The Third door -part 2 in Hindi Thriller by Nisha Choudhary books and stories PDF | वो तीसरा दरवाज़ा - भाग 2

Featured Books
Categories
Share

वो तीसरा दरवाज़ा - भाग 2

शीशे के अंदर की परछाईं ने जैसे ही शेखर का गला दबोचा, कमरे की बत्ती अपने आप जल उठी। सामने खड़े इंसान को देखकर शेखर के पाँव तले ज़मीन खिसक गई—क्योंकि वह चेहरा किसी भूत का नहीं, बल्कि खुद उसका अपना था!
शीशे में दिख रही उस खौफ़नाक आकृति का सड़ता हुआ हाथ जैसे ही शेखर के काँधे को छूने लगा, शेखर की चीख पूरे कमरे में गूँज उठी। उसने बदहवासी में पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर ज़मीन में जम चुके थे। कमरे का तापमान एकदम से जमने की हद तक गिर गया था।
अचानक, कमरे में टंगी मोमबत्तियाँ अपने आप जल उठीं और पूरा कमरा ज़र्द रोशनी से भर गया। शेखर ने काँपते हुए अपनी आँखें खोलीं। शीशे में दिख रही वह धूँधली आकृति अब उसके सामने खड़ी थी। शेखर ने हिम्मत जुटाकर उसकी तरफ देखा—सामने जो चेहरा था, उसे देखकर शेखर के रोंगटे खड़े हो गए।
वह कोई रूह या पिशाच नहीं था। वह इंसान हूबहू शेखर जैसा दिखता था—वही आँखें, वही कद-काठी, बस उसके कपड़े पुराने दौर के थे और आँखों में एक अजीब सी हैवानी चमक थी।
"तुम... तुम कौन हो?" शेखर की आवाज़ घबराहट के मारे टूट रही थी।
वह हमशक्ल धीमी आवाज़ में हँसा। उसकी हँसी की गूँज दीवार से टकराकर शेखर के कानों में हथौड़े की तरह लग रही थी। "मैं तुम्हारा अतीत हूँ, शेखर। या शायद तुम्हारा भविष्य," उसने मेज़ पर जमा ताज़ा खून अपने हाथ में लेते हुए कहा। "यह हवेली किसी भूत की नहीं है। यह हवेली समय के एक ऐसे दुष्चक्र (Time Loop) का केंद्र है, जहाँ से कोई वापस नहीं जा सकता।"
शेखर का दिमाग शून्य हो गया। "क्या बकवास है यह? मैं आज ही इस हवेली में आया हूँ!"
"और मैं भी दस साल पहले आज ही के दिन यहाँ आया था," उस हमशक्ल ने गंभीर होकर कहा। "इस तीसरे दरवाज़े का रहस्य यह है कि जो भी इसके अंदर लगे अपने निशानों को पोंछने की गलती करता है, वह इस कमरे में हमेशा के लिए कैद हो जाता है। और उसकी जगह लेता है वह इंसान, जो शीशे के उस पार से आता है।"
इतना सुनते ही शेखर का ध्यान शीशे की तरफ गया। शीशे के अंदर अब उसका अपना असली कमरा दिख रहा था, जहाँ वह रात को सोया था।
"अब मेरी बारी है बाहर जाने की, और तुम्हारी यहाँ रुकने की," हमशक्ल ने ठंडे स्वर में कहा और शेखर की तरफ झपटा।
शेखर ने पूरी ताकत लगाकर उसे धक्का दिया और दरवाज़े की तरफ भागा। लेकिन जैसे ही उसने दरवाज़े के पार कदम रखा, वह वापस उसी कमरे के बीचों-बीच आ गिरा! उसने बार-बार बाहर भागने की कोशिश की, लेकिन हर दरवाज़ा उसे वापस उसी शीशम की मेज़ के सामने ला पटकता।
धीरे-धीरे शेखर का शरीर सुन्न पड़ने लगा। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। आख़िरी बार जब उसने देखा, तो उसका हमशक्ल मुस्कुराते हुए हवेली के मुख्य दरवाज़े से बाहर निकल रहा था—शेखर की घड़ी, शेखर का कोट और शेखर की ज़िंदगी चुराकर।
और शेखर? वह अब उस ढके हुए शीशे के अंदर बंद था, दीवार पर खून से अगला नाम लिखे जाने का इंतज़ार करते हुए...
क्या शेखर कभी इस खौफ़नाक चक्रव्यूह से बाहर निकल पाएगा?
कहानी का यह ट्विस्ट आपको कैसा लगा? क्या आप शेखर की इस कैद का अगला हिस्सा पढ़ना चाहते हैं? अपनी राय कमेंट (Comment) में ज़रूर बताएं!
👉 कहानी को लाइक और शेयर करें, और मातृभारती पर मुझे फ़ॉलो करना न भूलें ताकि इसके आख़िरी और सबसे धमाकेदार भाग-3 (Final Part) का अपडेट आपको सबसे पहले मिले!