महीने की सत्ताईस तारीख, कटरा का तीन सौ रुपये महीने वाला कमरा और तीनों की जेबों की संयुक्त जीडीपी—कुल बयालीस रुपये और एक जंग लगा दस का सिक्का।
कमरे का माहौल ऐसा था मानो किसी बड़े अस्पताल का आईसीयू वार्ड हो। दिनेश फर्श पर उल्टे मुंह पड़ा था, शैलेंद्र छत के लटकते पंखे की ब्लेडें गिन रहा था ताकि दिमाग भूख से भटक सके, और कोने वाली चरमराती लकड़ी की मेज पर बैठा था हमारा नायक—शिवू। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एमएससी मैथमेटिक्स (फाइनल ईयर)।
शिवू की सबसे बड़ी बीमारी यह थी कि वह दुनिया की हर त्रासदी, चाहे वो गर्लफ्रेंड का ब्रेकअप हो या सिलेंडर का खत्म होना, उसे यूक्लिडियन स्पेस और डिफरेंशियल इक्वेशन्स से हल करने की कोशिश करता था। उसके चेहरे पर हमेशा एक ऐसा गंभीर भाव रहता था मानो अभी-अभी उसने ब्लैक होल की नई थ्योरी लिख डाली हो।
"शिवू भाई," शैलेंद्र ने अपने पेट को दबाते हुए ऐसी आवाज़ निकाली जैसे कुएं से बाल्टी खींची जा रही हो, "अगर अगले बीस मिनट में मेरे पेट में किसी खाद्य पदार्थ का प्रवेश नहीं हुआ, तो पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में साफ लिखा आएगा—'समोसे की कमी के कारण आकस्मिक निधन'।"
दिनेश ने खिड़की का पर्दा थोड़ा सरकाया। सामने 'गंगा पैलेस मैरिज लॉन' में नीली-पीली झालरें जगमगा रही थीं। हवा का एक झोंका कमरे में घुसा, जिसके साथ शुद्ध देसी घी में सिकती जलेबियों और कड़ाही पनीर की ऐसी खुशबू आई कि शैलेंद्र की आंखों से आंसू छलक आए।
"लड़कों!" दिनेश ने मुड़कर फुसफुसाते हुए कहा, "सामने स्वर्ग का द्वार खुला है। कम से कम हज़ार लोगों की भीड़ है। अगर हम चुपचाप कोने से घुसें, तीन-तीन प्लेट खींचे और खिसक लें, तो किसी के बाप को पता नहीं चलेगा।"
"पागल हो गया है क्या?" शैलेंद्र तुरंत सिहर उठा। "कटरा की शादियां हैं ये! अगर लड़की वालों या लड़के वालों में से किसी ने धर लिया, तो पहले स्टेज पर चढ़ाकर जलील करेंगे, फिर दूल्हे के भाई-बंधु मिलकर झाड़ू और लाठियों से ऐसा धोएंगे कि पूरे प्रयागराज के ऑर्थोपेडिक डॉक्टर भी हमारी हड्डियां नहीं जोड़ पाएंगे!"
कमरे में सन्नाटा छा गया। तभी शिवू ने अपनी रफ कॉपी पर से नजरें उठाईं, पेन की नोक से अपना चश्मा थोड़ा ऊपर धकेला और बेहद दार्शनिक अंदाज़ में बोला, "तुम दोनों की अज्ञानता पर मुझे दया आती है। कभी 'पिजियनहोल प्रिंसिपल' (Pigeonhole Principle) और 'लॉ ऑफ लार्ज नंबर्स' पढ़ा है?"
