Moon Star Dark Night And ME in Hindi Short Stories by Shivam Dhuriya books and stories PDF | चाँद, सितारा, अँधेरी रात और मैं

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चाँद, सितारा, अँधेरी रात और मैं

सन्नाटे की भी अपनी एक आवाज़ होती है।

धीमी… गम्भीर… और इतनी महीन कि उसे सुनने के लिए दुनिया का सो जाना ज़रूरी है।

कल रात अचानक उसी सन्नाटे के बीच मेरी नींद खुली।

आँखें खुलीं तो मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी। कमरे में पसरा सन्नाटा इतना गहरा था कि एक पल को लगा—शायद भोर हो चुकी है और सुबह की पहली किरण खिड़की से भीतर उतरने वाली है।

लेकिन जब नज़र खिड़की की ओर गई, तो बाहर अभी भी रात अपने पूरे साम्राज्य के साथ मौजूद थी।

स्याह… ठहरी हुई… और रहस्यमयी।

मैंने कलाई पर बँधे डिजिटल बैंड की स्क्रीन जलाई।

रात के ठीक दो बजे थे।

गला सूख रहा था इसलिये पानी पीने के लिए बिस्तर से उठा। मगर पानी पीकर वापस रज़ाई में घुस जाना मेरी पुरानी आदतों के खिलाफ़ था।

सो, कमरे के पीछे वाली खिड़की की चौखट पर जा टिका।

रात के आसमान को देखना मेरी दिनचर्या का हिस्सा नहीं, बल्कि शायद मेरी आदतों में छिपी कोई ऐसी चीज़ है जिसका मुझे स्वयं भी ठीक-ठीक पता नहीं।

हर रात आसमान कुछ न कुछ कहता है।

बस, सुनने वाला चाहिए।

आमतौर पर आसमान में चाँद अपनी एकाकी हुकूमत में तैरता दिखाई देता है और उसके आसपास अनगिनत सितारे ऐसे बिखरे रहते हैं, जैसे किसी ने अँधेरे कैनवास पर चाँदी के छोटे-छोटे कण छिड़क दिए हों।

लेकिन उस रात आसमान का मिज़ाज कुछ और था।

न जाने क्यों, मेरी खिड़की के सीमित से दायरे में सिर्फ़ एक आधा मुस्कुराता हुआ चाँद और उसके ठीक पास चमकता हुआ एक अकेला सितारा दिखाई दे रहा था।

बस वे दोनों।

न कोई तीसरा सितारा।

न कोई और हलचल।

वह दृश्य इतना सजीव था कि कुछ क्षणों के लिए मुझे लगा, जैसे आसमान नहीं, बल्कि कोई शांत-सा कमरा हो और उसमें दो पुराने हमराज़ आमने-सामने बैठे हों।

सितारा शायद कोई नटखट बात कह रहा था।

और चाँद अपनी धीमी, शीतल मुस्कान के साथ उसकी बात सुन रहा था।

कभी-कभी प्रकृति ऐसी तस्वीरें बना देती है, जिन्हें देखने के बाद इंसान को शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती।

मेरा विज्ञान-प्रेमी मन भी उस रात अपनी किताबें कुछ देर के लिए बंद करके मुस्कुरा रहा था।

सोचा—आज शायद भौतिकी के सारे नियम छुट्टी पर हैं।

आकर्षण का नियम अपनी जगह था, मगर इस दृश्य में गुरुत्वाकर्षण से कहीं अधिक अपनत्व दिखाई दे रहा था।

वे दोनों जैसे अपनी ही कोई ‘केमिस्ट्री’ रच रहे थे।

ऐसी केमिस्ट्री, जिसे किसी प्रयोगशाला की शीशी में बंद नहीं किया जा सकता और न ही किसी समीकरण में लिखा जा सकता है।

लेकिन मेरा मन…

वह तो ठहरा जिज्ञासु।

जब तक किसी बात की तह तक न पहुँच जाए, उसे चैन कहाँ?

खिड़की के उस छोटे-से दायरे से मन नहीं भरा।

मन ने कहा—इतने बड़े आसमान में अगर सिर्फ़ यही दो हैं, तो ज़रा इसकी पुष्टि भी कर ली जाए।

बस फिर क्या था!

