविद्या है।इस मन्त्र के ऋषि गणक, छन्द निचृद् गायत्री और देवता गणपति हैं।मन्त्र:ॐ गं गणपतये नमः।अर्थ—हे गणपति! आपको नमस्कार है।॥ गणेश गायत्री ॥८. एकदन्ताय विद्महे।वक्रतुण्डाय धीमहि।तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥ ८॥भावार्थ:हम एकदन्त गणपति को जानें और उनका ध्यान करें। वक्रतुण्ड भगवान् में अपनी बुद्धि को स्थिर करें। वे दन्ती गणपति हमारी बुद्धि को सत्य और शुभ मार्ग की ओर प्रेरित करें।॥ गणपति का ध्यान ॥९. एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम्।रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्॥रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्॥भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्॥एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥ ९॥भावार्थ:एक दाँत वाले, चार भुजाओं वाले, पाश और अंकुश धारण करने वाले गणपति का ध्यान करें। उनके हाथों में दाँत और वर देने की मुद्रा है तथा उनका ध्वज मूषक-चिह्न से युक्त है।वे रक्तवर्ण हैं, लम्बोदर हैं, उनके कान सूप के समान बड़े हैं और वे लाल वस्त्र धारण करते हैं। उनके अंग लाल चन्दन/गन्ध से सुशोभित हैं और लाल पुष्पों से उनकी पूजा की जाती है।वे भक्तों पर करुणा करने वाले, जगत् के कारण और अविनाशी देव हैं। सृष्टि के आरम्भ में वे प्रकट हुए और प्रकृति तथा पुरुष से भी परे हैं।जो व्यक्ति इस स्वरूप का नित्य ध्यान करता है, वह योगियों में श्रेष्ठ योगी होता है।॥ गणपति के नामों की स्तुति ॥१०.नमो व्रातपतये।नमो गणपतये।नमः प्रमथपतये।नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय।विघ्ननाशिने शिवसुताय।श्रीवरदमूर्तये नमो नमः॥ १०॥भावार्थ:व्रातों के स्वामी को नमस्कार। गणों के स्वामी को नमस्कार। प्रमथगणों के स्वामी को नमस्कार।लम्बोदर को नमस्कार। एकदन्त को नमस्कार। विघ्नों का नाश करने वाले शिवपुत्र को नमस्कार। श्री और वर प्रदान करने वाले भगवान् को बार-बार नमस्कार। आगे का भागइसके बाद अथर्वशीर्ष में फलश्रुति आती है, जिसमें इसके अध्ययन, जप, अभिषेक, ब्रह्मभाव और विभिन्न अवसरों पर पाठ के फल का वर्णन है। उसके बाद उपनिषद् का समापन होता है।  पिछले भाग में ध्यान तक पाठ आया था; अब फलश्रुति और उपसंहार से आगे बढ़ते हैं।॥ फलश्रुतिः ॥एतदथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।यो यदि मोहाद् दास्यति स पापीयान् भवति।सहस्रावर्तनाद् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्॥भावार्थ:इस अथर्वशीर्ष का उपदेश ऐसे व्यक्ति को नहीं देना चाहिए जो इसके योग्य न हो। जो व्यक्ति मोहवश इसे अयोग्य व्यक्ति को देता है, वह पाप का भागी होता है। जो साधक इसका एक हजार बार आवर्तन करता है और जिस कामना को लेकर इसका अध्ययन-जप करता है, वह उस कामना की सिद्धि प्राप्त कर सकता है।॥ ११ ॥अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति।चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान् भवति।इत्यथर्वणवाक्यम्।ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्।न बिभेति कदाचन॥ ११॥भावार्थ:जो व्यक्ति इस अथर्वशीर्ष के मन्त्रों द्वारा गणपति का अभिषेक करता है, वह उत्तम वक्ता और वाक्पटु बनता है।जो चतुर्थी के दिन उपवास रखकर इसका जप करता है, वह विद्यावान् होता है। यह अथर्वण ऋषि का वचन है।जो इसे ब्रह्मस्वरूप आवरण/रक्षा के रूप में जानता है, वह कभी भयभीत नहीं होता।॥ १२ ॥यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति।यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति।स मेधावान् भवति।यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति।यः साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते॥ १२॥भावार्थ:जो दूर्वा के अंकुरों से गणपति की पूजा करता है, वह कुबेर के समान समृद्ध होता है।जो लाजा (लाई/खील) से पूजा करता है, वह यशस्वी और मेधावी होता है।जो एक हजार मोदकों से पूजा करता है, वह इच्छित फल प्राप्त करता है।जो घृत से युक्त समिधाओं द्वारा हवन करता है, वह सभी प्रकार के फल प्राप्त करता है।॥ १३ ॥अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति।सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रो भवति।महाविघ्नात् प्रमुच्यते।महादोषात् प्रमुच्यते।महाप्रत्यवायात् प्रमुच्यते।स सर्वविद् भवति।स सर्वविद् भवति।य एवं वेद।इत्युपनिषत्॥ १३॥भावार्थ:जो इस उपनिषद् का विधिपूर्वक आठ ब्राह्मणों को अध्ययन कराता है, वह सूर्य के समान तेजस्वी होता है।सूर्यग्रहण के समय किसी महानदी के तट पर अथवा गणपति की प्रतिमा के समीप इसका जप करने से मन्त्रसिद्धि प्राप्त होती है।ऐसा साधक बड़े विघ्नों से मुक्त होता है, बड़े दोषों से मुक्त होता है और बड़े प्रत्यवाय अर्थात् अनिष्टकारी बाधाओं से मुक्त होता है। वह सर्वज्ञता की ओर अग्रसर होता है।जो इस प्रकार जानता है—वही इसका वास्तविक ज्ञाता है।यही उपनिषद् है।॥ शान्तिपाठ ॥ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः।व्यशेम देवहितं यदायुः॥स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥भावार्थ:हे देवगण! हम अपने कानों से मंगलकारी बातें सुनें और अपनी आँखों से शुभ दृश्य देखें। स्वस्थ अंगों और शरीर से आपकी स्तुति करते हुए देवहित में निर्धारित अपनी आयु पूर्ण करें।यशस्वी इन्द्र हमारा कल्याण करें। सबको जानने वाले पूषा हमारा कल्याण करें। अरिष्टनेमि तार्क्ष्य हमारा कल्याण करें और बृहस्पति हमारे लिए कल्याण प्रदान करें।ॐ—आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक—तीनों प्रकार की शान्ति हो।॥ इति श्रीगणपत्यथर्वशीर्षोपनिषत् ॥------×-------×--------×-----=