bansuri ki dhun bhag :07 in Hindi Moral Stories by prem chand hembram books and stories PDF | बांसुरी की धुन - भाग 7

Featured Books
Categories
Share

बांसुरी की धुन - भाग 7


बांसुरी की धुन — भाग : ०७
सत्संग अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुका था।
सभा में बैठे लोगों के चेहरों पर अब एक अलग ही शांति दिखाई दे रही थी। कुछ लोग वक्ता की कही बातों को मन ही मन दोहरा रहे थे, तो कहीं धीमी आवाज में उन बातों पर चर्चा चल रही थी। कोई अपने परिचितों से मिल रहा था, तो कोई चुपचाप बैठा जैसे भीतर उठे प्रश्नों के उत्तर खोज रहा था।
कीर्तन की अंतिम धुन वातावरण में जैसे ठहर-सी गई थी।
माइक से विदाई के शब्द सुनाई दिए—
“आप सभी का मंगल हो। जो सुना है, उसे केवल सुनकर न छोड़ें, उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। धर्म का प्रकाश तभी सार्थक है, जब उसका उजाला हमारे आचरण में दिखाई दे।”
इसके साथ ही सत्संग समाप्त हो गया।
लोग धीरे-धीरे उठने लगे।
प्रसाद वितरण के लिए एक ओर पंक्ति बन गई। स्त्री-पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग अपनी-अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। कोई प्रसाद ग्रहण कर रहा था, तो कोई भंडारे की व्यवस्था में हाथ बँटा रहा था।
रामलाल ने भी प्रसाद लिया।
उसी समय तापस दा की आवाज सुनाई दी—
“आइए रामलाल, भंडारे की पंक्ति उधर है।”
रामलाल ने उनकी ओर देखा, लेकिन उसके कदम वहीं ठिठक गए।
उसकी दृष्टि अनायास रावण दा और लाल दा की ओर चली गई।
मन हुआ—जाने से पहले एक बार रावण दा से मिल ले।
लेकिन दोनों इस समय दीक्षा लेने आए लोगों के बीच बैठे थे। कुछ लोग उनके सामने अपनी जिज्ञासाएँ रख रहे थे और कुछ दीक्षा की प्रक्रिया के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे।
रामलाल कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा।
उसके मन में कुछ समय पहले की वह औपचारिक भेंट फिर से जीवित हो उठी।
रावण दा ने हँसते हुए कहा था—
“अरे रामलाल! दीक्षा तुम भी ले लो।”
उस समय रामलाल ने मुस्कुराकर केवल इतना कहा था—
“दादा, मैं सोचता हूँ।”
लेकिन आज वही शब्द उसके भीतर एक नए अर्थ के साथ लौट रहे थे—
“दीक्षा तुम भी ले लो...”
उसने एक बार फिर रावण दा की ओर देखा।
मन ने कहा—
आज अवसर सामने है। इतने लोगों के बीच बैठकर भी यदि मन में वही प्रश्न बना हुआ है, तो शायद उसका उत्तर कहीं बाहर नहीं, भीतर तलाशना होगा।
लेकिन अगले ही क्षण पत्नी सलमा का चेहरा उसकी आँखों के सामने आ गया।
सलमा से पूछे बिना?
वह स्वयं से प्रश्न करने लगा—
क्या यह उचित होगा? आखिर वह मेरी जीवन-संगिनी है। जीवन का इतना बड़ा निर्णय अकेले कैसे लिया जा सकता है?
विवेक उसे रोक रहा था।
लेकिन भीतर कोई दूसरी आवाज लगातार उसे पुकार रही थी।
रामलाल ने गहरी साँस ली और वहाँ से चल पड़ा।
घर की ओर।
रास्ते में शाम का अँधेरा धीरे-धीरे गहराता जा रहा था। सड़क पर लोगों की आवाजाही कम हो गई थी। कहीं-कहीं घरों में दीपक जल चुके थे।
रामलाल चुपचाप चलता रहा।
लेकिन उसके भीतर जैसे अनेक रास्ते एक साथ खुल गए थे।
अचानक उसकी दृष्टि उस चट्टान की दिशा में चली गई, जहाँ वर्षों पहले वह गिर पड़ा था।
वह घटना आज भी उसके लिए रहस्य बनी हुई थी।
वह क्षण...
जब वह असहाय पड़ा था और अचानक एक अनजान व्यक्ति उसके सामने आया था।
उसने उसकी सहायता की थी।
और फिर...
जैसे आया था, वैसे ही अदृश्य हो गया था।
रामलाल ने कई बार उस घटना को संयोग मानकर भुलाने की कोशिश की थी, लेकिन आज न जाने क्यों वह दृश्य फिर उसकी आँखों के सामने उभर आया।
फिर उसे माँ की मृत्युशय्या की वह बात याद आई—
“तुझे जन्म देते मुझे पीड़ा नहीं हुई थी। तू अवश्य ही बड़ा काम करेगा।”
रामलाल चलते-चलते अचानक रुक गया।
उसने आकाश की ओर देखा।
क्या माँ को उस समय कुछ दिखाई दे रहा था?
