Money Vs Me - Part 23 in Hindi Human Science by fiza saifi books and stories PDF | Money Vs Me - Part 23

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Money Vs Me - Part 23

रात का समय था। स्टेशन ने जब मुझे वापस उसी शहर में लाकर उतारा, तो कुछ पल के लिए मैं वहीं खड़ा रह गया।

वही शहर... जिससे मैं कभी भागकर दूर चला गया था।

पता नहीं वह डर था या हालात का असर, लेकिन मैंने एक पल में ही यह ज़िंदगी छोड़कर अपने गाँव, अपनी नानी के पास जाने का फैसला कर लिया था। शायद उस वक्त मुझे लगा था कि इस शहर से जितना दूर जाऊँगा, उतना ही अपने अतीत से भी दूर हो जाऊँगा।

लेकिन अब जब मैं फिर उसी शहर में खड़ा था, तो मन के किसी कोने से एक आवाज़ कह रही थी—जो कुछ हुआ, शायद अच्छे के लिए ही हुआ था।

क्योंकि मेरी ज़िंदगी के कुछ ऐसे राज़ थे, जो अब धीरे-धीरे मेरे सामने आने वाले थे।

मेरी माँ...

वह किन हालातों में मुझसे अलग हुई थी?

क्यों उसने कभी पलटकर मेरी तरफ नहीं देखा?

क्यों उसने मुझे अपने पास बुलाने की कोशिश तक नहीं की?

ये ऐसे सवाल थे, जो मैंने आज तक किसी से नहीं पूछे थे। न नानी से, न किसी और से। लेकिन मेरे मन में ये सवाल हमेशा ज़िंदा रहे थे। कभी खामोश होकर, तो कभी रातों की नींद छीनकर।

और आज...

शायद उन सभी सवालों के जवाब मेरे सामने आने वाले थे।

लेकिन दिल में एक डर भी था।

क्या होगा जब मैं अपनी माँ के सामने जाऊँगा?

क्या वह मुझे पहचान पाएगी?

क्या वह मुझे अपनाएगी?

या फिर इतने सालों की दूरी के बाद भी हमारे बीच वही अनकही दीवार खड़ी रहेगी?

और सबसे बड़ा सवाल...

आखिर वह कौन-सी मजबूरी थी, जिसने मेरी माँ को मुझसे इतना दूर कर दिया कि वह कभी पलटकर मुझे देखने तक नहीं आई?

आज शायद उन सारे सवालों से पर्दा उठने वाला था।

लेकिन सच क्या था...

ये मैं भी नहीं जानता था।

और फिर...

इन सारे सवालों से भी बड़ा एक सवाल मेरे सामने खड़ा था—ठाकुर उदय प्रताप का सामना।

आखिर मैं उनका सामना कैसे करता?

दो साल पहले जब मैं इस घर में आया था, तब मेरी नजरों में ठाकुर उदय प्रताप मेरे मालिक थे। एक ऐसे मालिक, जिन्होंने मुझे अपने सबसे भरोसेमंद आदमी की तरह अपने घर में जगह दी थी। उनके लिए मेरे मन में सम्मान था और शायद कहीं न कहीं एक एहसान भी।

लेकिन अब सब कुछ बदल चुका था।

इस बार जब मैं उनके सामने खड़ा होने वाला था, तो मेरी आँखों में वह पुराना सम्मान नहीं था।

अब मैं उन्हें उस नजर से नहीं देख पा रहा था, जिस नजर से बीते दो सालों में देखता आया था।

मेरी नजरों में उनकी इज्जत कहीं गिर चुकी थी।

और जिस दिन से मैंने अपनी माँ का नाम उस आदमी के साथ जुड़ा हुआ जाना था, उसी दिन से मेरे भीतर एक दबा हुआ गुस्सा भी जन्म लेने लगा था।

वह गुस्सा, जिसे मैं चाहकर भी पूरी तरह दबा नहीं पा रहा था।

पहले मैं उनके एक इशारे पर सहम जाता था। उनके रौब के सामने मेरी आवाज़ तक लड़खड़ा जाती थी।

लेकिन अब...

अब मैं उनसे डरने वाला नहीं था।

न ही उनके रौब में आने वाला था।

फिर भी मन के किसी कोने में एक सवाल लगातार मुझे परेशान कर रहा था—

मैं उन्हें क्या वजह बताऊँगा कि मैं पहले अचानक यह घर छोड़कर क्यों चला गया था?