दिनेश और शैलेंद्र ने ऐसे मुंह बनाया जैसे शिवू ने फ्रेंच में गाली दे दी हो।
"सरल भाषा में समझो जाहिलों," शिवू ने मेज पर रफ कॉपी घुमाते हुए पेन से एक डायग्राम खींचा। "गंगा पैलेस का क्षेत्रफल लगभग बारह हजार वर्ग फीट है। आठ सौ मेहमान, पचास वेटर, चालीस रिश्तेदार। जब मेहमानों की संख्या m{N > 500} हो जाती है, तो किसी भी अनधिकृत व्यक्ति के पकड़े जाने की प्रायिकता m{P(E)} शून्य के सन्निकट हो जाती है! शादी के आयोजकों का ध्यान सिर्फ दो ही चीज़ों पर होता है—पहला, पनीर खत्म न हो; दूसरा, फूफा जी मुंह न फुलाएं। हम तो सिस्टम के 'नेग्लिजिबल एरर' हैं। हम घुसेंगे, खाएंगे और सिस्टम को बिना डिस्टर्ब किए बाहर आ जाएंगे।"
"इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जिंदाबाद!" दिनेश उछल पड़ा।
अब शुरू हुआ मिशन 'ऑपरेशन भोज'। ड्रेस कोड सबसे अहम था। दिनेश ने अपनी नीली लाइनिंग वाली शर्ट निकाली जिसे उसने पिछले दो महीने से धोया नहीं था, पर सेंट छिड़ककर काम चला लिया। शैलेंद्र ने अपने पड़ोसी कमरे वाले सीनियर का ब्लेज़र उधार मांगा, जो उस पर ऐसा झूल रहा था जैसे किसी खंभे पर तिरपाल डाल दिया गया हो।
और शिवू? शिवू ने पूरा अकादमिक रूप धरा—सफेद खादी का कुर्ता, पजामा, पैरों में बाटा की चप्पलें और कुर्ते की जेब में दो डॉट पेन और एक मुड़ा हुआ कागज़। चेहरा ऐसा बनाया मानो वह दूल्हे का फूफा नहीं, बल्कि दूल्हे की पीएचडी का गाइड हो।
गेट पर दो बाउंसर और एक बुजुर्ग दरबान खड़े थे। जैसे ही तीनों पहुंचे, शिवू ने बहुत ही शालीनता से अपनी गर्दन बाईं तरफ घुमाई, हवा में किसी अदृश्य रिश्तेदार को देखकर हाथ हिलाया—"अरे मौसा जी! हां-हां, हम आ गए, आप चलिए स्टेज की तरफ!" दरबान ने सोचा कि वीआईपी मेहमान हैं, उसने झुककर सलाम ठोक दिया।
गेट पार!
अंदर का नज़ारा देखकर शैलेंद्र की लार टपकने लगी। लॉन में रोशनी का समंदर था और चारों तरफ खाने के स्टॉल ऐसे सजे थे जैसे स्वर्ग की अप्सराएं कतार में खड़ी हों।
"प्लान सुनो," शिवू ने दोनों को कोने में ले जाकर फुसफुसाया, "हम तीनों अलग-अलग दिशाओं में 'रैंडम मोशन' करेंगे। एक साथ झुंड बनाकर नहीं चलेंगे। कोई पूछे तो लड़की वालों के सामने कहना कि 'लड़के के रूममेट हैं' और लड़के वालों के सामने कहना कि 'दुल्हन के मौसेरे भाई हैं'। जाओ, और अपना-अपना पेट मुकम्मल करो!"
दिनेश सीधे चाट-फुल्की के काउंटर पर टूटा। शैलेंद्र ने वेटर की चलती ट्रे से ही चार पनीर टिक्के उड़ा लिए।
और शिवू? शिवू ने एक खाली प्लेट उठाई और बहुत ही सलीके से, वीआईपी वॉक करते हुए मेन कोर्स के काउंटर पर पहुंचा। उसने प्लेट में शाही पनीर, दाल मखनी, कश्मीरी पुलाव और नान को ऐसे सजाया जैसे किसी ज्योमेट्रिकल शेप का बैलेंस बना रहा हो। वह आराम से एक खंभे की ओट में खड़ा होकर खाने का पहला निवाला मुंह में डालने ही वाला था कि पीछे से एक भारी, खुरदुरी आवाज़ आई—
"अरे लल्ला! कौन से विभाग से हो?"
शिवू के गले में निवाला अटकते-अटकते बचा। उसने मुड़कर देखा। सामने लगभग साठ साल के एक भारी-भरकम सज्जन खड़े थे, जिनके गले में सोने की मोटी चेन थी, माथे पर लंबा तिलक था और हाथ में गुलाब की पंखुड़ियों से भरी एक टोकरी थी। उनकी आंखें किसी खोजी कुत्ते की तरह शिवू को सिर से पैर तक स्कैन कर रही थीं।
तभी शैलेंद्र भी अपनी प्लेट में छह रसगुल्ले लादे, मुंह में एक कबाब ठूंसे ठीक वहीं पहुंच गया। उसके पीछे-पीछे दिनेश भी हाथ में आइसक्रीम का कप लिए आ गया। तीनों एक ही जगह इकट्ठा हो गए—प्रायिकता का सबसे गलत कॉम्बिनेशन!
