🔥♥️ हुक्म और हसरत 🔥♥️
#Arsia
एपिसोड 38 — ठंडी आवाज़ का मालिक
अवॉर्ड समारोह लगभग खत्म हो चुका था।
सभागार के मुख्य हिस्से में मेहमान एक-दूसरे से मिल रहे थे, एक-दूसरे को बधाइयां दे रहे थे और कारोबार से जुड़ी बातचीत में व्यस्त थे।
लेकिन दूसरी मंजिल पर बने एक निजी कक्ष का माहौल बिल्कुल अलग था।
वह कमरा शहर के कुछ सबसे बड़े कारोबारियों से भरा हुआ था।
किसी का कारोबार विदेशों तक फैला था, तो किसी की कई राज्यों में कंपनियां थीं।
लेकिन इस वक्त उन सभी का ध्यान कमरे में मौजूद एक ही व्यक्ति पर था।
खिड़की के पास एक आदमी बिल्कुल शांत खड़ा था।
काला सूट।
काले दस्ताने।
और चेहरे पर काला नकाब।
Mr. S.
वह बाहर शहर की रोशनी को देख रहा था।
तभी कमरे का दरवाजा खुला।
लंदन से आए एक उम्रदराज़ कारोबारी अंदर दाखिल हुए।
उनके चेहरे पर औपचारिक मुस्कान थी।
उन्होंने आगे बढ़कर कहा,
“Mr. S., congratulations.”
कमरे में मौजूद बाकी कारोबारियों की नजर भी उनकी तरफ चली गई।
लंदन वाले कारोबारी ने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा,
“आज का सम्मान सच में आपके लायक था। लंदन के व्यापारिक जगत में भी आपकी उपलब्धियों की काफी चर्चा है।”
Mr. S. ने धीरे से उनकी तरफ देखा।
उसकी आंखों के अलावा चेहरे का कोई हिस्सा दिखाई नहीं दे रहा था।
कुछ पल तक कमरे में शांति रही।
फिर उसकी गहरी आवाज सुनाई दी।
“धन्यवाद।”
बस एक शब्द।
न मुस्कान।
न उत्साह।
न कोई अतिरिक्त प्रतिक्रिया।
लंदन वाले कारोबारी ने माहौल हल्का करने की कोशिश की।
“आप हमेशा की तरह कम बोलते हैं।”
Mr. S. की नजर कुछ पल उनके चेहरे पर टिकी रही।
फिर उसने शांत स्वर में पूछा,
“क्या ज्यादा बोलने से काम बेहतर हो जाता है?”
वह कारोबारी एक पल के लिए चुप हो गए।
फिर हल्का-सा हंसते हुए बोले,
“नहीं… लेकिन आज तो खुशी का दिन है।”
Mr. S. ने सामने रखी मेज पर पड़े पुरस्कार की तरफ देखा।
“खुशी?”
उसकी आवाज में कोई उत्साह नहीं था।
“एक पुरस्कार मेरे काम को नहीं बदलता।”
कमरे में खड़े एक दूसरे कारोबारी ने तुरंत कहा,
“लेकिन आपकी उपलब्धियां बहुत बड़ी हैं। इतनी कम उम्र में आपने जिस तरह—”
“उपलब्धियों की गिनती करने से समय बर्बाद होता है।”
Mr. S. ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही रोक दी।
वह कारोबारी चुप हो गया।
कमरे में मौजूद बाकी लोग भी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
लंदन वाले कारोबारी ने कुछ पल बाद पूछा,
“क्या आपको समारोह पसंद नहीं आया?”
Mr. S. ने उनकी तरफ देखा।
“मैं यहां समारोह के लिए नहीं आया था।”
“तो फिर?”