क्या मैं उन्हें सच बता पाऊँगा?

क्या वह मेरी बात पर यकीन करेंगे?

और सबसे बड़ा सवाल...

क्या ठाकुर उदय प्रताप मुझे दोबारा इस घर में जगह देंगे?

क्या वह मुझे उसी तरह स्वीकार करेंगे, जैसे दो साल पहले किया था?

तब उन्होंने मुझे अपने सबसे वफादार आदमी के रूप में इस घर में आसरा दिया था।

लेकिन अब मैं वही आदमी नहीं था।

दो साल पहले मैं उनके सामने सिर झुकाकर खड़ा होता था।

और आज...

आज मेरे भीतर इतने सवाल, इतना गुस्सा और इतने राज़ थे कि शायद इस बार सिर झुकाना मेरे लिए मुमकिन नहीं था।

मुझे नहीं पता था कि आने वाला वक्त मेरे लिए क्या लेकर आया है।

लेकिन इतना जरूर जानता था...

इस बार ठाकुर उदय प्रताप का सामना सिर्फ उनके पुराने नौकर से नहीं, बल्कि उस आदमी से होने वाला था जो अपने अतीत का सच जानने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था।

इन्हीं सवालों और जवाबों के ताने-बाने में उलझा हुआ मैं कब उस आलीशान बंगले के गेट के सामने आकर खड़ा हो गया, मुझे खुद पता ही नहीं चला।

करीब दो मिनट तक मैं बस बाहर से उस गेट को देखता रहा।

सब कुछ वैसा ही था...

जैसा मैं दो साल पहले छोड़कर गया था।

वैसे भी, इतने कम दिनों में इस जगह में बदलता ही क्या?

ऊँची दीवारें, लोहे का विशाल गेट और उसके पीछे खड़ा वह आलीशान बंगला... सब कुछ देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वक्त यहीं रुक गया हो। बस बदला था तो मैं।

मैंने आगे बढ़कर गेट की घंटी दबाई।

कुछ ही पलों बाद अंदर से एक नया गार्ड बाहर आया। उसने मुझे सिर से पैर तक गौर से देखा, जैसे मेरी शक्ल उसके लिए बिल्कुल अनजान हो।

फिर उसने पूछा,

“क्या चाहिए?”

मैंने बिना किसी झिझक के कहा,

“ठाकुर साहब से मिलना है। मैं यहीं रहता हूँ। गेट खोलो।”

इस बार मैंने जानबूझकर अपनी आवाज़ में रौब भर दिया।

मेरी बात सुनकर वह थोड़ा चौंका। उसने मुझे दोबारा गौर से देखा और फिर हल्की-सी हँसी के साथ बोला,

“साहब? यहाँ?”

उसके चेहरे पर साफ था कि उसे मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा था।

फिर उसने कहा,

“मैंने तो आपको पहले कभी यहाँ देखा नहीं। कोई पहचान है क्या? या फिर ऐसे ही पहुँच गए इतने बड़े बंगले में?”

मैंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि वह खुद ही बोल पड़ा,

“हमारे साहब यहाँ अकेले रहते हैं। पता नहीं कहाँ-कहाँ से लोग चले आते हैं उनसे मिलने...”

उसकी बात सुनकर मेरे भीतर दबा हुआ गुस्सा फिर से सिर उठाने लगा।

दो साल पहले इसी गेट से मैं इस घर का हिस्सा बनकर अंदर आया था।

और आज...

उसी गेट पर खड़ा होकर मुझे अपने ही घर में दाखिल होने के लिए किसी अनजान आदमी को सफाई देनी पड़ रही थी।

मैंने उसकी आँखों में सीधे देखते हुए धीमे स्वर में कहा,

“गेट खोलो... वरना ठाकुर साहब को खुद बाहर बुलाना पड़ेगा।”

इस बार मेरी आवाज़ में ऐसा कुछ था कि गार्ड के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

उसने मुझे फिर से गौर से देखा।

शायद उसे पहली बार एहसास हुआ था कि मैं कोई आम आदमी नहीं था।

लेकिन उसे अभी यह नहीं पता था कि जिस आदमी को वह गेट के बाहर खड़ा समझ रहा था...