"प्रणाम चाचा जी," दिनेश ने तुरंत अपनी बत्तीसी दिखाई, "हम... हम असल में दूल्हे राजा, यानी विकास भाई के हॉस्टल के जिगरी यार हैं। बचपन के लंगोटिया दोस्त!"
अंकल के चेहरे की झुर्रियां अचानक तन गईं। उनका माथा ठनका। "विकास? अरे ओ नालायकों! यह शादी मिश्रा जी की बिटिया की शुक्ला जी के लड़के से हो रही है! लड़के का नाम अक्षत है, और वो अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है! उसका कोई दोस्त हॉस्टल में दाल-भात नहीं खाता! कौन हो तुम लोग बे?"
दिनेश का रंग फक उड़ गया। शैलेंद्र के हाथ से रसगुल्ले की प्लेट थरथराने लगी और चाशनी उसके किराए के ब्लेज़र पर टपक गई। शैलेंद्र ने घिघियाते हुए शिवू की तरफ देखा, "शिवू... थ्योरम का बंटाधार हो गया! अब हड्डी टूटने वाली है!"
अंकल ने अपने पीछे खड़े दो लंबे-चौड़े हलवाइयों को आवाज़ दी, "अरे लखन! ज़रा कड़छुल लेकर इधर आना! देखना ये कौन से बिन बुलाए सांड घुसे हैं हमारे टेंट में!"
माहौल एकदम गर्म हो गया। हलवाई हाथ में लोहे का बड़ा कड़छुल लेकर आगे बढ़ा। लेकिन तभी शिवू का 'इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का गणित' एक्टिवेट हो गया।
शिवू ने एक लंबा, गहरा सांस लिया। उसने अपनी प्लेट बहुत ही गरिमा के साथ पास की मेज पर रखी। चेहरे पर ऐसा गुस्सा लाया जैसे किसी ने यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर की बेइज्जती कर दी हो। उसने कुर्ते की जेब से दोनों पेन निकाले, मुड़ा हुआ कागज़ खोला और सीधे अंकल की आंखों में आंखें डालकर कड़क आवाज़ में बोला—
"शर्म आनी चाहिए आपको! बिल्कुल शर्म आनी चाहिए!"
अंकल ठिठक गए। हलवाई का कड़छुल हवा में ही रुक गया। "का... काहे की शर्म बे?"
"हम यहां प्रयागराज नगर निगम और स्टेट फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट की तरफ से औचक निरीक्षण (सरप्राइज इंस्पेक्शन) पर हैं!" शिवू ने कागज़ को ऐसे लहराया जैसे वारंट हो। "हमें शिकायत मिली थी कि इस मैरिज लॉन में चाशनी में सैक्रीन और पनीर में सिंथेटिक स्टार्च मिलाया जा रहा है! मैं डॉ. शिवेंद्र, सीनियर सैंपलिंग ऑफिसर! और ये दोनों मेरे जूनियर फील्ड असिस्टेंट हैं, जो प्लेटों में सैंपल कलेक्ट कर रहे थे ताकि लैब टेस्टिंग के लिए भेजा जा सके!"
शैलेंद्र ने तुरंत अपनी रसगुल्ले वाली प्लेट आगे कर दी, "हां! देखिए कितना संदिग्ध लग रहा है यह रसगुल्ला!"
अंकल की आंखें फटी की फटी रह गईं। "फू... फूड इंस्पेक्टर? अरे साहब, वो... वो तो हम हलवाई को डांट ही रहे थे..."
"दिखाइए किचन!" शिवू ने रौब से कहा, "और ये जो कड़छुल लेकर आप हमारे असिस्टेंट की तरफ बढ़ रहे थे, इसे सरकारी काम में बाधा डालने की धारा 353 के तहत दर्ज किया जाएगा! चलिए थाने!"
