ध्रुव की तारा
भाग - १२
लेखिका "अनामिका"
ध्रुव को पास ही के शहर के एक नामी कॉलेज में एडमिशन मिल गया था। ट्रेन से बस दो घंटे की दूरी पर स्थित यह कॉलेज ध्रुव के लिए पढ़ाई और घर के करीब रहने का एकदम सही संतुलन था। इस सफलता की खुशी में ध्रुव और तारा के परिवारों ने ध्रुव के घर पर ही एक छोटी सी पार्टी रखी थी।
घर में उत्सव जैसा माहौल था। आनंद और विजय पुरानी यादों में खोए हुए ठहाके लगा रहे थे, वहीं सुधा और सुमन मिलकर सबकी पसंद का खाना परोस रही थीं। सब लोग ध्रुव की इस नई शुरुआत से बेहद खुश थे, और ध्रुव भी चेहरे पर एक शांत मुस्कान लिए सबको देख रहा था।
लेकिन इस पूरे जश्न और चहल-पहल के बीच, तारा का मन किसी अनजाने डर और बेचैनी से घिरा हुआ था। वह खाने की प्लेट हाथ में लिए चुपचाप एक कोने में खड़ी ध्रुव को देखे जा रही थी। बचपन से लेकर अब तक तारा अपनी हर छोटी-बड़ी चीज़ के लिए ध्रुव पर ही निर्भर रही थी; वही उसका रक्षक था, उसका सबसे बड़ा सहारा था और उस पर तारा को खुद से भी ज़्यादा भरोसा था।
ध्रुव उसके लिए सिर्फ एक दोस्त नहीं, बल्कि उसकी पूरी दुनिया का केंद्र था। ऐसे में पहली बार ध्रुव का उससे दूर जाना तारा के सीने में एक अजीब सी कसक और गहरी उदासी भर रहा था। वह ध्रुव से अपनी यह घबराहट बयाँ भी नहीं कर सकती थी, क्योंकि वह जानती थी कि ध्रुव पहले से ही माँ की बीमारी और अपने टूटे सपनों के बोझ से दबा हुआ था। तारा ने अपनी आँखों में तैरते आँसुओं को पोंछा और ध्रुव को देखकर मन ही मन उसके उज्ज्वल भविष्य की दुआ मांगने लगी।
जाने का दिन करीब आ गया था और ध्रुव के कमरे में सामान बांधने की अफरा-तफरी मची थी। "ध्रुव, यह गर्म कपड़े रख लिए? और वो दवाइयों का डिब्बा भी बैग में डाल लेना, अच्छे से संभालना सब कुछ!" सुमन एक के बाद एक हिदायतें दे रही थीं। ध्रुव ने मुस्कुराते हुए अपना बैग बंद किया और गहरी साँस लेते हुए बोला, "अरे माँ, सब रख लिया है मैंने। मैं कर लूँगा सब मैनेज, आप इतना परेशान मत हो।"
आखिरकार वह सुबह आ ही गई जब ध्रुव को हॉस्टल के लिए निकलना था। घर के बाहर गाड़ी खड़ी थी और दोनों परिवार—ध्रुव और तारा के मम्मी-पापा—उसे विदा करने के लिए बाहर खड़े थे। ध्रुव जैसे ही अपनी माँ से लिपटा, सुमन के सब्र का बांध टूट गया और वह फूट-फूट कर रो पड़ीं। उनका इकलौता बेटा पहली बार घर से दूर किसी दूसरे शहर जा रहा था। सुधा ने आगे बढ़कर सुमन को गले से लगाया और प्यार से समझाते हुए बोलीं, "अरे सुमन, तुम ऐसे क्यों रो रही हो? तुम ही तो चाहती थी न कि बच्चा आगे बढ़े और कुछ बने।" विजय ने भी मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ भई, इसे अच्छे कॉलेज भेजने का पूरा आइडिया तुम्हारा ही था, और अब तुम ही बच्चों की तरह रो रही हो।"