क्या यह सब केवल संयोग था?
या मनुष्य के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएँ भी होती हैं, जिनका अर्थ हमें बहुत बाद में समझ आता है?
वह कुछ देर मौन खड़ा रहा।
फिर सिर झटककर आगे बढ़ गया।
उसे उत्तर नहीं मिला था।
लेकिन प्रश्न पहले से कहीं अधिक गहरा हो गया था।
रात काफी हो चुकी थी जब वह घर पहुँचा।
घर में शांति थी।
सलमा बच्चों को लेकर सो चुकी थी।
रामलाल ने धीरे से दरवाजा खोला, ताकि किसी की नींद न टूटे।
लेकिन उसकी अपनी आँखों से नींद जैसे कोसों दूर थी।
वह कुछ देर खाट पर बैठा रहा।
फिर उसकी दृष्टि दीवार पर टंगी माँ की तस्वीर पर पड़ी।
वह उठकर तस्वीर के पास गया।
तस्वीर को उतारा और कपड़े से उस पर जमी हल्की धूल साफ करने लगा।
फिर दोनों हाथों में तस्वीर थामे वह देर तक माँ के चेहरे को देखता रहा।
उसकी आँखों में नमी उतर आई।
होंठ धीरे से हिले—
“माँ... मुझे क्या करना चाहिए?”
कमरे में कोई उत्तर नहीं था।
सिर्फ रात की खामोशी थी।
तभी उसकी दृष्टि ऊपर टंगी पिता की तस्वीर पर पड़ी।
वह पिता की तस्वीर के सामने भी जाकर खड़ा हो गया।
कुछ क्षण उन्हें देखता रहा।
फिर माँ और पिता—दोनों तस्वीरों को बारी-बारी से देखने लगा।
उसे अपना बचपन याद आने लगा।
माँ की डाँट।
पिता की कठोरता।
घर की गरीबी।
उनकी छोटी-छोटी इच्छाएँ।
और सबसे बढ़कर—एक बात, जो शायद दोनों अपने बेटे के लिए चाहते थे—
वह अच्छा मनुष्य बने।
केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार और समाज के लिए भी।
रामलाल की आँखें भर आईं।
तभी पीछे से धीमी आवाज आई—
“अभी तक सोए नहीं?”
वह पलटा।
सलमा जाग चुकी थी।
वह धीरे-धीरे उसके पास आई।
रामलाल ने उसकी ओर देखा। चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में आज एक अलग ही दृढ़ता दिखाई दे रही थी।
“नहीं सलमा,” उसने धीमे स्वर में कहा, “अब और सोने का नहीं... जागने का समय आ गया है।”
सलमा उसकी बात समझ नहीं पाई।
उसने तस्वीरों की ओर देखा।
रामलाल ने कहा—
“देख रही हो इन्हें?”
सलमा चुप रही।
“इनकी एक ही इच्छा थी कि मैं अच्छा इंसान बनूँ। केवल अपने लिए नहीं... अपने परिवार और समाज के लिए भी।”
वह कुछ क्षण रुका।
फिर धीरे से बोला—
“मुझे लगता है, अब मुझे अपने जीवन के बारे में निर्णय लेना होगा।”
सलमा ने पूछा—
“कैसा निर्णय?”
रामलाल ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“कल सुबह... हम दोनों दीक्षा लेंगे।”
सलमा जैसे अचानक चौंक गई।
“हम दोनों?”
“हाँ।”
कुछ क्षण कमरे में मौन पसरा रहा।
फिर सलमा ने धीरे से कहा—
“लेकिन माही के पिता... हमारे समाज के लोग इसका विरोध करेंगे।”
रामलाल चुप रहा।
सलमा ने अपनी चिंता स्पष्ट की—
“अभी हमारा समाज इतना आगे नहीं बढ़ा है। हमारी बच्चियाँ बड़ी हो रही हैं। कल हमें इसी समाज में उनकी शादी करनी होगी। उस समय क्या लोग हमें स्वीकार करेंगे? क्या वे हमारे परिवार को अपनाएँगे? लोग क्या कहेंगे?”
रामलाल ने इस बार तुरंत उत्तर नहीं दिया।
वह जानता था कि सलमा का प्रश्न केवल सामाजिक भय नहीं था।
उसके पीछे बच्चों का भविष्य था।
परिवार की प्रतिष्ठा थी।
रिश्तेदारी थी।
और वर्षों से चली आ रही परंपराएँ थीं।
कुछ देर बाद रामलाल ने गहरी साँस ली।
“सलमा, मैं तुम्हारी चिंता समझता हूँ।”
फिर वह हल्का-सा मुस्कुराया।
“निश्चय ही हमारी बच्चियों के लिए योग्य वर मिलेंगे। लेकिन क्या केवल समाज की स्वीकृति ही उनके अच्छे भविष्य की गारंटी है?”