अंकल के हाथ-पैर फूल गए। उन्होंने तुरंत दोनों हाथ जोड़ लिए, "अरे अरे साहब! अनर्थ मत करिए! बिटिया की शादी है, बारात द्वार पर खड़ी है, बदनामी हो जाएगी हुजूर! गलती हो गई हमसे, हम समझे कोई कटरा के भुक्खड़ लौंडे घुस आए हैं। आप गुस्सा मत होइए!"
शिवू ने कृत्रिम गंभीरता से अपनी घड़ी देखी। "देखिए, हम कानून के पक्के हैं। लेकिन भारतीय परंपरा में बेटी की शादी सबसे पवित्र कार्य है। हम आपकी खुशियों में विघ्न नहीं डालना चाहते। इसलिए हम सैंपल को ऑन-द-स्पॉट 'ऑर्गनोलिप्टिक टेस्ट' (चखकर परीक्षण) करेंगे। अगर स्वाद ठीक लगा, तो चालान फाड़ने का विचार टाल दिया जाएगा।"
"अरे बिल्कुल साहब! जो खाना है खाइए, पूरा हलवाई आपके हवाले है!" अंकल ने राहत की सांस लेते हुए हलवाई को डांटा, "अरे लखन, मूर्ख! साहब लोगों के लिए वीआईपी सोफे पर अलग से गरम-गरम खाना लगवा!"
अगले पैंतालीस मिनट तक जो हुआ, वह कटरा के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से दर्ज होने लायक था।
तीनों दोस्त वीआईपी सोफे पर पैर पसारकर बैठे थे। वेटर लाइन लगाकर गरम नान, मलाई कोफ्ता, कढ़ाई पनीर और कचौड़ियां ला रहे थे। दिनेश पनीर के टुकड़ों को ऐसे चबा रहा था मानो कोई वैज्ञानिक विश्लेषण कर रहा हो—"हम्म, स्टार्च थोड़ा कम है, पास किया जाता है।" शैलेंद्र ने अकेले नौ प्लेट चाट और अनगिनत गुलाब जामुन उड़ा दिए।
और शिवू? शिवू ने पूरी गरिमा के साथ, एक-एक निवाले का भरपूर आनंद लिया। अंत में जब हलवाई ने गरम केसरिया दूध का कुल्हड़ लाकर दिया, तो शिवू ने एक घूंट भरा, अपनी जेब से पेन निकाला और रफ कॉपी के फटे पन्ने पर लिखा—‘निरीक्षण सफल रहा। भोजन की गुणवत्ता संतोषजनक पाई गई।’
उसने वह पर्चा अंकल के हाथ में थमाया। अंकल ने उसे ऐसे माथे से लगाया जैसे भगवान का प्रसाद हो।
रात के ग्यारह बजे।
तीनों लड़के लॉन से बड़े ठाठ से बाहर निकले। पेट इतना भर चुका था कि तीनों से सीधा चला भी नहीं जा रहा था। सड़क पर आकर शैलेंद्र ने एक लंबी, तृप्त डकार मारी जिसकी गूंज शायद यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी तक गई होगी।
दिनेश ने हंसते-हंसते शिवू के कंधे पर हाथ मारा, "भाई शिवू, मान गए तेरी एमएससी की डिग्री को! तूने तो कड़छुल खाने की नौबत को फाइव-स्टार ट्रीटमेंट में बदल दिया!"
शिवू ने सड़क पर मंद-मंद मुस्कुराते हुए अपने कुर्ते की धूल झाड़ी, चश्मे को ठीक किया और आसमान में चमकते तारों को देखकर बोला—
"जिंदगी भी बिल्कुल प्रोबेबिलिटी के उस थ्योरम जैसी है दोस्तों—परिस्थितियां चाहे कितनी भी विषम क्यों न हों, अगर आत्मविश्वास का कॉन्स्टेंट m{K} मजबूत हो, तो हर समस्या का हल अंत में एक मुकम्मल दावत पर ही जाकर खत्म होता है।"
तीनों दोस्त कटरा की शांत गलियों में पेट पकड़कर हंसते हुए अपने कमरे की ओर बढ़ गए। उस रात कमरे में न भूख थी, न कोई पछतावा; बस थी तो गहरी, बेफिक्र नींद और पेट में तैरता हुआ शुद्ध देसी घी का सुकून।