सब लोग बातों में लगे थे, लेकिन ध्रुव की नज़रें एक किनारे चुपचाप खड़ी तारा पर जाकर टिक गईं। तारा के चेहरे पर एक मुस्कान थी; वह उसे खुशी-खुशी अलविदा कहने आई थी। लेकिन ध्रुव की पारखी नज़रों ने तारा की मुस्कुराती आँखों के पीछे छिपे उस गहरे दर्द और घबराहट को एक पल में पहचान लिया। वह बिना एक भी शब्द कहे सीधे तारा के पास गया और सबके सामने उसे अपनी बाहों में कसकर गले लगा लिया। तारा भी खुद को रोक नहीं पाई और उसने पूरी ताकत से ध्रुव को वापस गले लगा लिया। दोनों की आँखों में एक अजीब सी उदासी और खामोशी छा गई। बिना कुछ कहे ही दोनों के दिल एक-दूसरे का दर्द समझ रहे थे। तारा ने खुद को संभालते हुए धीमी सी आवाज़ में कहा, "अपने भविष्य का ध्यान रखना... ऑल द बेस्ट।"
ध्रुव ने उसे आखिरी बार देखा, गाड़ी में बैठा और स्टेशन की तरफ निकल गया। गाड़ी के धूल उड़ाते हुए आँखों से ओझल होते ही, तारा को लगा जैसे उसके आस-पास की दुनिया अचानक वीरान हो गई हो। ध्रुव तो चला गया, लेकिन पीछे छोड़ गया एक अजीब सा दर्द और सन्नाटा। तारा वहीं बुत बनी खड़ी रही। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ध्रुव के बिना अब उसकी ज़िंदगी कैसे चलेगी—अब वह स्कूल अकेले कैसे जाएगी, किसके साथ लड़ेगी, और अपनी हर छोटी-बड़ी बात किसे बताएगी। उसका रक्षक, उसका सबसे पक्का दोस्त अब उससे दूर जा चुका था।
तारा रोज़ की तरह अपनी आदत के मुताबिक जल्दी-जल्दी स्कूल की यूनिफॉर्म पहनकर नीचे भागी, लेकिन दरवाज़े पर सन्नाटा देखकर अचानक उसके कदम थम गए। रोज़ की तरह साइकिल पर टेक लगाए इंतज़ार करता ध्रुव वहाँ नहीं था; दिल में एक बार फिर सच्चाई चुभी कि अब वह पूरी तरह अकेली है, और वह भारी मन से अकेले ही स्कूल के लिए निकल पड़ी।
क्लास में पहुँचकर उसकी बेचैनी और बढ़ गई जब उसने देखा कि उसकी सबसे अच्छी दोस्त सिया की डेस्क भी खाली थी—न ध्रुव पास था, न सिया। पूरे दिन क्लास में अकेले रहने के बाद, जैसे ही लंच ब्रेक हुआ, तारा की नज़र दूर गलियारे में सिया पर पड़ी। तारा भागती हुई उसके पास पहुँची और हांपते हुए बोली, "सिया! तुम कहाँ थी? आज क्लास में क्यों नहीं आई? तुम्हें पता है मैं कितनी अकेली..."
"बस करो तारा, मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी," सिया ने ठंडे स्वर में तारा की बात बीच में ही काट दी। तारा के चेहरे की रंगत उड़ गई जब सिया ने अपने हाथ में पकड़ी फाइल दिखाते हुए कहा, "मैं यहाँ अपना ट्रांसफर सर्टिफिकेट लेने आई थी। अब मैं यह स्कूल छोड़कर दूसरे स्कूल जा रही हूँ।"
ध्रुव के जाने से तारा की ज़िंदगी में पहले ही गहरा सन्नाटा छा चुका था, और अब सिया के इस तरह अचानक दूर चले जाने से वह अंदर से पूरी तरह टूट गई। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि इस अचानक आए अकेलेपन और बिखराव को वह कैसे संभाले—क्योंकि उसका रक्षक ध्रुव भी पास नहीं था और स्कूल की एकमात्र सहारा सिया भी उसे छोड़कर जा रही थी।
बारहवा भाग समाप्त, कहानी जारी है....