सलमा उसे देखती रही।
रामलाल ने आगे कहा—
“और क्या मैं अपने मारांग बुरु, लुगु बाबा और मोरे तुरुई को छोड़ रहा हूँ?”
उसकी आवाज में दृढ़ता थी।
“नहीं सलमा। अपनी मिट्टी को छोड़ना और अपने भीतर के अज्ञान को छोड़ना—दोनों एक बात नहीं हैं।”
सलमा शांत हो गई।
रामलाल ने माँ की तस्वीर की ओर देखते हुए कहा—
“देखो सलमा, भगवान भी हमारी सहायता करते हैं तो किसी माध्यम से करते हैं। वे स्वयं तीर-धनुष या बाँसुरी लेकर हमारे सामने उपस्थित नहीं होंगे। कभी कोई मनुष्य माध्यम बनता है, कभी कोई घटना, कभी कोई शब्द... और कभी किसी के जीवन का छोटा-सा परिवर्तन दूसरे के जीवन में रास्ता खोल देता है।”
उसने पत्नी की ओर देखा।
“हो सकता है, आज रावण दा से हुई बातचीत भी मेरे लिए वही माध्यम हो।”
सलमा के चेहरे की चिंता अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
लेकिन अब उसके भीतर एक नया प्रश्न जन्म ले चुका था—
क्या सचमुच परिवर्तन का अर्थ अपनी जड़ों को छोड़ देना है?
घर में फिर शांति छा गई।
लेकिन यह शांति पहले जैसी नहीं थी।
इस घर में वर्षों से शराब, नशे, झगड़े और कुसंगति की बातें होती आई थीं। बच्चों ने इन्हीं परिस्थितियों के बीच अपना बचपन देखा था।
उन्हें लगता था—शायद यही इस घर की रोजमर्रा की नियति है।
लेकिन आज पहली बार उन्हें लगा कि इस घर के भीतर कोई नई बात जन्म ले रही है।
कोई नई ज्योति।
रामलाल की दीक्षा लेने की तीव्र इच्छा ने पूरे घर को भीतर तक हिला दिया था।
कभी सब शांत हो जाते।
कभी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगते।
किसी के पास पूरा उत्तर नहीं था।
तभी अब तक चुपचाप सब सुन रही पंद्रह वर्ष की माही अचानक बोल उठी—
“माँ... आप मेरी शादी की चिंता मत कीजिए।”
सलमा ने बेटी की ओर देखा।
“तुम ऐसा क्यों कह रही हो?”
माही ने कुछ क्षण सोचा।
फिर बहुत सहजता से बोली—
“अच्छे चरित्र और संस्कार से भी तो सबको आकर्षित किया जा सकता है।”
कमरे में जैसे समय ठहर गया।
सलमा बेटी का चेहरा देखने लगी।
रामलाल की आँखें माही पर टिक गईं।
वह कुछ क्षण उसे मंत्रमुग्ध-सा देखता रहा।
पंद्रह वर्ष की उस लड़की के मुँह से निकली बात साधारण नहीं थी।
रामलाल ने धीमे स्वर में पूछा—
“माही... यह बात तुम्हारे मन में कब से थी?”
माही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“पता नहीं बाबा। आज पहली बार ऐसा लगा कि अगर इंसान अच्छा रहेगा, तो शायद अच्छे लोग भी उसे पहचानेंगे।”
रामलाल कुछ बोल नहीं पाया।
उसकी आँखें फिर माँ और पिता की तस्वीरों की ओर उठ गईं।
उसे लगा, वर्षों पहले माँ ने जो बात कही थी, उसका कोई बहुत छोटा-सा उत्तर आज उसके सामने खड़ा है।
उसने मन ही मन कहा—
“माँ... शायद बड़ा काम बाहर से शुरू नहीं होता। शायद वह पहले घर के भीतर ही जन्म लेता है।”
सलमा ने माही को देखा।
फिर रामलाल को।
उसके चेहरे की चिंता में अब थोड़ी नरमी थी।
उस रात किसी ने कोई बड़ा निर्णय लिखकर नहीं रखा।
न कोई घोषणा हुई।
न कोई शोर।
फिर भी उस छोटे-से घर में जैसे कुछ बदल चुका था।
शायद कोई दरवाजा भीतर से खुला था।
शायद किसी पुराने अँधेरे में एक दीपक जल उठा था।
और शायद...
बहुत दूर कहीं...
किसी अनदेखे रास्ते से बाँसुरी की धुन फिर सुनाई देने लगी थी।