Mr. S. ने अपनी नजर खिड़की के बाहर कर ली।
“काम के लिए।”
उसके जवाब ने कमरे का माहौल और गंभीर कर दिया।
एक कारोबारी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“आपको देखकर तो लगता है कि आपके लिए व्यापार ही सब कुछ है।”
Mr. S. की आंखें कुछ पल के लिए उस व्यक्ति पर टिकी रहीं।
“व्यापार भावनाओं से नहीं चलता।”
वह व्यक्ति चुप हो गया।
Mr. S. ने आगे कहा,
“और भावनाएं…”
वह कुछ पल रुका।
“व्यापार में जितनी कम हों, उतना अच्छा है।”
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
लंदन वाले कारोबारी ने अपने हाथ में पकड़ा गिलास उठाया।
“फिर भी… आपकी सफलता के नाम।”
कुछ दूसरे कारोबारियों ने भी गिलास उठा दिए।
“आपकी सफलता के नाम।”
Mr. S. ने गिलास की तरफ देखा तक नहीं।
उसने बस शांत स्वर में कहा,
“काम पूरा होने पर जश्न मनाइए।”
इतना कहकर वह फिर खिड़की की तरफ मुड़ गया।
उसके इस इशारे को समझने में किसी को ज्यादा वक्त नहीं लगा।
बातचीत खत्म हो चुकी थी।
धीरे-धीरे कमरे में मौजूद कारोबारी बाहर जाने लगे।
कुछ ही देर में कमरे में सिर्फ Mr. S. और उसका सहायक रह गए।
सहायक ने आगे बढ़कर कहा,
“सर, लंदन वाली कंपनी के लोग कल की बैठक के लिए समय मांग रहे हैं।”
Mr. S. ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,
“सुबह आठ बजे।”
“जी, सर।”
सहायक ने अपनी डायरी में समय लिख लिया।
फिर उसने पूछा,
“और रायगढ़ के लोगों के साथ होने वाली बैठक?”
कुछ पल के लिए Mr. S. बिल्कुल शांत रहा।
फिर उसने कहा,
“अभी नहीं।”
“जी।”
सहायक पीछे हटने लगा।
तभी Mr. S. ने उसे रोक दिया।
“एक बात और।”
सहायक तुरंत पलटा।
“जी, सर?”
Mr. S. की आवाज पहले जैसी ही ठंडी थी।
“आज समारोह में जो लोग आए थे… उनके बारे में पूरी जानकारी चाहिए।”
सहायक ने पूछा,
“किन लोगों के बारे में?”
कुछ पल की चुप्पी के बाद जवाब आया—
“रायगढ़ परिवार।”
सहायक ने तुरंत सिर झुका दिया।
“जी, सर।”
वह कमरे से बाहर चला गया।
दरवाजा बंद होते ही कमरे में फिर वही सन्नाटा फैल गया।
Mr. S. अकेला खिड़की के पास खड़ा रहा।
नीचे पार्किंग में गाड़ियां एक-एक करके निकल रही थीं।
उसी भीड़ में रायगढ़ परिवार की गाड़ी भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
अंदर सिया बैठी थी।
उसके दिमाग में अभी भी वही गहरी आवाज घूम रही थी।
“मैंने ये आवाज पहले कहां सुनी है?”
वह जितना सोचती…
उतना ही उलझती जाती।
उसे क्या पता था कि उसी रात…
एक बंद कमरे में उसके परिवार का नाम पहली बार उस रहस्यमयी आदमी के सामने लिया जा चुका था।
और अब…
उस रहस्य की अगली कड़ी शुरू होने वाली थी।
… “हुक्म और हसरत”। ❤️
जारी रहेगा... 💗✨
© Diksha
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✨ मेरी रचनाएँ ✨
1. अनुबंध (Anubandh) — ✅ Completed
2. वो जो चुपके से देखा करता था — ✅ Completed
3. अनचाही मोहब्बत (Anchahi Mohabbat) — ✅ Completed
4. हुक्म और हसरत (Hukm Aur Hasarat) — ✍️
Running... 🌸