वह कभी इसी घर की चारदीवारी के अंदर ठाकुर उदय प्रताप का सबसे भरोसेमंद आदमी हुआ करता था।

इसे उसी प्रवाह में आगे बढ़ाते हुए, संवाद और भीतर चल रहे तनाव को थोड़ा और गहरा किया है:

ठाकुर साहब के सामने
 
गार्ड ने मेरी बात पर ध्यान दिए बिना दोबारा गेट बंद कर दिया।

मैंने एक पल के लिए उसे जाते हुए देखा, फिर बिना कुछ सोचे दोबारा घंटी बजा दी।

इस बार मैंने ऊँची आवाज़ में पुकारा—

“गिरीश!”

मेरी आवाज़ सुनते ही अंदर हलचल हुई।

कुछ ही पल बाद गिरीश लगभग दौड़ता हुआ गेट के बाहर आया। मुझे देखते ही उसके कदम वहीं रुक गए। उसकी आँखें अचानक फैल गईं।

“अरे... शितिज बाबू!”

उसकी आवाज़ में हैरानी भी थी और खुशी भी।

“आप? आप आज कहाँ थे? इतने दिनों से कोई खबर ही नहीं थी! और अचानक कहाँ चले गए थे? इतने दिन तक... और इतनी रात को?”

वह जैसे मुझे देखकर पूरी तरह घबरा-सा गया था। उसके चेहरे पर एक साथ कई सवाल उभर आए थे, लेकिन शायद उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि सबसे पहले क्या पूछे।

मैंने उसकी किसी बात का जवाब नहीं दिया।

बस सीधे उसकी आँखों में देखते हुए पूछा—

“ठाकुर साहब हैं?”

मेरी आवाज़ सुनते ही वह थोड़ा संभला।

“जी... हैं।”

मैंने बिना रुके अंदर कदम बढ़ा दिया।

मुझे अंदर आते देख वह नया गार्ड एकदम से सीधा खड़ा हो गया और जल्दी से मुझे सलाम किया।

शायद अब उसे समझ आ गया था कि जिस आदमी को वह कुछ देर पहले गेट पर रोक रहा था, वह इस घर के लिए कोई आम आदमी नहीं था।

गिरीश ने भी उसे कुछ नहीं कहा।

बस मेरे साथ-साथ अंदर चल पड़ा।

दो साल बाद उस बंगले में कदम रखते ही मेरे भीतर जाने कैसी हलचल मच गई।

दीवारें वही थीं।

फर्श वही था।

हवा तक जैसे पुरानी यादों से भरी हुई थी।

लेकिन इस बार मैं यहाँ मेहमान बनकर नहीं आया था।

मैं उन सवालों के जवाब लेने आया था, जिन्होंने पिछले कई दिनों से मेरे भीतर तूफान मचा रखा था।

मैं ड्रॉइंग रूम में जाकर बैठ गया।

गिरीश ने मेरी तरफ देखा, फिर बिना कुछ कहे अंदर की ओर चला गया।

शायद ठाकुर साहब को मेरे बारे में बताने।

मैं अकेला रह गया।

मैंने एक लंबी साँस ली और खुद को शांत करने की कोशिश की।

दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था।

मैं जानता था कि अगले कुछ पल मेरी जिंदगी बदल सकते हैं।

पता नहीं ठाकुर साहब मुझे देखकर क्या कहेंगे।

क्या वह मुझसे मेरे अचानक चले जाने का कारण पूछेंगे?

क्या मैं उनसे अपनी माँ के बारे में सवाल कर पाऊँगा?

और अगर उन्होंने सच बता दिया...

तो क्या मैं उस सच को सुनने के लिए तैयार था?

मैंने आँखें बंद कीं और खुद को संभालने लगा।

जो भी होने वाला था, अब उसका सामना मुझे करना ही था।

मैंने अपनी मुट्ठियाँ ढीली कीं, एक गहरी साँस ली और सामने वाले दरवाज़े की तरफ देखने लगा।

अब बस इंतज़ार था...