मैं अपनी इस ‘उच्च स्तरीय शोध’ के लिए छत की ओर चल पड़ा।

अपने ही अंदाज़ में कहूँ तो उस रात मैं इस रहस्य पर पीएचडी करने निकला था।

अगर मेरे बस में होता तो ‘ज़ीरो’ फ़िल्म के बौने किरदार की तरह सीधे चाँद तक पहुँच जाता।

लेकिन विज्ञान ने भले ही मेरी कल्पनाओं को पंख दिए हों, शरीर को अभी भी सीढ़ियों का ही सहारा लेना पड़ता था।

द्वितीय तल से तृतीय तल की ओर बढ़ते हुए मन में एक उम्मीद थी।

शायद खिड़की का कोण छोटा था।

शायद बाकी सितारे किसी दूसरी दिशा में छिपे थे।

और शायद छत पर पहुँचते ही आसमान का पूरा परिवार दिखाई देगा।

सीढ़ियों की आख़िरी सीढ़ी पार की।

छत की दहलीज़ लाँघी।

और…

मैं कुछ क्षणों के लिए वहीं रुक गया।

आसमान वैसा ही था।

नहीं…

शायद उससे भी अधिक ख़ूबसूरत।

लेकिन मेरी उम्मीद के बिल्कुल विपरीत, वहाँ भी सिर्फ़ वही दो मौजूद थे।

एक चाँद।

एक सितारा।

और उनके चारों ओर फैला हुआ अथाह शून्य।

पूरा आकाश जैसे उस रात ख़ाली कर दिया गया था।

मानो ब्रह्मांड ने उन दोनों के लिए एक शाम नहीं, बल्कि एक पूरा निजी कमरा बुक कर रखा हो।

वे दोनों उस विशालता में अकेले थे।

और शायद खुश भी।

मैंने उस दृश्य को कुछ देर तक खड़े-खड़े देखा।

फिर छत पर पड़ी एक पुरानी प्लास्टिक की कुर्सी खींचकर बैठ गया।

जनवरी की रात थी।

हवाएँ बर्फ़ की तरह ठंडी थीं।

हर झोंका शरीर को छूकर भीतर तक उतर रहा था।

लेकिन उस समय ठंड से अधिक ध्यान उस आकाशीय बातचीत पर था।

मैं बस देख रहा था।

न जाने कितनी देर।

तभी अचानक हवा कुछ और तेज़ हो गई।

सरसराती हुई ठंडी हवा मेरे कानों के पास से गुज़री।

उसकी आवाज़ में मुझे जैसे कोई शिकायत सुनाई दी।

एक पल को लगा—

शायद मैं उनकी निजता में दखल दे रहा हूँ।

शायद प्रकृति मुझे समझा रही है कि हर खूबसूरत दृश्य को अपना बना लेना ज़रूरी नहीं होता।

कुछ दृश्य केवल देखने के लिए होते हैं।

कुछ पल केवल महसूस करने के लिए।

और कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनमें तीसरे की मौजूदगी अनावश्यक हो जाती है।

मैंने फिर चाँद और सितारे की ओर देखा।

वे अब भी वैसे ही थे।

अपने छोटे-से आकाशीय संसार में मग्न।

बिना मेरी ओर देखे।

बिना मेरी मौजूदगी की परवाह किए।

शायद यही उनकी खूबसूरती थी।

मैं मुस्कुराया।

अपनी जिज्ञासा को वहीं विराम दिया।

धीरे से कुर्सी से उठा।

दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे आया।

कमरे में पहुँचा।

और रज़ाई खींचकर चुपचाप लेट गया।

नींद आने से पहले आख़िरी बार खिड़की की ओर देखा।

चाँद अब भी वहीं था।

सितारा भी।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

इस सुकून के साथ कि उस रात ब्रह्मांड के उस अनंत विस्तार में…

दो आकाशीय दोस्त अपनी अधूरी गुफ़्तगू पूरी कर रहे थे।

और मैं—

उनकी कहानी का हिस्सा बनने के बजाय,

बस उसका एक ख़ामोश गवाह बनकर लौट आया था।


~ शिवम् धुरिया