ठाकुर उदय प्रताप के आने का।

कुछ देर बाद भीतर से किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।

धीरे-धीरे वह आवाज़ करीब आती गई।

फिर ड्रॉइंग रूम का दरवाज़ा खुला।

सामने ठाकुर उदय प्रताप खड़े थे।

रात के कपड़ों में, आँखों में हल्की नींद का खुमार और चेहरे पर वही रौब, जो दो साल पहले भी हुआ करता था।

लेकिन इस बार वह अकेले नहीं थे।

उनके पीछे कोई और भी खड़ा था।

मेरी नजर जैसे ही उस शख्स पर पड़ी, मेरी साँसें थम गईं।

गुलाबी रंग की साड़ी में एक औरत खड़ी थी। बालों की करीने से बनी हुई चोटी, गोरा चेहरा और आँखों में एक अजीब-सी पहचान...

मैं उसे एकटक देखता रह गया।

दिल ने जैसे उसी पल उसे पहचान लिया था, जबकि दिमाग अब भी उस सच को स्वीकार करने की कोशिश कर रहा था।

हाँ...

वह मेरी माँ थी।

मेरी माँ...

जिसे मैंने सिर्फ यादों में देखा था।

जिसके चेहरे की तस्वीर मेरे जेहन में धुंधली पड़ चुकी थी।

आज वह मेरे सामने खड़ी थी।

इतने सालों बाद।

मैं उसकी तरफ देखता ही रह गया। न मेरे होंठों से कोई शब्द निकला, न मेरे कदम आगे बढ़े।

तभी ठाकुर उदय प्रताप की आवाज़ ने मुझे जैसे किसी गहरे सपने से बाहर खींच लिया।

“तो तुम लौट आए, शितिज?”

मैंने उनकी तरफ देखा।

वह मुझे ही देख रहे थे।

फिर उन्होंने पूछा,

“क्यों चले गए थे अचानक? कुछ गलत देख लिया था क्या?”

उनका यह सवाल मेरे सीने में जैसे सीधे आकर लगा।

मैं एक पल के लिए बिल्कुल जम गया।

क्या उन्होंने जानबूझकर यह पूछा था?

या महज इत्तेफाक था?

मैंने खुद को संभाला और नजरें उनकी तरफ उठाईं।

“नहीं, ठाकुर साहब... ऐसी कोई बात नहीं थी।”

मैंने अपनी आवाज़ को सामान्य रखने की कोशिश की।

“मेरे गाँव से नाई का फोन आया था। मेरी नानी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई थी। इसलिए आपको बताए बिना ही मुझे जाना पड़ा। उसके लिए माफी चाहता हूँ।”

मैंने एक पल रुककर कहा,

“लेकिन अब सब ठीक है... इसलिए मैं वापस चला आया।”

ठाकुर साहब कुछ पल तक मुझे देखते रहे।

फिर उन्होंने अपने पीछे खड़ी उस औरत की तरफ इशारा किया।

“इनसे मिलो, शितिज।”

मेरी धड़कन जैसे एक बार फिर रुक गई।

“ये मेरी पत्नी हैं। अमेरिका से कुछ दिनों के लिए यहाँ आई हैं।”

पत्नी...

यह शब्द मेरे कानों में पड़ा तो भीतर जैसे कुछ टूट-सा गया।

मेरी नजर अनायास फिर उस औरत के चेहरे पर चली गई।

मेरी माँ...

ठाकुर उदय प्रताप की पत्नी।

इतने सालों से मेरे मन में जो सवाल थे, वे अचानक एक-दूसरे से जुड़ते हुए दिखाई देने लगे।

लेकिन जवाब अभी भी कहीं दूर था।

ठाकुर साहब ने मेरी हालत से अनजान बने हुए कहा,

“अच्छा हुआ तुम आ गए। मैं आजकल थोड़ा व्यस्त हूँ। कल से तुम ऑफिस संभाल लेना।”

मैंने उनकी तरफ देखा।

उनकी आँखें इस बार कुछ और ही कह रही थीं।

ऐसा लग रहा था जैसे वह सिर्फ मुझे देख नहीं रहे थे...

बल्कि मेरी आँखों के भीतर छिपे हर सवाल को पढ़ने की कोशिश कर रहे हों।

जैसे वह जानना चाहते हों कि मैं क्या जान चुका हूँ।

और शायद...

क्या-क्या जानना चाहता हूँ।

कुछ पल तक हमारी नजरें एक-दूसरे से मिली रहीं।

इस बार मैंने नजरें नहीं चुराईं।

मैंने बस धीरे से सिर हिलाया और कहा—